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Book Review : नीलकंठी स्त्रियों की अंतर्कथाओं का संग्रह 'मत जाओ नीलकंठ'

अर्चना सिन्हा का कहानी संग्रह 'मत जाओ नीलकंठ'.

अर्चना सिन्हा का कहानी संग्रह 'मत जाओ नीलकंठ'.

इस संग्रह की पांचों कहानियों में कथाकार अर्चना सिन्हा ने स्त्रियों के जिस अदृश्य संसार से पाठकों का परिचय कराया वहां घुटन है, टुटन है, द्वंद्व है, समझौता है. अर्चना सिन्हा के लेखन की एक खासियत यह भी है कि उनके पात्र आपको अपने आसपास के दिखेंगे, पारिवारिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों का निर्वहन करते हुए. पर उनकी वैचारिकी एक नई दुनिया रचती मिलेगी.

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'एक मुलाकात के बाद लौट कर यह जो होना था कहानी का अंत - मत जाओ नीलकंठ'. यह वाक्य मेरा रचा हुआ नहीं है. दरअसल यह कोई वाक्य है भी नहीं. यह तो उन पांच कहानियों के नाम हैं, जो अर्चना सिन्हा के कहानी संग्रह 'मत जाओ नीलकंठ' में शामिल हैं. इस संग्रह की पहली कहानी है 'एक मुलाकात के बाद', दूसरी कहानी 'लौट कर', तीसरी कहानी 'यह जो होना था', चौथी कहानी 'कहानी का अंत' और पांचवीं कहानी है 'मत जाओ नीलकंठ'. सच है कि कहानियों के नाम के क्रम से बने इस वाक्य से जो भाव पैदा हो रहा है, वह इन कहानियों में व्यक्त मध्यवर्गीय स्त्रियों की कशमेकश, उनके ऊहापोह और उनके द्वंद्व बताने में कामयाब है. तर्क और विचार के स्तर पर यह बात बहुत दकियानूसी लग सकती है कि लेखक खुद नहीं लिखता, बल्कि कोई ताकत है जो उससे लिखवाती है. यह महज संयोग है कि कथा संकलन तैयार करते वक्त अर्चना सिन्हा ने अपनी कहानियों का जो क्रम में तय किया, उससे एक वाक्य जैसा बन गया. और यह वाक्य उनकी पांचों कहानियों के मुख्य स्त्री पात्रों की मनोदशा में जो एक जैसा द्वंद्व है, उसका प्रतिनिधित्व करता है.

इनकी पांचों कहानियों में केंद्रीय पात्र मध्यवर्गीय स्त्री है. ये स्त्रियां ऐसी हैं जो विचार करना जानती हैं, तर्क करना जानती हैं, जिरह करना जानती हैं, अपनी भावनाएं नियंत्रित करना (मार देना) जानती हैं. इन स्त्रियों के इन त्याग और समर्पण पर हमारा पुरुष समाज गर्व कर सकता है. कह सकता है कि ये स्त्रियां लोक लाज की रक्षा करना जानती हैं. ये परिवार की मर्यादाओं का ख्याल रखना जानती हैं. इसलिए कहना पड़ता है कि ये कहानियां इस भारतीय समाज के हर उस पुरुष को जरूर पढ़नी चाहिए, जो बार-बार स्त्री को 'देवी' के रूप में प्रतिष्ठित कर उसके भीतर के स्त्री मन की हत्या करता है. उसे देवी के रूप में ही देखना चाहता है, किसी हाड़-मांस की सजीव स्त्री के रूप में सामने आते ही पुरुषों को अपनी परंपरा याद आ जाती है, अपने संस्कार याद आ जाते हैं और सामाजिक मर्यादाएं भंग होने लग जाती हैं.

