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Book Review : अमेरिका 2020 - सबसे ताकतवर देश का बंटा हुआ चेहरा

अविनाश कल्ला की किताब.

किताब 'अमेरिका 2020- एक बँटा हुआ देश' ग्राउंड रिपोर्टिंग है. ऐसी ग्राउंड रिपोर्टिंग जिसमें समाचार के साथ विचार (News with Views) भी हैं. आप कह सकते हैं कि अविनाश कल्ला की यह किताब अमेरिकी चुनाव का इतिवृत्त पेश करने के साथ-साथ ट्रंप के दौर की पड़ताल करती हुई 'खोखले अमेरिका' की छवि पेश करती है.

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    अनुराग अन्वेषी

    अमूमन विधाओं के आधार पर किताबों की श्रेणियां तय कर दी जाती हैं. काव्य संकलन, कहानी संकलन, उपन्यास, लेख संग्रह, यात्रा वृतांत, डायरी, रिपोर्ताज... वगैरह... वगैरह. 'सर्वेश्वर दयाल सक्सेना' की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह में काफी पहले एक कविता पढ़ी थी - लू शुन और चिड़िया. गद्यात्मक शैली में रची यह कविता पढ़कर चौंक गया था. पढ़ते वक्त भी वह मुझे कविता ही लगी, पर उसकी शैली गद्य वाली थी. बाद के दिनों में गद्यशैली में लिखी और भी कई कवियों की महत्वपूर्ण कविताएं पढ़ने को मिलीं. तब यह बात समझ में आई कि बदलते वक्त के साथ काव्य शास्त्र की कसौटियों में कुछ और बातें जोड़े जाने की जरूरत है.

    अविनाश कल्ला की किताब 'अमेरिका 2020 - एक बंटा हुआ देश' पढ़ने के बाद एकबार फिर ऊहापोह वाली स्थिति है. इसे संस्मरण कहा जाए, यात्रा वृतांत कहें या रिपोर्ताज, या फिर कोई नई श्रेणी के लिए नया शब्द गढ़ा जाए. सच तो यह है कि यात्रा संस्मरण के बहाने यह किताब अमेरिकी चुनाव को लेकर एक तरह की रिपोर्टिंग है. लेकिन जब आप इससे गुजरते हैं तो यह महज रिपोर्टिंग नजर नहीं आती, अमेरिका के बारे में आपके भीतर एक ठोस राय भी बनाती जाती है. तो ऐसी स्थिति में श्रेणियां तय करने की परंपरागत शास्त्रीय कसौटियों को दरकिनार कर कहना पड़ता है कि यह किताब ग्राउंड रिपोर्टिंग है. ऐसी ग्राउंड रिपोर्टिंग जिसमें समाचार के साथ विचार (News with Views) भी हैं. आप कह सकते हैं कि अविनाश कल्ला की यह किताब अमेरिकी चुनाव का इतिवृत्त पेश करने के साथ-साथ ट्रंप के दौर की पड़ताल करती हुई 'खोखले अमेरिका' की छवि पेश करती है.

    'अमेरिका 2020- एक बँटा हुआ देश' अविनाश कल्ला की पहली किताब है. किताब लिखने से पहले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कल्ला 42 दिनों तक अमेरिका की खाक छानते रहे. इस दौरान अमेरिका में उन्होंने सड़क मार्ग से तकरीबन 18 हजार किलोमीटर की यात्रा की. वॉशिंगटन, न्यूयॉर्क, बोस्टन, शिकागो, मिल्वॉकी, साउथ डकोटा, सैन फ्रांसिस्को, लॉस बेगास, टेक्सास, फ्लोरिडा, जॉर्जिया, नॉर्थ कैरोलिना और वॉशिंगटन के लोगों से मिले. उनकी राय जानी, अपनी राय बनाई. इस किताब से गुजरते हुए आप साफ तौर पर महसूस करेंगे कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका सिर्फ वही नहीं है, जैसा मीडिया में दिखाया जाता है. इससे इतर ऐसा बहुत कुछ है अमेरिका में जो उसकी सबसे ताकतवर देश की बहुप्रचारित छवि से मेल नहीं खाता. मीडिया में अमेरिका सबसे विकसित और अमीर देश दिखता है. इसके बल पर उसकी सबसे ताकतवर देश की छवि बनती है. कल्ला की जुबानी कहें तो 'अपनी इस 42 दिनों की यात्रा में अमेरिका का जो असली रूप देखा वह हमारे सीमित नजरिये से देखे जाने वाले अमेरिका से काफी अलग है. मैंने सीमित नजरिया इसलिए कहा, क्योंकि मेरी तरह ज्यादातर लोगों के लिए अमेरिका वॉशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और लॉस बेगास तक ही सीमित है. हमें अमेरिका दिखाने वाले खबरिया चैनल वॉशिंगटन की राजनीति, न्यूयॉर्क की चकाचौंध, कैलिफोर्निया में सैन फ्रैंसिस्को की आईटी इंडस्ट्री और लॉस एंजेल्स में हॉलीवुड से आगे दिखाते ही नहीं. जब उनका नजरिया इतना सीमित है तो उससे हम अमेरिका जैसे बड़े देश को कैसे समझ पाएंगे.'

    राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अमेरिका के विभिन्न राज्यों में घूम-घूमकर अनुभवों का जो पिटारा अविनाश कल्ला ने खोला है, उससे अमेरिका की एक नई छवि हमारे सामने आती है. इस किताब में अपने 42 दिन की यात्रा के शुरुआती दिन को याद करते हुए कल्ला बताते हैं कि अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के निदेशक बेन वाइजनर ने उनसे कहा था 'आइ डोंट ट्रस्ट माई फेलो अमेरिकन्स'. यह बात उन्होंने ट्रंप के चुन लिए जाने को लेकर कहा था. वाइजनर ने लेखक को बताया था कि ट्रंप के चुने जाने से पहले उन्होंने कई अमेरिकियों से बात की थी और उनमें से कोई भी ट्रंप समर्थक नहीं था. लेकिन जब नतीजे आए तो वाइजनर हैरान रह गए. इसी संदर्भ में उन्होंने कहा था 'जब से 2016 में अमेरिका ने ट्रंप को राष्ट्रपति चुना, तब से मेरा अपने देशवासियों से भरोसा उठ गया.' इस प्रसंग की चर्चा के तुरंत बाद कल्ला 6 जनवरी 2021 को याद करते हैं जब अमेरिकी संसद पर ट्रंप समर्थकों ने हमला कर दिया था. ध्यान रहे इस दिन अमेरिकी कांग्रेस, कैपिटल हिल पर आधिकारिक तौर से जो बाइडन को राष्ट्रपति चुनने के लिए इकट्ठा हुई थी. ऐसे में जब ट्रंप समर्थकों ने यहां हमला किया तो सहसा विश्वास करना मुश्किल था कि अमेरिकी नागरिक अपनी ही संसद पर हमला कर देंगे. तो शायद इन्हीं परिस्थितियों और 42 दिन की अपनी यात्रा के दौरान लोगों से हुई बातचीत के आधार पर कल्ला ने अपनी किताब का नाम 'अमेरिका 2020 : एक बंटा हुआ देश' रखा.

    कल्ला की यह किताब अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया के बारे में बेहद आसान तरीके से समझाती है. कैसे यह भारतीय चुनाव प्रक्रिया से अलग है - आप इस किताब से गुजरते हुए साफ तौर पर यह महसूस सकते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति अपने मुल्क से बाहर भले ही बहुत शक्तिशाली इमेज रखता हो, पर वह अपने देश के नागरिकों के बीच एक सामान्य नागरिक से ज्यादा महत्व नहीं रख पाता. अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया के दौरान जिस तरह के सवालों के जवाब का सामना उम्मीदवारों को करना पड़ता है, उसकी कल्पना भारत में फिलहाल नहीं की जा सकती. यहां तो इंटरव्यू लेने से पहले नेताओं को सवालों की सूची पकड़ानी पड़ती है.

    इस किताब को पढ़ते हुए आपको पता चलेगा कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रंगभेद, सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोजगार, राष्ट्रवाद जैसे कई मुद्दों पर अमेरिकी मानस बिल्कुल बंटा हुआ था. अमेरिका में यह वैचारिक विभाजन इस बार बिल्कुल सतह पर दिखता रहा. अपनी इस किताब के सबसे अंतिम अनुच्छेद में अविनाश कल्ला अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की सबसे बड़ी चुनौती को रेखांकित करते हैं. वे लिखते हैं 'अमेरिका की छवि पर सबसे बड़ा धब्बा, 6 जनवरी, 2021 को उस वक्त लगा, जब कैपिटल पर हिंसा हुई. इस अप्रत्याशित घटना ने अमेरिका की साख पर एक अमिट दाग लगा दिया. अभी तक ऐसी घटनाएँ, अमेरिकी भाषा में, थर्ड वर्ल्ड कंट्री में होती थीं. यही धब्बा राष्ट्रपति जो बाइडन के समक्ष उनके राजनीतिक कैरियर की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है. जिस अमेरिका की कमान उन्हें मिली है उसका जनमानस आज बँटा हुआ है. इसलिए सारी दुनिया की नजरें उन पर रहेंगी कि वे अपने विभाजित राष्ट्र को किस तरह फिर से यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका बना पाते हैं.'

    हालांकि कल्ला की इस किताब में कहीं भी भारतीय राजनीति की कोई चर्चा नहीं की गई है, पर अगर आपमें जरा भी राजनैतिक चेतना है, अगर आप जरा भी अपने देश की वर्तमान राजनीति के बारे में सोचते हैं, तो यह किताब आपको अप्रत्यक्ष रूप से आगाह करती हुई दिखेगी. आप अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव और लोकतंत्र को नजरअंदाज करने वाले ट्रंप और उनके झूठे वक्तव्यों वाले कई संदर्भों को जोड़कर समझ सकते हैं कि जब कोई निरंकुश हो लोकतंत्र को कुचलकर आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो वह सत्ता से बाहर कर दिया जाता है. अमेरिका में तो यह सहज है कि कोई भी वहां के राष्ट्रपति को आमने-सामने कह सकता है कि आप झूठ बोल रहे हैं, लेकिन फिलहाल भारत के भीतर न तो यह आजादी है और न ही वह चेतना जो यह अपने नेता को कह सके - आप झूठ बोल रहे हैं. लेकिन ट्रंप का सत्ता से बेदखल किया जाना उस भारतीय जनमानस के लिए सुखद हो सकता है जो वर्तमान भारतीय राजनीति के पुरोधाओं की रणनीति से आहत हैं और भारत को एक विभाजित देश के रूप में महसूस कर रहे हैं.

    पुस्तक : अमेरिका 2020 - एक बँटा हुआ देश
    लेखिका : अविनाश कल्ला
    प्रकाशक : सार्थक (राजकमल प्रकाशन का उपक्रम)
    कीमत : 250 रुपये
    Published by:Anurag Anveshi
    First published: