Book Review : अब भी हिंदी फिल्मों के गीतों में महकते हैं मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी के 151 गीतों के इस संग्रह का संपादन किया है गीतकार विजय अकेला ने.

इस दफा मजरूह सुल्तानपुरी के इन गीतों को पढ़ते हुए जो दृश्य बने, जो अर्थ खुले, जो महसूस हुआ वह फिल्म देखते हुए बने दृश्यों, अर्थों और महसूसने से बिल्कुल अलहदा अहसास था.

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‘रहें ना रहें हम महका करेंगे’ मजरूह सुल्तानपुरी के 151 चुनिंदा फिल्मी गीतों का संग्रह है. राजकमल प्रकाशन के लिए इस पुस्तक का संपादन किया है गीतकर विजय अकेला ने. इस पुस्तक की भूमिका लिखते वक्त विजय जी ने लिखा है ‘एक बात और मैं बड़ी शिद्दत से जानता हूं कि जो लोग मजरूह को नहीं जानते वे भारतीय सिनेमा को नहीं जानते’. इस संग्रह में हर गीत के साथ बताया गया है कि वह किस फिल्म का गीत है और किस वर्ष की फिल्म है.

रोचक बात यह है कि दूसरों की तरह ही मैंने भी मजरूह के गीत फिल्मों में सुने हैं. अक्सर फिल्मी चरित्रों के मनोभावों के साथ मैं भी इन गीतों में डूबता-उतरता रहा हूं. अक्सर ये गीत पात्रों की मनःस्थितियों के साथ फिट बैठे लगे. बेहद शांत, बेहद तरल, बेहद स्निग्ध, वाकई पारदर्शी. पर इस दफा इन गीतों को पढ़ते हुए जो दृश्य बने, जो अर्थ खुले, जो महसूस हुआ वह फिल्म देखते हुए बने दृश्यों, अर्थों और महसूसने से बिल्कुल अलहदा अहसास था. सच यह है कि किसी गीत को पात्रों की मनःस्थितियों के साथ सुनना और उसी गीत को अकेले में पढ़ना दोनों अलग-अलग अर्थ देते हैं.

इस बार मजरूह के गीतों को पढ़ते हुए कभी बेहद अकेले मजरूह दिखे, कभी मस्ती में डूबे हुए और कभी-कभी तो बेहद प्रफेशनल मजरूह से भी सामना हुआ.

रहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह
बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह

इन्हें पढ़ते हुए एक बार भी सुचित्रा सेन याद नहीं आईं. न ही ध्यान आया कि फिल्म में यह गीत सुचित्रा पर फिल्माया गया है और इन दृश्यों में अशोक कुमार परेशान हाल दिख रहे हैं. सच तो यह है कि कान से लता की आवाज भी गायब हो गई थी. बस दिख रहे थे तो टूटे हुए मजरूह और बिखरती हुई कातर सी उनकी आवाज. इस गीत की अंतिम पंक्ति है –

सौ रूप भरे जीने के लिए बैठे हैं हजारों जहर पीए,
ठोकर न लगाना हम खुद हैं गिरती हुई दीवारों की तरह

एक ऐसा प्रेमी जो हर तरफ से निराश है, पर उसकी जिजीविषा ऐसी कि उसने बार-बार रूप बदला, जहर पीता रहा और अपने साथ के शख्स से यह कातर सी गुजारिश की कि मुझे अब ठोकर न लगाना, तुम जो चाहते हो वह खुद ही हो जाएगा... मैं तो बस गिरती हुई दीवार की तरह हूं.

ऐसे पचासों गीत हैं इस संग्रह में. जिन्हें पढ़ते और गुनते हुए फिल्म का नायक या नायिका नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ मजरूह याद आते हैं. झूम-झूम के नाचो आज, गाओ आज... से लेकर इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल जैसे गीतों में फिल्म का नायक गुम हो जाता है और इन पंक्तियों का रचनाकार अपनी पूरी वेरायटी के साथ उपस्थित हो जाता है.

विजय अकेला फिल्म साथी और पत्थर के सनम फिल्म के दो गीत कोट करते हैं – एक तो ‘हुस्ने जाना इधर आ’ और दूसरा ‘महबूब मेरे महबूब मेरे’. वे बतलाते हैं कि इन दोनों गीतों में मजरूह किसी महबूबा से नहीं बल्कि अपनी शायरी से ही मुखातिब हैं.

मजरूह ने आजादी से दो साल पहले ही फिल्मों के लिए गीत लेखन का काम शुरू किया था. सच है कि उस वक्त फिल्मों की वह तकनीक नहीं थी जो आज है. गीतों में भी दूसरों के पास वह तराश नहीं थी जो मजरूह के पास थी. मजरूह ने फिल्मों को लगातार नगमे दिए. फिल्म इंडस्ट्री ने भी शुरू से ही मजरूह के गीतों का लोहा माना. बाद के दिनों में मजरूह के अधिकतर गीत आरडी बर्मन की संगीत से सजा रहा. इस पुस्तक के संपादक ने बताया है कि आरडी बर्मन को मजरूह अपने बेटे की तरह मानते थे. मजरूह के एक बेटे इरम की मौत 1993 में हो गई थी और इसके ठीक एक साल बाद 1994 में काल ने आरडी बर्मन को भी छीन लिया. इस मौत से मजरूह सुल्तानपुरी बिल्कुल टूट गए. उनका मन जख्मी हो गया. वैसे भी मजरूह शब्द का मतलब ही ‘घायल’ होता है.

इस संग्रह से गुजरते हुए बहुत सहज ही गुलजार के गीतों पर केंद्रित विनोद खेतान की किताब ‘उम्र से लंबी सड़कों पर’ का ध्यान आ जाता है. लेकिन ‘उम्र से लंबी सड़कों पर’ महज गुलज़ार के गीतों का संकलन नहीं है, बल्कि वह गुलजार के गीतों को जोड़ती हुई एक स्वतंत्र किताब भी दिखती है. इस किताब में विनोद जी ने बड़े करीने से गुलजार के गीतों को अलग-अलग खानों में बांटा है. हर खाने को गुलजार की फिल्मों की ही तरह एक शब्द का नाम दिया है. हर चैप्टर के पहले एक लंबी टिप्पणी है जो गुलजार की रचनाओं के विभिन्न रंगों और ऊंचाइयों को समझने की दृष्टि देती है.

इस लिहाज से ‘रहें ना रहें हम महका करेंगे’ मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों का संग्रह बनकर रह गया है. भूमिका में विजय जी ने जितनी बातें कहीं, उसके बाद मजरूह के रंगों को, उनके गीतों के लिबास को पकड़ने में मददगार कोई और टिप्पणी नहीं मिलती है. लेकिन बेशक, अपनी इसी भूमिका में विजय जी ने मजरूह सुल्तानपुरी के व्यक्तित्व के कई अनछुए पहलुओं से पाठकों का परिचय कराया है. मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों से इश्क की जो बारीक चर्चा विजय जी ने की, उससे मजरूह के गीतों के मर्म को समझने की नई सड़क पाठकों को मिलती है. वैसे, मजरूह के लिखे 2318 गीतों में से 151 चुनिंदा गीतों का चयन करना अपने आप में दुष्कर काम है, श्रमसाध्य तो है ही. इस लिहाज से विजय जी ने मजरूह सुल्तानपुरी के 151 गीतों का जो संग्रह तैयार किया है वह निश्चित ही महकता रहेगा.

किताब का नाम : रहें ना रहें हम महका करेंगे
संपादन : विजय अकेला
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
कीमत : 250 रुपये

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