इन कहानियों से गुजरते हुए स्त्री की घुटन से परिचय होता है. अधिकतर भारतीय पुरुष स्त्रियों की इस घुटन भरी दुनिया से अनजान हैं. अर्चना सिन्हा के इस संग्रह की सभी कहानियों में घुटती हुई स्त्री आपको मिलेगी और आप अचानक महसूस करेंगे कि ये स्त्रियां किसी और समाज की नहीं, बिल्कुल आपके पड़ोस की और आपके घर की हैं. इस संग्रह की सभी कहानियां हिंदी की जानी-मानी पत्रिकाओं में पहले छप चुकी हैं और चर्चा में भी रही हैं. संग्रह की पहली कहानी है 'उस मुलाकात के बाद'. इसकी नायिका रेवा से मिलने के बाद आप स्त्रियों की सहज तार्किकता से अचंभित होते हैं और उस सहजता पर उसका प्रेमी संदेह की जितनी परतों के बीच से अपने तर्क बुन रहा होता है, अंततः वैसे तर्क आपने भी अपने जीवन में कभी न कभी किया होगा. कथाकार ने इस कहानी में अपने पात्रों की मनोदशा उभारने के लिए महज संवादों का सहारा नहीं लिया, बल्कि उनके हाव-भाव का पूरी सूक्ष्मता से वर्णन किया है. रेवा और प्रेमी विवेक के बीच हो रही बातचीत की महज यह दो पंक्ति देखें -

-''तुम्हारे सभी पुरुष मित्रों से नहीं रेवा, तुम्हारे इस मित्र से।'' - विवेक ने 'इस' पर जोर देते हुए कहा था।
-''इसलिए क्योंकि मैं उसकी इंटेलेक्चुअलिटी की प्रशंसा करती हूं?'' रेवा की भवें जुड़ने लगी थीं। (पृष्ठ संख्या 16)

इसके बाद के संवाद में रेवा अपने तर्क रख रही होती है और विवेक अपनी मान्यताओं के चौखट में बंधा दिखता है और पाठक रेवा की जुड़ती भवों को विवेक की मर्दवादी मान्यताओं के साथ टेढ़ी होते देखता रहता है. इस तरह यह बात खुलती जाती है कि पुरुष मन स्त्री को समझने में नाकाम रहा है.

इस संग्रह की दूसरी कहानी है 'लौट कर'. इस कहानी में मनीषा अपनी मां और अपने पिता के लिए अपने प्यार अमर का त्याग करती है और उसकी शादी राकेश नाम के लड़के से हो जाती है. मनीषा ने अपने संस्कारों से मिले पुत्री धर्म का पालन तो मजबूरी में कर लिया, लेकिन वह दृढ़ता से अपने प्यार के प्रति भी समर्पित है. उसने पहली रात ही अपने पति से राकेश से इस बारे में बात की और तय कर लिया कि कुछ समय बीतने के बाद वह अमर के साथ अपना जीवन गुजारेगी. इधर राकेश के जीवन में भी कैथी नाम की प्रेमिका रही है. राकेश की भी ख्वाहिश है कि वह कैथी के साथ जीवन बिताए. तो राकेश और मनीषा शादी के बाद साथ रहते हैं सिर्फ अच्छे दोस्त की तरह. एक-दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं. लेकिन स्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि इन दोनों का पिछला प्यार टिक नहीं पाता. इस बीच इतने दिन साथ रहते हुए मनीषा और राकेश एक-दूसरे को बहुत हद तक समझने लगते हैं. फिर दोनों साथ रहने का फैसला कर लेते हैं. इस पूरी कहानी की बुनावट में घर-परिवार का वह तनाव और प्रेम पा लेने की छटपटाहट हर पल आप महसूस करते हैं. इसके पात्र जितने पारंपरिक दिखते हैं, उतने ही वे परंपराभंजक भी हैं. चरित्रों में परंपरा और आधुनिकता के बीच जो संघर्ष है, वह इस कहानी का केंद्र है.

