Book Review: कॉलिंग सहमत- कश्मीर की वह बेटी जिसने देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया

हरिंदर सिक्का द्वारा लिखी Calling sehmat,'कॉलिंग सहमत' बताती है कि कश्मीर के लोगों को लेकर बन चुकी 'गद्दार' वाली धारणा कैसे गलत है? कैसे मुट्ठी भर भटके हुए लोगों की वजह से यह धारणा विकृत होती जा रही है

Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 15, 2019, 2:52 PM IST
Book Review: कॉलिंग सहमत- कश्मीर की वह बेटी जिसने देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया
किताब की शक्ल में सहमत की कहानी को पढ़ना, उनकी जिंदगी पर आधारित फिल्म (राज़ी) देखने के अनुभव से काफी अलग है
Prerana Kumari | News18Hindi
Updated: August 15, 2019, 2:52 PM IST
'सहमत, हम जो कुछ भी हैं, वह अपनी मातृभूमि की वजह से हैं, जिसके लिए हमें उसका शुक्रगुजार होना चाहिए. उसके प्रति बेवफाई से बढ़कर शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती. मैं यहीं पैदा हुआ था और इस मिट्टी के लिए अपना फर्ज मुझे अच्छी तरह निभाना चाहिए. जब मैं इस मिट्टी में मिलूंगा, तब मेरी चेतना को यह गर्व होना चाहिए कि मैंने एक ईमानदार, वफादार और नमकहलाल जीवन जिया.’ 

(सहमत खान और पिता हिदायत खान के बीच का संवाद)

ये संवाद उस कौम, उस सरजमीं से ताल्लुक़ रखने वाले दो लोगों के बीच का है जिनके लिए समाज का एक धड़ा गद्दार और गद्दारी जैसे कठोर शब्दों का प्रयोग करता है. एक प्रांत और एक विशेष कौम के खिलाफ़ कुछ ऐसे कठोर और जहरीले बयान मेरी नज़रों से बार-बार गुजरे जब हाल ही केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में धारा 370 हटाने का फैसला किया गया.

मैं हैरान थी कि हम भारतीय कितने बड़े भुलक्कड़ हैं. हमें बार-बार याद दिलाना पड़ता है कि कश्मीर के लोग, वहां की लड़कियां, वहां के बुजुर्गों ने भी इस देश के लिए वैसे ही कुर्बानियां दी हैं जैसे कि देश के बाकी हिस्सों के देशभक्तों ने. 'राज़ी' फिल्म को देखकर यही भारत की जनता 'सहमत खान' पर फख्र करती हुई सिनेमा हॉल से निकली थी. सहमत का मजहब क्या था? सहमत कहां की रहने वाली थी? अगर आप भी यह भूल गए हैं तो रिटायर्ड नेवी ऑफिसर हरिंदर सिक्का की सच्चे पात्रों पर अंग्रेजी में लिखी हुई किताब 'कॉलिंग सहमत' का हिंदी अनुवाद आपको यह सब फिर से याद दिला देगा. 'कॉलिंग सहमत' का हिन्दी अनुवाद हाल ही में प्रकाशित हुआ है...

किताब की शक्ल में सहमत खान की ज़िंदगी

किताब की शक्ल में सहमत की कहानी को पढ़ना, उनकी जिंदगी पर आधारित फिल्म (राज़ी) देखने के अनुभव से काफी अलग है. किताब आपको 'सहमत खान' की जिंदगी के उन गहराइयों तक ले जाती है जहां फिल्म (राज़ी) केवल छूकर निकल गई थी. कुल 207 पन्नों की यह किताब एक हद तक 'सहमत खान' की जिंदगी को समेटने में कामयाब होती है.

'सहमत ख़ान अपने पलंग पर लेटी थी, उसके चेहरे पर मृत्यु की शांति और लहराते हुए राष्ट्रध्वज की छाया प्रतिबिंबित हो रही थी.' उसे ऐसी ही तो मौत चाहिए थी. उसके पिता ने भी खुद के लिए ऐसी ही मौत की कल्पना की थी.
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'मैं चाहता हूं कि जब मौत मेरे दरवाजे पर दस्तक दे, तो मैं उस (तिरंगे) को ऊंचा फहरता देखूं. मैं अपनी मां की जितनी अच्छी सेवा कर सकता था, की है. अब मैं अपने घर में रहते हुए उसकी गोद में मरना चाहता हूं. मुझे शांति से इतिहास के गलियारों में धुंधला जाने दो, अपने देश की मिट्टी में खो जाने दो.’

किताब की शुरुआत ही सहमत की मौत से होती है और इसका साक्षी हो रहा होता है उसका इकलौता बेटा 'समर खान', जो फौजी की वर्दी में अपनी मां को आखिरी बार जी भर के देख लेना चाहता है, जिसका सीना गर्व से फूला हुआ है, जिसकी आंखे अपनी मां के गौरवपूर्ण कारनामों को याद कर के नम हो गई हैं.

किताब के लेखक हरिंदर सिक्का को सहमत के बारे में उनके बेटे 'समर' से ही पता चला था. समर ने ही अपनी मां की देशभक्ति की नायाब मिसाल से उन्हें रू-ब-रु कराया था.

