Book Review : सिहराती हैं साहिर की ये रचनाएं

साहिर लुधियानवी की 516 रचनाओं का संकलन और संपादन किया है आशा प्रभात ने.

जब साहिर का लिखा आप पढ़ते हैं ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर एक फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’ तो आपको अपनी कई ऐसी फिक्र याद आती हैं जिन्हें आपने बेफिक्री के साथ भुला दिया.

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साहित्य लेखन को हमसब बहुत गंभीर और अलग किस्म का काम मानते हैं. एक ऐसा काम जो सामान्य समझ और सामान्य भाषा का आदमी नहीं कर सकता. इस काम के लिए आदमी को विशिष्ट बनना पड़ता है, उसे अपनी भाषा विशिष्ट बनानी पड़ती है. पर क्या हमें सोचने की जरूरत नहीं कि विशिष्ट भाषा किसे कहें? विशिष्ट समझ किसे कहें? क्या एक ऐसी भाषा जो आम आदमी की समझ से परे हो, जिसके भाव आम आदमी सहज रूप में ग्रहण न कर सके, जिसे समझने के लिए शब्दकोशों की जरूरत पड़े या फिर जिसके भाव समझने के लिए किसी और की सहायता लेनी पड़े, को हम विशिष्ट मानें? या फिर उसे विशिष्ट मानें जो सहज रूप में हमारे भीतर पैठ बनाती जाती है और हमारा परिचय एक नई दुनिया से कराकर हमें विशिष्ट बना जाती है. जाहिर है यह दूसरी स्थिति ज्यादा लुभाती है और ज्यादा विशिष्ट लगती है.

विशिष्टता की इस दूसरी कसौटी पर साहिर लुधियानवी खड़े दिखते हैं. आशा प्रभात ने साहिर की लगभग तमाम रचनाओं का संकलन और संपादन किया है. ‘जब धरती नग़्मे गाएगी’ में कुल 516 रचनाएं हैं. साहिर की रचनाओं का यह संकलन राजकमल प्रकाशन से छपकर आया है. 468 पन्नों का यह संकलन कई मायनों में खास है. एक बात तो यह है कि जिन गीतों, गजलों और नज्मों को सुनते हुए उनके साहित्यिक अवदान पर ध्यान नहीं जाता, वे पुस्तक रूप में संकलित होकर अचानक हमारा ध्यान थोड़े अलग किस्म से खींचते हैं. सुनते वक्त गीत एक खास सिचुएशन में बंधकर अर्थ देते हैं, लेकिन प्रकाशित गीत हमें उसके विस्तारित अर्थ तक ले जाते हैं. साहिर के नग्मों, नज्मों, गजलों और गीतों से गुजरते हुए कई बार हिंदी साहित्य के खूब चर्चित कई-कई नाम याद आते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता है? दरअसल, दृश्यों के साथ गीत या गजल सुनते वक्त हमारे जेहन में वह काव्य तत्त्व अनदेखा रह जाता है जो पढ़ते वक्त हमारी संवेदनाओं को छू लेता है. इन रचनाओं को पढ़ते वक्त आपके सामने एक नया रचना संसार खुलने लगता है. आप जीवन के सूक्ष्म मानवीय संवेदना से मुलाकात करते हैं. जब साहिर का लिखा आप पढ़ते हैं ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर एक फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’ तो आपको अपनी कई ऐसी फिक्र याद आती हैं जिन्हें आपने बेफिक्री के साथ भुला दिया. इसी तरह ‘अच्छों को बुरा साबित करना, दुनिया की पुरानी आदत है’, दुनिया की इस आदत से आप परिचित हैं, लेकिन जब इसे साहिर की रचना के तौर पर पढ़ते हैं तो पल भर विचार करने को रुक जाते हैं. आपको लगता है कि यह तो बिल्कुल सही बात कह रहे हैं. यह अलग बात है कि इसकी अगली पंक्ति को पढ़ते हुए ऐसी गीतों की सीमा का भी ध्यान आता है कि ये सिचुएशनल लिखी गई पंक्तियां हैं – इस मय को मुबारक चीज समझ, माना कि बहुत बदनाम है ये.

वैसे साहिर की रचनाओं का एक दूसरा सच यह भी है कि ये जीवन के मर्म से निकली हुई हैं. उन्होंने जीवन में जिस तल्खी को जीया, जो अकेलापन उनके भीतर बजता रहा, जिन तनावों से वे गुजरे – इन सबने साहिर को थोड़ा-थोड़ा रचा. शायद यही वजह है कि बीड़ी जलइले पिया वाला गुलजार का खिलंदड़ापन साहिर की रचनाओं में नहीं दिख पाता. वहां जीवन की उदासी, उसकी दार्शनिकता और उम्मीद ज्यादा दिखती है. साहिर ने अपने आपको कई बार रचा. खुद को बिल्कुल तोड़कर फिर अपने को नए रूप में पेश किया. अपने इन्हीं अनुभव को वे कह बैठते हैं – चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों...

जाएं तो जाएं कहां जैसे गीत भले साहिर ने सिचुएशनल लिखा हो, लेकिन कहना होगा कि ऐसी पंक्तियां जीवन का वही कलाकार लिख सकता है जिसने भीड़ में रहते हुए भी एकाकी जीवन जीया हो. इस एकाकीपन में रहते हुए उन्होंने कई नकली चेहरे देखे होंगे और जब ऐसी ही स्थिति के लिए उनसे लिखने को कहा गया तो वह लिख बैठते हैं – जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग, एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं लोग. या फिर वे आपसे ही पूछ बैठते हैं कि मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूं.

आखिर जीवन की इतनी संजीदगी से भरे गीतों को हम साहित्य की श्रेणी से बाहर कैसे रख सकते हैं. जहां तक विशिष्टता की बात है तो यह कहना होगा कि सिचुएशन के मुताबिक लिखने के लिए रचनाकार का विशिष्ट होना तो अनिवार्य है ही और यह विशिष्टता जीवन के अनुभवों से आती है. जीवन की बारीकियों को समझने से आती है. कहना न होगा कि इस मायने में भी साहिर विशिष्ट रचनाकार हैं. यह अलग बात है कि साहित्यकारों की लामबंदी फिल्मी गीतकारों को दोयम दर्जे का रचनाकार बताने की साजिश रचती रही है या फिर वह उन्हें साहित्यकार के रूप में स्वीकार करना नहीं चाहती. लेकिन ऐसी चाहतों से साहिर जैसे किसी भी रचनाकार का कद छोटा नहीं होता बल्कि उससे साहित्य को अपनी जायदाद समझने वालों का ओछापन ही सामने आता है.

साहिर की रचनाओं के इस संकलन की एक खासियत यह भी है कि इसमें गीतों के साथ फिल्मों के नाम, उनके वर्ष, संगीतकार और गायकों के नाम भी दर्ज किए गए हैं. आशा प्रभात ने साहिर की 516 रचनाएं जुटा कर अपने संपादन में जो समग्र तैयार किया, वह वाकई पाठकों के लिए संग्रहणीय बन पड़ा है.

संग्रह का नाम : जब धरती नग़्मे गाएगी
संकलन और संपादन : आशा प्रभात
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
मूल्य : 450 रुपये

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