तीसरी कहानी 'यह जो होना था' में पति-पत्नी के बीच का तनाव है. पति शेखर के विवाहेतर संबंध की जानकारी पत्नी दिव्या को हो चुकी है. इस पूरी कहानी में दिव्या का मौन बोलता रहता है. शेखर को जब अपनी चूक का अहसास होता है तो वह दिव्या के पास लौटना चाहता है, पर दिव्या का मौन प्रतिकार मुखर होकर बोलता है. वह अपना कमरा बंद कर सोने लगी थी. लेकिन बाद के दिनों में उसने कमरे का दरवाजा भी बंद करना छोड़ दिया. शायद वह अपने मन की घृणा, अपमान, प्रतिकार सबसे मुक्त हो चुकी है. इस कहानी का अंत संग्रह की दूसरी कहानियों से अलग है. दिव्या किसी भी हाल में शेखर को माफ नहीं कर सकती. जबरदस्ती बनाए गए संबंध का अंत दिव्या के घर से चले जाने के रूप में होता है. दिव्या की दुनिया से जब आप रू-ब-रू होते हैं, तो वहां उसकी पूरी टूटन दिखती है. आप ठगे से रह जाते हैं यह देखकर कि पति के विवाहेतर संबंध की जानकारी के बाद भी दिव्या न चीखी, न चिल्लाई, न झगड़ी, न कोई और कदम उठाया. बस उसने चुप्पी साध ली. ऐसी चुप्पी जिससे घर की मर्यादा बची रही. आप समझ सकते हैं कि घर की मर्यादाओं की नींव स्त्री की घुटन से बनती है. मर्यादा नाम की जो इमारत खड़ी दिखती है, उस इमारत के नीचे स्त्रियों की कितनी ख्वाहिशें दबी होती हैं.

चौथी कहानी है 'कहानी का अंत'. यह एक अधूरी प्रेम कहानी है. बाकी कहानियों के मुकाबले लंबाई में छोटी. इस कहानी की नायिका का नाम देवी है. लेखिका ने इस नायिका के रूप-रंग को लेकर महज इशारा भर किया है कि वह उतना खूबसूरत और आकर्षक नहीं है, जितना उसका हृदय खूबसूरत है. इस कहानी की नायिका देवी अपने काम से, अपने व्यवहार से खुद को स्थापित करने की जुगत में हमेशा लगी रहती है. वह त्याग और समर्पण की देवी बन जाना चाहती है. एक इत्तफाक कि उसका क्लासमेट सतीश उसके ही शहर में नौकरी करने आ गया है. पुराने परिचय के बाद अब नजदीकियां बढ़ने लगी हैं. देवी के मन में प्रेम फूट पड़ा है. सतीश भी उसका बेहद ख्याल रखता है. लेकिन कहानी में एक नाटकीय मोड़ आता है और नायक अपनी मां की बीमारी का तार पाकर अपने शहर जाता है और वहां शादी के बंधन में बंध जाता है. यहां पर पाठक अनुभव करता है देवी के व्यवहार और बुद्धि की खूबसूरती और उसका अति सहृदय होना, यह सब कुछ अपने चेहरे के मर्दानेपन को ढंकने की कोशिश रहे होंगे. प्यार की अकुलाहट से लेकर बिछोह के मार्मिक अंत तक आपको यह कहानी बेहद सजगता के साथ ले जाती है.

इन कहानियों से गुजरते हुए जो बात सबसे ज्यादा खटकी, वह है किताब में हिज्जे की अशुद्धियां. 120 पन्ने के इस संग्रह में प्रूफ काफी चूकें हैं. जाहिर है कि प्रकाशक ने किसी प्रफेशनल प्रूफ रीडर से यह काम नहीं कराया. पर यह चतुराई व्यवसाय के लिहाज से तो नुकसानदेह है ही, लेखक के लिए भी बेहद तकलीफदेह. आशा की जानी चाहिए कि अगले संस्करण में ये चूकें दुरुस्त कर ली जाएंगी.

इस संग्रह की पांचों कहानियों में कथाकार अर्चना सिन्हा ने स्त्रियों के जिस अदृश्य संसार से पाठकों का परिचय कराया वहां घुटन है, टुटन है, द्वंद्व है, समझौता है. अर्चना सिन्हा के लेखन की एक खासियत यह भी है कि उनके पात्र आपको अपने आसपास के दिखेंगे, पारिवारिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों का निर्वहन करते हुए. पर उनकी वैचारिकी एक नई दुनिया रचती मिलेगी. यह वैचारिकी गला फाड़कर स्त्री आजादी का नारा नहीं लगाती. बल्कि बेहद शांत परिवेश में, बिल्कुल आहिस्ता-आहिस्ता, बिल्कुल मद्धम स्वर में वह उन मूल्यों का विरोध करती दिखेंगी जो स्त्री की आजादी को बंधक बनाते हैं. आप इन स्त्री पात्रों की शालीनता पर मुग्ध होंगे और इनकी तार्किकता से सहमत होते हुए इनके विद्रोह के आगे सिर नवा लेना चाहेंगे.

