Book Review : जुगनुओं की बिसात दिखाता उपन्यास 'बिसात पर जुगनू'

वंदना राग का उपन्यास 'बिसात पर जुगनू'

वंदना राग का उपन्यास 'बिसात पर जुगनू'

इस उपन्यास को पढ़ते समय आपको लगेगा कि आप किसी आजाद जंगल से गुजर रहे हैं, जहां गुलामी का घुप्प अंधेरा घिरता जा रहा है. रास्ते मिटते जा रहे हैं, नीम खामोशी पसरती जा रही है. लेकिन ऐसे अंधेरे के बीच आपको टिमटिमाते दिखेंगे छोटे-छोटे कई जुगनू.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 15, 2021, 1:54 PM IST
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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के किसी उपन्यास को पढ़ने से पहले उस उपन्यास के बारे में अमूमन एक धारणा बन चुकी होती है. अगर वह उपन्यास किसी नायक पर केंद्रित हुआ, तो हमारी ख्वाहिश उस नायक के बारे में कोई नई बात जानने को लेकर ही बची रहती है. अमूमन, ऐसे उपन्यास, नाटक या कहानियां अपने पाठकों को बहुत कुछ नहीं दे पाते. पाठक उस रचना से बस एकाध नई बातें ही अपने जेहन में जोड़ पाता है, बाकी तो वह उसे पढ़ते हुए अपनी चुक रही स्मृतियों को ताजा करता है. पर वंदना राग का उपन्यास 'बिसात पर जुगनू' ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का होते हुए भी हमें इतिहास नहीं पढ़ाता. यह उपन्यास हमें किसी नायक की कहानी भी नहीं सुनाता, बल्कि यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि जिस आजाद देश में आज हम रह रहे हैं, उसकी आजादी के सपने गली-मुहल्ले के कई-कई किरदारों ने देखे होंगे, उसके लिए उसने संघर्ष किया होगा, अपने को उत्सर्ग किया होगा.

'बिसात पर जुगनू' उपन्यास में कई सारे जुगनू हैं. सबके अपने संघर्ष हैं, सबकी अपनी चिंताएं हैं. और इस अर्थ में अगर देखें तो उस दौर का चीन हो या भारत, दोनों ही जगहों के चरित्रों के व्यक्तित्व की बुनावट, उसकी कसावट एक-सी नजर आएगी. उपन्यास के शुरू में ही मुलाकात होती है यतीमखाने में पले-बढ़े नक्शानवीस फतेह अली खान से, जो चांदपुर के राजा के जहाज सूर्य दरबार के साथ बरसों तक चीन आता-जाता रहा है. वह हर वक्त रोजनामचा लिखा करता है. इसी रोजनामचे से उसकी अकुलाहट का पता चलता है कि कैसे वह अपने देश, अपने शहर, अपनी मिट्टी और अपने राजा के लिए चिंतित है.

बेशक यह उपन्यास कई स्तरों पर एकसाथ चलता हुआ अपने पाठकों को एक बड़े फलक की ओर ले जाता है. इस उपन्यास में 1857 की क्रांति की भी चर्चा होती है. वीर कुंवर सिंह से लेकर बहादुरशाह जफर तक का भी जिक्र होता है. लक्ष्मीबाई और सावित्री बाई फुले के साथ-साथ हजरत महल की भी चर्चा है. मगर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के इस उपन्यास के बाकी तमाम पात्र लेखिका की कल्पना की उपज हैं. यह कल्पना इतनी सशक्त है और इसके पात्र अपनी बुनावट में इतने मजबूत कि वे इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हिस्सा हो जाते हैं. फिरंगियों की व्यापार नीति का दबाव झेल रहे पात्र चाहे चीन के हों या भारत के - वे उस वक्त की त्रासदी से जूझते दिखते हैं. अपने-अपने देश के लिए उनकी चिंताएं दिखती हैं.

