Book Review : जीवन में आगे बढ़ना है तो मछलियों को सीखना होगा उड़ना

66 कविताओं का संग्रह 'पीठ पर रोशनी'

सुखद है कि ‘पीठ पर रोशनी’ संग्रह की कविताओं ने नीरज नीर के व्यक्तित्व से परिचय कराने का काम बड़ी सरलता से किया है. और यह किसी भी रचनाकार के लिए सम्मान की बात होती है कि उसकी रचना पाठकों से उसका परिचय कराए, कोई राय बनाए.

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किसी रचनाकार की छिटपुट कविताएं पढ़कर जो धारणा बनती है, वह उसकी कविताओं के संग्रह को पढ़कर बदल सकती है. यह बात नीरज नीर की कविताओं के संग्रह ‘पीठ पर रोशनी’ पढ़ने के बाद महसूस की. रांची के नीरज नीर को व्यक्तिगत स्तर पर पहले नहीं जानता था. हालांकि किसी कवि की रचनाओं को समझने के लिए कई बार यह जरूरी होता है कि आप उसके निजी और सामाजिक परिवेश से परिचित हों. पर यह सुखद है कि ‘पीठ पर रोशनी’ संग्रह की कविताओं ने नीरज नीर के व्यक्तित्व से परिचय कराने का काम बड़ी सरलता से किया है. और यह किसी भी रचनाकार के लिए सम्मान की बात होती है कि उसकी रचना पाठकों से उसका परिचय कराए, कोई राय बनाए.

प्रलेक प्रकाशन से आए नीरज नीर के इस संग्रह में कुल 66 कविताएं हैं. आवरण कविताओं के अनुकूल है और आकृष्ट करता है. नीर ने अपनी इन कविताओं को पांच खंडों में बांटा है. ये खंड हैं – आग, पानी, वायु, आकाश और क्षितिज. इन खंडों की कविताएं पढ़ते हुए आपको इनकी सार्थकता दिखने लगती है. मसलन, क्षितिज की कविताओं में आपको तमाम विषय एकाकार होते दिखेंगे. क्षितिज के तहत दर्ज कविताएं आपको ध्यान दिलाती हैं कि यह समाज कई बार मूल मुद्दों से भटककर किसी और बहस में उलझ जाता है. और तिसपर दुखद यह कि मूल मुद्दा कहां गुम हो गया और नकली मुद्दे कब मुख्य बहस में आ गए – इसपर हमारा ध्यान ही नहीं जाता.

इस संग्रह में कई कविताओं के साथ उन्हें रचे जाने की तारीख भी दी गई है. संपादन के दौरान में इन तारीखों को क्रम देने के बजाए विषय और विचार को तरतीब दिया गया है. इससे कवि की विचार शृंखला की कड़ी मजबूत होते दिखती है. इस संग्रह में शामिल पहली कविता स्त्री और मानवता के पक्ष में खड़ी ‘सभ्यता का अंत’ है. कवि मानता है कि सभ्यताएं तब मरनी शुरू होती हैं जब हम स्त्रियों और मानवता को कुचलना शुरू करते हैं. इसलिए चाहे मरी हुई सभ्यता हो या विलुप्त हो गई सभ्यता, उसकी मिट्टी और उसके द्वार पर किसी स्त्री की चीख हमें सुनाई देती रहेगी, उसकी जली हुई लाश हमें मिलेगी, उसका चीथड़ा अस्तित्व हमें मिलेगा. यह कविता 14 दिसंबर 2019 को रची गई है. लेकिन इसके ठीक बाद दूसरी कविता 20 मार्च 2018 को रची गई है. यानी अपने रचे जाने के क्रम में वह पहले है, पर संग्रह में उसे जगह बाद में मिली है. अंधविश्वास पर करारा प्रहार करती इस कविता का शीर्षक है ‘ईश्वर’. कहा जा सकता है कि कवि के लिए सभ्यता ज्यादा जरूरी है, सभ्यता को रचनेवाली स्त्री ज्यादा जरूरी है, बनिस्बत ईश्वर. ‘ईश्वर’ कविता में नीर लिखते हैं –

दुकानदार की चतुराई और ग्राहक के भोलेपन पर
निर्भर करता है ईश्वर का शक्तिशाली होना
इन दुकानों में जाने की पहली शर्त है
अंधापन
आंख वालों को रखा जाता है दूर
आंखें तरेरकर...