अर्चना सिन्हा की कहानियों का नरेटर पात्रों को जीवंत कर देता है. वह सिर्फ संवादों या परिवेश का ही वर्णन नहीं करता, बल्कि अपने पात्रों के के अंतर्द्वंद्व और मनःस्थितियों का बारीक चित्रण भी करता है और विश्लेषण का काम पाठकों पर छोड़ देता है. इस अर्थ में कहानीकार अर्चना सिन्हा अपनी कोई मान्यता थोपती नहीं दिखतीं, बल्कि बड़ी सरलता से अपने पात्रों का बड़ा से बड़ा विद्रोह, गंभीर से गंभीर समझौता और उनके मन की गहराइयों में पैठा प्रेम नरेटर के जरिए ही पेश कर देती हैं.

संग्रह की अंतिम कहानी है 'मत जाओ नीलकंठ'. नायिका वंदना 50 पार की महिला हैं, उनके पति रिटायरमेंट के बाद भी कहीं नौकरी करते हैं. पड़ोस में किसी फर्मा कंपनी में काम करने वाले युवा नीलकंठ रहते हैं. यह कहानी मनोवैज्ञानिक स्तर पर बहुत धीरे-धीरे खुलती है. परत-दर-परत प्रेम, द्वंद्व, कोमलता, आतुरता और बेचैनी-बेकरारी दिखती जाती है. वंदना के संसार में जब लेखिका के संग आप जाते हैं, तो वहां आपको वंदना जी का अपना एक आकाश दिखेगा. आकाश के इस हिस्से में वंदना जी बेबाक और बेलौस उड़ती हैं. वह अपने इस आकाश को हर किसी से छुपा कर रखती हैं. नीलकंठ की गैरमौजूदगी में भी उन्हें वह महसूसने लगती हैं. लेकिन जब नीलकंठ अपने तबादले के संग अपने शहर लौटने लगता है तो वंदना जी जैसे धड़ाम से अपने आकाश से गिर पड़ती हैं.

अर्चना सिन्हा की कहानी 'मत जाओ नीलकंठ' की वंदना जी को याद करते हुए आप महसूस करेंगे कि शादीशुदा अधेड़ महिला के मन में कैसे कोई प्रेम अपनी जगह तलाशने लगता है. कैसे एक अधेड़ और धीर-गंभीर महिला प्रेम की किलकारियों से बेचैन हो जाती है? कैसे वह खुद को रोकना चाहती है, और जितना रोकना चाहती है, प्रेम में उतना ही डूबती जाती है. आखिर एक अधेड़ महिला अपने आसपास से क्या उम्मीद करती है, उसकी आकाक्षाएं क्या हो सकती हैं, सही और गलत का तर्क उसे कैसे मथता है? ये सारे मनोवैज्ञानिक पक्ष आपको अर्चना सिन्हा की कहानियों में मिलेंगे, लेकिन खास बात यह कि इनके वर्णन में दुहराव नहीं मिलेगा.

'मत जाओ नीलकंठ' की वंदना जी के भीतर प्रेम और ईर्ष्या की एक बानगी देखिए कि कैसे उनका नैरटेर स्थितियों के वर्णन से अपने पाठकों के सामने प्रेम का आवेग पेश करता है - 'वन्दना जी सचमुच अलग लग रही थीं। शादी में आये लोगों ने भी उन्हें ध्यान से देखा। अपार्टमेंट में रहने वाली महिलाओं ने ही नहीं युवतियों ने भी उनकी प्रशंसा की। सबों की बातों का उत्तर देते हुये वन्दना जी की दृष्टि अनजाने ही नीलकंठ की ओर उठ गयी। वह हल्के से मुस्कुराया और वन्दना जी समझ गयीं, वह भूला नहीं था उस दिन की बात को। 'तो उसने सचमुच मेरे सुन्दर लगने को देखा।' न चाहते हुये भी एक संतोष उनके मन में उतर आया - शृंगार सार्थक होने जैसा। वन्दना जी स्वयं में ही सकुचा गयीं। उन्होंने अपने मन को आसपास की महिलाओं से बातों में लगाने की चेष्टा की लेकिन आँखें बार-बार नीलकंठ के पीछे भाग जातीं। वह दो टेबल आगे वर्मा जी और दो पुरुषों के साथ बैठा था। उसके सामने वाले टेबल पर चार-पाँच लड़कियाँ बैठी हुई थीं। उसके सामने पड़ने वाली लड़की काफी सुन्दर थी। खूब हँस-हँस कर बातें कर रही थी। नीलकंठ ने शायद आवाज से आकर्षित हो कर उधर देखा। उस लड़की को देखते हुये पूरे झुंड पर नजर डाली और एक बार फिर उस लड़की को दो पल देख कर वर्मा जी की बातें सुनने लगा। लड़की फिर जोर से हँसी। नीलकंठ ने फिर सर उठा कर देखा। वन्दना जी को अपनी साँस रुकती सी लगी। उन्होंने अपने भीतर उठती ईर्ष्या की लहर को महसूस किया। अपनी इस सोच पर थोड़ी क्षुब्ध भी हुयीं लेकिन उन्होंने खुद को माफ कर दिया। आजकल कुछ भी तर्क के अनुसार हो कहाँ रहा था। थोड़ी देर के बाद नीलकंठ ने घड़ी देखी और वर्मा जी से कुछ कहा। उन्होंने भी सर हिलाया और दोनो कुर्सी से उठ गये। वन्दना जी को अपनी ओर देखता पा कर उन्होंने खाने की ओर इशारा किया तो वो अपनी बगल वाली महिला से क्षमा माँगती हुई उठ गयीं। और एक बार फिर सब कुछ अच्छा-अच्छा था। खाने की लाइन में उनकी बाँह से बार-बार छूती हुई नीलकंठ की बाँह। अपने रोओं की सिहरन महसूस करती वन्दना जी एक-दो बार अपनी प्लेट में बिना कुछ लिये हुये ही आगे बढ़ गयीं। हर बार नीलकंठ ने उनकी प्लेट में डाला या फिर लेने की याद दिलाई। वन्दना जी मुस्कुराती रहीं।' (पृष्ठ संख्या 110-111)

इस कहानी में भी प्रेम की यह अकुलाहट अंततः खाली जाती है. नीलकंठ अपने शहर लौट जाता है. और वंदना जी चाह कर भी नहीं कह पाईं - मत जाओ नीलकंठ. कहना पड़ेगा कि स्त्री मन की परतों के बारीक विश्लेषण से पाठक यह बात समझ पाते हैं कि स्त्रियां नीलकंठी होती हैं. पग-पग पर जहर पीती हैं, लेकिन उसे गले से नीचे उतरने नहीं देतीं, हलक में ही रोके रखती हैं. लेकिन इन्हें हमारा समाज नहीं देख पाता या कहें कि देखना नहीं चाहता. स्त्री की यह दुनिया उसके मन की कई परतों के नीचे दबी रहती है. और बाहर से हम महज यह देख पाते हैं कि वे समर्पण, त्याग, प्रेम और मातृत्व की मूर्ति हैं.

इस संग्रह की तीन कहानियां बेहद लंबी हैं, मगर उबाऊ नहीं. अर्चना सिन्हा के लेखन की यह खासियत है कि जब आप कहानी पढ़ना शुरू करते हैं तो कहन का अंदाज आपको लगातार बांधे रहता है और आप इन कहानियों को एक ही बैठक में पूरा कर लेना चाहते हैं. तो अपने आकार में लंबी होने के बावजूद इन कहानियों में वह रोचकता बनी रहती है, वह बहाव और आकर्षण बना रहता है जो कहानी के पाठ्य की पहली शर्त होते हैं. अपनी कहानियों में अर्चना सिन्हा ने जिस तरह से मध्यवर्गीय स्त्री पात्रों को जीवंत किया है, वह लंबे समय तक पाठकों के मन-मस्तिष्क में दर्ज रहती हैं. कहना चाहिए कि अर्चना सिन्हा का कहानी संग्रह 'मत जाओ नीलकंठ' वाकई में नीलकंठी स्त्रियों की अंतर्कथा है.

पुस्तक : मत जाओ नीलकंठ
लेखिका : अर्चना सिन्हा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
कीमत : 150 रुपये

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