इस उपन्यास में एक कहानी चांदपुर रियासत के बड़े राजा और उनके बेटे सुमेर सिंह की है. बड़े राजा की चिंता का एक सिरा उन अंग्रेजों से जुड़ा है जो भारत में कारोबार करने आए हैं और सबकी रियासतें हड़प रहे हैं. उनकी चिंता के दूसरे छोर पर उनका बेटा सुमेर सिंह है जो अपनी कल्पनाओं की दुनिया में उड़ा जाता है. उसके बर्ताव में राजाओं वाला कोई लक्षण नहीं दिखता. भोले और मासून सुमेर सिंह का अपना संघर्ष है जो वह अपने मन के मीतों से बांटता चलता है. इसी तरह एक कहानी शंकर लाल की है, जो चित्रकार हैं और जिनका मुसव्विरखाना पटना में है. वे पटना की चित्रकला को देश-दुनिया तक पहुंचाने को बेचैन हैं.
इस उपन्यास के महिला चरित्रों की बात करें तो चीन की ली-ना का भी संघर्ष दिखेगा. दो चीनी बहनों का भी संघर्ष दिखेगा. खुदीजा बेगम भी संघर्ष करते दिखेंगी. तब के हिंदुस्तान में खुदीजा बेगम का 'दुस्साहस' याद रखने लायक है जो अपनी कला के प्रति इतनी समर्पित हैं कि मुसव्विरखाने में पहचान छुपा कर आती-रहती हैं और बाद में मुसव्विरखाने की पहचान बन जाती हैं. इस उपन्यास में प्रेम की वह महीन धारा भी बहती मिलेगी, जो बताती है कि देह किसी प्रेम की सीमा नहीं होती, बल्कि उसका विस्तार होती है. इसी प्रेम का प्रत्यक्षीकरण हैं समर्थ लाल, जो शंकर लाल और खुदीजा बेगम के बेटे हैं. इस समर्थ लाल के पैदा होने को आप खुदीजा बेगम के संघर्ष के तौर पर भी रेखांकित कर सकते हैं. बाद के हिस्सों में दो देशों की सीमाओं की बंदिशों को लांघते हुए समर्थ लाल और ली-ना का तालमेल भी देखा जा सकता है. समर्थ लाल चीन से पटना आई ली-ना के शोध-निदेशक भी हैं.

लेकिन इस उपन्यास में एक दलित स्त्री का जुझारूपन जिस तरह से उभर कर सामने आया है, वह इस उपन्यास के बाकी सारे चरित्रों पर भारी पड़ा है. यह महिला चरित्र है परगासो का. परगासो दुसाधन. दलित बस्ती में पैदा हुई परगासो बचपन से ही परंपराभंजक तेवर की रही है. असमय गुजर गई मां की नीडर बच्ची है वह. खाली झोपड़े में अकेले रहती है. उसे किसी का डर नहीं, किसी ईश्वर पर भरोसा नहीं, उसे तो खुद पर भरोसा है.

इस उपन्यास को पढ़ते समय आपको लगेगा कि आप किसी आजाद जंगल से गुजर रहे हैं, जहां गुलामी का घुप्प अंधेरा घिरता जा रहा है. रास्ते मिटते जा रहे हैं, नीम खामोशी पसरती जा रही है. लेकिन ऐसे अंधेरे के बीच आपको टिमटिमाते दिखेंगे छोटे-छोटे कई जुगनू. अपनी रोशनी फैलाते और आपमें उम्मीद जगाते. जाहिर है इस उपन्यास में हर चरित्र का अपना आभा मंडल दिखता है. लेकिन इन सबके बीच किसी धूमकेतू-सी चमकती है परगासो. दुसाध टोले की इस परगासो की चमक गढ़ी से लेकर चांदपुर तक दिखती है. परगासो ने अपने छुटपन में ही ईश्वर को नकार दिया था. जिसके बारे में उसके माली चाचा ने बताया था कि तुम्हारी मां तुम्हारे झोपड़ी के उस हिस्से की जमीन में सो रही है, जहां ईश्वर रहता है. एक रात परगासो ने अपनी झोपड़ी की जमीन खोद डाली. वहां उसने न मां मिली, न ईश्वर मिला. लेकिन इस खुदाई ने परगासो को एक जमीन दी. ठोस जमीन. जिसमें उसने सच को सहने की ताकत पाई. उसने जान लिया कि उसकी मां मर चुकी है और ईश्वर तो होता ही नहीं.