किताब के लेखक- हरिंदर सिक्का
किताब के लेखक- हरिंदर सिक्का


'कॉलिंग सहमत' को लिखने में सिक्का को 8 साल लग गए. साल 2008 में यह पहली दफे प्रकाशित हुई. फिर पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने साल 2018 में इसका रिवाइज्ड अडिशन प्रकाशित किया. साल 2018 में ही इस किताब का फिल्मी रुपांतरण हुआ. आलिया भट्ट और विक्की कौशल द्वारा अभिनीत और धर्मा प्रोडक्शन द्वारा प्रस्तुत की गई फिल्म 'राज़ी' को दर्शकों ने काफी सराहा.

इस बीच किताब की बिक्री भी तेजी से बढ़ी. पर भारत में मौजूद हिंदी पाठकों का एक बड़ा वर्ग अब तक इस अद्भुत कहानी से अछूता था. इसलिए कुछ दिनों पूर्व ही सिक्का की इस किताब का हिंदी और मराठी अनुवाद प्रकाशित होकर मार्केट में आया है.

किताब की पटकथा

सहमत खान दशकों से कश्मीर घाटी में बसे सफल और रईस कश्मीरी व्यवसायी हिदायत ख़ान और तेजश्वरी सिंह (जो की एक पंजाबी हिंदू परिवार से ताल्लुक़ रखती हैं) की इकलौती संतान थी. हिदायत ख़ान भारतीय मुखबिर थे. व्यवसायी के लिए उनका पाकिस्तान आना-जाना लगा रहता था. वहां उन्होंने अपना काफी बड़ा नेटवर्क स्थापित कर लिया था. 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान हिदायत का नेटवर्क सूचना एकत्र करने का मुख्य स्रोत बन गया था. लेकिन 1969 की शुरुआत खान दंपती के लिए बड़ा आघात लेकर आई. जहां सहमत घाटी से दूर दिल्ली विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई पूरी कर रही थी, वहीं यहां हिदायत मौत के मुंह के करीब जा रहे थे. असल में एक रूटीन स्वस्थ्य-परीक्षण के दौरान हिदायत की गर्दन की गांठ कैंसर-युक्त पाई गई. लेकिन हिदायत सेहत पर ध्यान देने के बजाय अपनी सारी ताकत और कोशिशें डेटा इकट्ठा करने में लगा रहे थे.

1971 की जंग करीब थी. पूर्वी पाकिस्तान तब तक पाकिस्तान के लिए एक दुखती रग बन चुका था. भारत पर हमला करने की योजना ज़ोरों शोर से बनाई जा रही थी. हिदायत जानते थे कि उनकी सांसे अब ज्यादा दिनों तक उनका साथ नहीं देगी. इस बीच उन्हें 'सहमत' में अपनी आखिरी उम्मीद दिख रही थी. हिदायत के दिलों-दिमाग पर देश की सुरक्षा इस कदर हावी थी कि उनके ज़ेहन में एक बार भी बेटी की सुरक्षा का ख़याल नहीं आया.

कॉलिंग सहमत पर आधारित फिल्म 'राज़ी'
कॉलिंग सहमत पर आधारित फिल्म 'राज़ी'


उधर सहमत इन सब से बेफिक्र हाल ही शुरू हुए अपने पहले-पहले प्यार को जी ही रही थी. साथ जीने मरने की कसमें खाए अभी कुछ ही दिन बीते थी कि सहमत को श्रीनगर बुला लिया गया. वहां पहुंचकर उसे जो पता चला उसके बाद उसे अपनी किस्मत पर भरोसा ही नहीं हुआ. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने किस्मत को कोसे या चुपचाप अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो जाए.

हिदायत ख़ान के पिता यानी सहमत के दादा जी भी जासूस थे. उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी वतन के नाम कर दी थी. वतन के लिए मर मिटने का जज्बा सहमत के खून में भी था इसलिए पिता की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए उसने खुद को तैयार कर लिया. कश्मीर की इस हिंदुस्तानी बेटी ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दरमियान दुश्मन देश में घुसकर कई ऐसे राज पता कर लिए जिससे पाकिस्तान की साजिश मिट्टी में मिल गई. सहमत ने अपने दम पर यद्धपोत आई एन एस विराट को तबाह करने की पाकिस्तान की नापाक साजिश को कामयाब नहीं होने दिया.

सहमत ने ये सब कैसे किया? 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उसका क्या योगदान था? वह पाकिस्तान कैसे गई? वहां से लौटी कैसे? भारत वापस लौटने के बाद सहमत कई सालों तक अवसाद से क्यों घिरी रही? क्या वह अपने पहले प्यार के पास वापस लौटी? भारत लौटने के बाद वह श्रीनगर में न रहकर पंजाब के एक छोटे से कस्बे मलेर कोटला में क्यो रहने लगी?

इन सारे सवालों का जवाब आपको किताब पढ़ने के बाद ही मिलेगा. हिंदी में अनुवादित इस किताब को पढ़ते हुए अंग्रेजी के पाठकों को ऐसा लग सकता है कि वह हिंदी में डब की हुई कोई हॉलीवुड फिल्म देख रहे हैं. लेकिन किताब पठनीय है. यह किताब बताती है कि कश्मीर के लोगों को लेकर बन चुकी 'गद्दार' जैसी धारणा कैसे गलत है? कैसे मुट्ठी भर भटके हुए लोगों की वजह से कश्मीरियों को लेकर लोगों का नज़रिया विकृत होता जा रहा है.

किताब के बारे में

नाम - कॉलिंग सहमत
लेखक - हरिंदर सिक्का
प्रकाशक - पेंगुइन बुक्स
मूल्य- 133 रुपये

 
First published: August 15, 2019, 2:52 PM IST
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