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Book Review : महाराष्ट्र की राजनीतिक नदी में ठाकरे भाऊ का पानी

धवल कुलकर्णी की पुस्तक 'ठाकरे भाऊ' का अनुवाद प्रभात रंजन ने किया है.

कोई पत्रकार खबरों से इतर जब किताब लिखता है तो अमूमन उस किताब में लेखक की पत्रकार छवि स्पष्ट दिख रही होती है. यह बात धवल कुलकर्णी की किताब 'ठाकरे भाऊ' पढ़ते हुए और मजबूती के साथ उभरती है.

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    मेरा मानना है कि किसी भी नदी में कोई भी शख्स सिर्फ एक बार ही स्नान कर सकता है. क्योंकि जब तक वह उस नदी में दोबारा डुबकी लगाता है, तब तक पूरी की पूरी नदी बह चुकी होती है और एक नई नदी उसकी जगह ले चुकी होती है. बावजूद उस नदी को हम उसके पुराने नाम से ही जानते हैं, क्योंकि उस नदी के पानी में वही सारे तत्व होते हैं जो कुछ सेकेंड पहले वाली नदी में थे. यानी, नदी पूरी की पूरी भले बह जाए, उसकी आत्मा और उसकी मूल पहचान बची रह जाती है. इसी तर्ज पर, कोई पत्रकार खबरों से इतर जब किताब लिखता है तो अमूमन उस किताब में लेखक की पत्रकार छवि स्पष्ट दिख रही होती है. यह बात धवल कुलकर्णी की किताब 'ठाकरे भाऊ' पढ़ते हुए और मजबूती के साथ उभरती है.

    10 अध्यायों में सिमटी 'ठाकरे भाऊ' शिवसेना और मनसे के रिश्ते, महाराष्ट्र की राजनीति, इस राजनीति के दौरान सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक टूटन और इसी के साथ-साथ स्थानीय पहचान की छटपटाहट का इतिहास बयान करती है. कहना चाहिए कि महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास का विश्वसनीय दस्तावेज है धवल कुलकर्णी की किताब 'ठाकरे भाऊ'. धवल कुलकर्णी ने इस किताब के लिए पूरी शिद्दत से शोध किया है, यह बात निःसंकोच कही जा सकती है. कुलकर्णी की यह किताब 228 पन्नों में खत्म हो जाती है. दो पन्ने उन्होंने आभार व्यक्त करने में खर्च किए हैं. लेकिन इसके बाद 48 पन्नों में उन्होंने उन रेफरेंसों के बारे में बताया है जिनके आधार पर यह प्रामाणिक किताब लिखी गई.

    पत्रकार जब खबरें लिखता है तो उसकी पहली चिंता अपनी खबर की विश्वसनीयता को लेकर होती है. वह अपनी खबर को विश्वसनीय बनाने के लिए संबद्ध लोगों के बयानों का सहारा लेता है. जाहिर है कि अपनी किताब 'ठाकरे भाऊ' में धवल कुलकर्णी ने अपने इस पत्रकारिता धर्म का पालन बखूबी किया है. इस किताब की शुरुआत ठाकरे परिवार के इतिहास से शुरू होती है. वह बताते हैं कि बाल और श्रीकांत के पिता 'प्रबोधनकार' केशव सीताराम ठाकरे ने 1921 में साप्ताहिक 'प्रबोधन' की शुरुआत की थी. हालांकि यह साप्ताहिक महज 5 साल ही चल पाया लेकिन उनके नाम के साथ 'प्रबोधनकार' हमेशा के लिए जुड़ गया. अपने पहले ही अध्याय में कुलकर्णी बताते हैं कि प्रबोधनकार का व्यक्तित्व कैसा रहा था. अन्याय के खिलाफ विद्रोह की नींव प्रबोधनकार के भीतर उनके बचपन में ही पड़ चुकी थी. इस विद्रोही तेवर की झलक उनकी पत्रकारिता में दिखती रही. अगर वंश परंपरा की बात करें तो शायद प्रबोधनकार के इसी विद्रोह की अनुगूंज बाद में बाल ठाकरे और अब के राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे में सुनाई पड़ती है.