परगासो अपने माली चाचा के साथ फूल चुनने जंगल जाया करती थी. इसी जंगल में भीमा दादा रहते थे. अपनी बस्ती के बच्चों को शिकार करना सिखाते थे. तीन-धनुष और भाला फेंकने में उस्ताद थे इस जंगल के बच्चे. परगासो भी इन बच्चों से घुल-मिल गई. तीर चलाना सीख लिया, भाला फेंकना भी सीख लिया. पर जंगल के इन बच्चों की तरह उसने कभी जानवरों का शिकार नहीं किया, उसे तो दुश्मनों का शिकार करना था. और एक रोज उसे अपनी झोपड़ी में ही अपना दुश्मन दिख गया. भरी बरसात में आया था वह फिरंगी. गैंते के वार से शिकार कर लिया परगासो ने इस जानवर का और फिर उड़ चली जंगल की ओर. इस जंगल ने बाहें खोलकर किया परगासो का स्वागत.

दुसाधन की बेटी बन चुकी थी जंगल की बेटी. फिर यहीं गढ़ी में जा मिली वह भोले-भाले सुमेर सिंह से. यह मिलना साजिशन नहीं था, बल्कि वह सहज प्रेम था जो जीवन बुनता है. सुमेर सिंह अपने मीतों की दुनिया से बाहर निकलने लगे और परगासो की मुलाकात एक नई दुनिया से होने लगी. इस दुनिया में फिरंगी दुश्मनों का अस्तित्व था, बड़े राजा का संघर्ष था और थी परगासो पर टिकी पूरी एक भरोसे की दुनिया. परगासो पर सबको विश्वास था. भरोसा था कि वही मुक्ति का रास्ता निकालेगी. बड़े राजा तमाम हिचक के बावजूद परगासो पर भरोसा करते रहे. बड़े राजा के शुभचिंतक परगासो पर भरोसा करते रहे और परगासो खुद पर भरोसा करती रही. इस तरह फिरंगियों के खिलाफ एक भरोसे की दुनिया बुनता रहा उपन्यास 'बिसात पर जुगनू'.

इस उपन्यास में उम्मीद और निराशा के रेशे भी मिलेंगे आपको, जो बुनते हैं संघर्ष का रास्ता. इसी रास्ते पर बढ़ती चलती है परगासो. अपने सारे युद्ध जीतती रही वह, पर आखिरकार सुमेर के भोलेपन से न जीत सकी. फिर जब एक रात सुमेर जब अपनी आत्मग्लानि से दबा छपाक की आवाज के साथ अपने मीतों की दुनिया में चले गए तो फिर परगासो कहीं किसी अंधेरे में गुम हो गई हमेशा के लिए. फिर वह अपनी बस्ती में किसी को दिखाई न पड़ी.

लेकिन उपन्यास खत्म होने के बाद भी अगर परगासो अपने पाठकों को दिखती रह जाती है तो उसकी एक बड़ी वजह है दलित परगासो का अपने समाज की जकड़नों को तोड़ने का माद्दा. उसका परंपराभंजक होना. मुमकिन है इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को रचते हुए लेखिका का मकसद परगासो को शायद इस रूप में रचने का न रहा हो, लेकिन कहना होगा कि वंदना राग के अवचेतन में बसी परगासो ने लेखिका के मकसद से अलग जाकर अपना किरदार रचा और इसीलिए परगासो जाने के बाद भी बहुत देर तक पाठकों के जेहन में चलती रह जाती है.

इस उपन्यास की पूरी भाषा बेहद काव्यात्मक है. चाहे वक्त 1840 का हो या 2001 का, हर जगह उपन्यास में एक ऐसी भाषा पसरी हुई है, जो आपको ऊबने नहीं देती. इस उपन्यास के नाम पर गौर करें तो वह भी बेहद सांकेतिक और काव्यात्मक है 'बिसात पर जुगनू'. पूरे उपन्यास में ढेर सारे ऐसे छोटे-छोटे जुगनू आपको मिलेंगे जो गुलामी के खिलाफ अपनी गुमनाम-सी रोशनी फैला रहे हैं. लेकिन इन जुगनुओं को जब आप एकसाथ इस उपन्यास में देखेंगे तो महसूस करेंगे कि इनकी टिमटिमाती हुई रोशनी अचानक फ्लड लाइट में तब्दील हो रही है. सच है कि बिसात पर बैठे ये जुगनू इस उपन्यास से बाहर निकल कर अपनी-अपनी रोशनी की बिसात दिखा रहे हैं.

उपन्यास : बिसात पर जुगनू

लेखिका : वंदना राग

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 299 रुपये
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