इस संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए महसूस होता है कि कवि की निगाह में झारखंड की संस्कृति और सम्मान, परंपरा और पहचान, विस्थापन और सवाल – सब हैं. इन मुद्दों पर वह अपनी कविताओं में बहस करता है और कई बार किसी नतीजे तक अपने पाठकों को ले जाता है. नीर की एक ऐसी ही कविता है ‘विस्थापन-2’. इस कविता में वर्तमान स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट दिखती है. वह पाठकों को बतलाते हैं कि जरूरत पड़े तो अपनी मूल प्रकृति छोड़ कर नई प्रकृति विकसित करो. खुद को वक्त से आगे बढ़कर ढालने की एक जिद का समर्थक दिखता है रचनाकार. वह लिखते हैं –

मछलियां बेचैन हैं,
जीवित रहने के लिए
मछलियों को सीखना होगा उड़ना...

मछलियों को प्रतीक बनाकर लिखी गई इस कविता में कवि ने बताया है कि मछलियों की समस्याएं बड़ी हैं. उन्हें बगुलों से शिकायत नहीं रह गई, क्योंकि उन्होंने सहजीविता सीख ली है. मछलियों को विशाल हाथियों से भी खतरा है जो पानी में उतर आए हैं विकास और प्रगति का बैनर लिए. इसलिए तो मछलियां मानती है कि विकास उनके लिए विनाश है.

‘किसान की उम्र’ शीर्षक से लिखी गई कविता बहुत ही सहजता से असमय बूढ़ा हो रहे किसान के जीवन के संताप को उजागर करती है. ‘जंगल का विकास वाया सड़क’ जैसी कविताएं आदिवासी समाज के संकट का प्रतिनिधित्व करती हैं. रचनाकार स्वीकार करता है कि आदिवासी इलाकों के जंगल बड़ी तेजी से उजड़े गए. उनके उजड़ने का शुरुआती पता किसी को नहीं चला. सबने उसे बेहतरी की तरह देखा. और बाद में यह बात समझ में आई कि हमारी हरियाली लुट चुकी है और जिसे हम जिंदगी की हरियाली समझते रहे दरअसल वह उजाड़ होने की शुरुआत रही. आदिवासी समाज के इस भोलेपन के दोहन को रेखांकित करते हुए नीर लिखते हैं -

किसी ने नहीं देखा
जंगल के पैर, पंख उगते हुए
पर अब वहां जंगल नहीं है
न जाने किसी अदृश्य दिशा की ओर
जंगल, कर गया प्रस्थान
बिना किसी शोर शराबे
हिल हुज्जत के...

जंगल के पीछे-पीछे गायब हो गए
चुपचाप
जीव-जंतु, कुएं का पानी
गीत और मांदर भी...

अब वहां उग आये हैं
पेड़ों से भी गहरी जड़ें जमायें
कारखाने, खदान और बड़े-बड़े भवन...

इस संग्रह का नाम जिस कविता से लिया गया है वह झारखंडी चेतना के सर्वहारा वर्ग की चिंता करती हुई कविता है. नीर की यह कविता संकेत करती है कि झारखंड की खनिज संपदा से ही देश के दूसरे इलाके रोशन हैं. यहां के कोयला खदानों से आने वाला राजस्व देश के विकास को स्वर देता है, बावजूद इलाके में विकास का सूरज उगता नहीं, बल्कि कोयला खदानों में डूब जाता है. देश को रोशन करने का जिम्मा हमें सौंपा गया है, हमारी ही पीठ पर रोशनी रखी गई है, पर दीया तले अंधेरा होता है सो हमारे चेहरे अंधेरे में हैं. इसी कविता में इलाके की बदहाली को लेकर कवि का दर्द छलकता है और वह कह बैठता है –

हम एक मुल्क में रहकर भी
रहते हैं अलग-अलग मुल्क में

कहना होगा कि यही हाल साहित्यिक समाज में भी है. यहां भी अलग-अलग मठाधीशी है. कोई इस मठ का तो कोई उस मठ का, जो रचनाकार इन मठों से दूर अपना कुछ अलग रच रहा है, उसके सामने पहचान का संकट है. यह संकट झारखंड जैसे प्रदेश के कई बुजुर्ग और युवा रचनाकार झेलने को अभिशप्त हैं. लेकिन उम्मीद जगती है कि पीठ पर जो रोशनी लेकर नीरज नीर चले हैं, उसका उजाला देर से ही सही पर उन्हें रोशन जरूर करेगा.

संग्रह : पीठ पर रोशनी
कवि : नीरज नीर
प्रकाशक : प्रलेक प्रकाशन
मूल्य : 200 रुपये

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