    अपने दूसरे अध्याय में कुलकर्णी ने मराठी पहचान की तलाश की है. उन्होंने महाराष्ट्र को लेकर आचार्य प्रह्लाद केशव अत्रे का दावा कोट किया है कि इतिहास केवल महाराष्ट्र के पास, शेष के पास तो केवल भूगोल है. अत्रे के इस दावे की तलाश करते हुए कुलकर्णी सातवीं शताब्दी तक पहुंच जाते हैं और बताते हैं कि कर्नाटक में चालुक्य की राजधानी में राजा पुलकेशिन II के कवि रविकीर्ति के अभिलेख में 'त्रिक महाराष्ट्र' का जिक्र है. ऐसे ही और भी कई प्रसंगों की चर्चा करते हुए लेखक 1959 तक पहुंचते हैं जब कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित कर संयुक्त महाराष्ट्र के गठन की अनुशंसा की थी.

    अपनी इस किताब में कुलकर्णी ने मराठियों के उस डर की विस्तार से चर्चा की है जो रोजगार और व्यवसाय को लेकर उनमें पैठी थी. मराठियों को लगता था कि बाहरी लोग महाराष्ट्र में ज्यादा मजबूत होते जा रहे हैं, उन्हें ज्यादा लाभ मिल रहा है, उनके पास स्थानीय लोगों के मुकाबले अधिक संपत्ति होती जा रही है. मराठियों ने महसूस किया कि संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के नेताओं ने मराठियों की भावनाओं की पूर्ति में कोई कदम नहीं उठाया. ऐसे माहौल में मराठियों के भीतर एक शून्य पसरता गया. और फिर इसी शून्य से पैदा होकर सामने आई शिवसेना. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपनी पत्रकारिता, अपने लेखों और अपने कार्टूनों में मराठी मानुसों के हित की बात करनी शुरू की. उन्होंने मांग की कि महाराष्ट्र में केवल उन्हीं लोगों को नौकरी मिलनी चाहिए जिन्हें मराठी आती हो. कुलकर्णी ने वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर के हवाले से बताया कि ठाकरे की विरासत ने मराठी मानुस में सामूहिक पहचान तथा सांप्रदायिक गर्व का भाव पैदा किया, जो तेजी से वैश्विक होते जाते मुंबई में खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे थे.

    कहना चाहिए कि धवल कुलकर्णी ने अपनी इस किताब के 10 अध्यायों के मार्फत महाराष्ट्र और मराठियों की राजनीति का एक विश्वसनीय इतिवृत्त पेश करने की कोशिश की है. अलग-अलग उद्धरणों, घटनाओं और विचारों को शामिल करते हुए उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना और मनसे के असर की चर्चा की है. इस पूरी किताब में धवल कुलकर्णी बिल्कुल तटस्थ नजर आते हैं. उनपर यह आरोप मुश्किल से लग सकता है कि वे किसी पार्टी विशेष की ओर झुके हैं. बल्कि कहना चाहिए कि कुलकर्णी का सारा ध्यान महाराष्ट्र की राजनीति के इतिहास और वर्तमान को रेखांकित करती सामग्रियों पर है. 'ठाकरे भाऊ' से गुजरते हुए आप महाराष्ट्र में शिवसेना की पकड़ और उसके असर को साफ-साफ देख सकते हैं.

    राजकमल प्रकाशन की ओर से हिंदी में प्रकाशित यह किताब मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है. हिंदी में इसका अनुवाद किया है प्रभात रंजन ने. कुछ जगहों को नजरअंदाज कर दें तो अनुवाद का कमाल यह है कि पढ़ते हुए इसके वाक्य विन्यास में कहीं भी अंग्रेजी का असर नहीं दिखता. सच तो यह है कि न बताया जाए तो किताब के हिंदी में ही लिखे जाने का भ्रम हो सकता है. अनूदित होने के बावजूद शुरू से अंत तक किताब में भाषा का जो प्रवाह है, जो सहजता है, उसके लिए प्रभात रंजन बधाई के पात्र हैं.

    पुस्तक : ठाकरे भाऊ
    लेखक : धवल कुलकर्णी
    अनुवाद : प्रभात रंजन
    प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
    कीमत : 299 रुपये
    Published by:Anurag Anveshi
    First published: