Book Review: नई पीढ़ी की सोच का रोचक दस्तावेज है 'एफ ओ जिंदगी'

Book Review: नई पीढ़ी की सोच का रोचक दस्तावेज है 'एफ ओ जिंदगी'
कम शब्दों में बहुत सारी बातें बता देने की कला लेखिका में कूट-कूटकर भरी है.

इस उपन्यास (Novel) की सबसे महत्वपूर्ण और ख़ास बात ये है कि इसे पढ़ते हुए जब भी आप अपने दिमाग़ (Mind) में किसी सम्भावना को लेकर कहानी के साथ आगे बढ़ते हैं, वो न होकर, कुछ और ही हो जाता है, जो आपको हैरान करने के साथ-साथ चेहरे पर एक मुस्कान भी दे जाता है.

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रेखा बब्बल 

उपन्यास (Novel) का शीर्षक (Title) उत्सुकता जगाता है. जब तक पन्ना पलट कर देख नहीं लेते, तब तक अपने हिसाब से इसका अर्थ दिमाग़ (Mind) में घूमता रहता है. शायद लेखिका (Writer) ने ये छूट दी भी है पाठकों को. आज गौरव जेल से लौट रहा है. एक समय ख़ुद को ख़ूब से ज़्यादा सुंदर मानने वाली इति के पास जेल से फ़ोन आता है, जो अबतक गौरव से बेइंतेहां नाराज़ रही है और यहीं से कहानी की परत दर परत खुलने लगती है. अलग-अलग चरित्र को शीर्ष पर रख कर उनके हिसाब से कहानी कहने की कला में मैं जयंती को सौ में से पूरे सौ नम्बर देती हूं. इति, श्रुति और गौरव के साथ जिस सरलता के साथ वो पाठक को बिना रुके अंत तक ले जाती हैं, निश्चित तौर पर उल्लेखनीय और सराहनीय है.

हालांकि मैंने बहुत नज़दीक से इति और श्रुति को अपनी ज़िंदगी में देखा है. इसलिए कहानी के साथ मेरा लगाव कुछ अलग क़िस्म का रहा और मुझे लगता है हर पाठक का सामना ज़रूर हुआ होगा किसी न किसी इति और श्रुति से. इन दोनों बहनों के अलावा सबके बीच निरंतर तालमेल बिठाने की कोशिश करती मां के साथ भी आप कब जुड़ जाते हैं, पता ही नहीं चलता.



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इस उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण और ख़ास बात ये है कि इसे पढ़ते हुए जब भी आप अपने दिमाग़ में किसी सम्भावना को लेकर कहानी के साथ आगे बढ़ते हैं, वो न होकर, कुछ और ही हो जाता है, जो आपको हैरान करने के साथ-साथ चेहरे पर एक मुस्कान भी दे जाता है. यही किसी भी अच्छी कहानी की सबसे बड़ी कसौटी है. आदमी का असल स्वभाव कभी नहीं बदलता, इस बात को बड़ी मज़बूती के साथ रेखांकित किया गया है. इति को जो चाहिए वो चाहिए और इसके लिए उसे सारे जुगाड़ पता हैं. श्रुति को जो नहीं चाहिए वो ज़बरदस्ती दिया जा रहा है या यूं की उसकी चाहत वक़्त के साथ गड्डमगड्ड होती रहती रहती है. गौरव बुरा आदमी बिलकुल नहीं है फिर भी जाने कौन से ग्रह-नक्षत्र हैं जो बार-बार उसकी परीक्षा लेने को तैयार रहते हैं.

पापा प्यार करते हैं, चाहते हैं कि सब ठीक हो पर उनका अपना अलग तरीक़ा है. अरविंद उलझा देता है, उसे सही कहा जाए या ग़लत, कई बार समझ में नहीं आता. लिज़ की मंशा अस्पष्ट रह जाती है. ममता के आने से थोड़ा डर लगता है कि कहीं कोई नया रायता न फैल जाए. इति और गौरव की मोहब्बत के साथ-साथ श्रुति और गौरव की एक अलग क़िस्म की केमिस्ट्री से हर दुविधा का कोई न कोई हल निकल ही आता है. चरित्र उतने ही हैं जितने की आवश्यकता है और हर चरित्र अपने होने का मक़सद पूरा करने में कामयाब रहा है. यहां तक कि पापा के बंगले के बाहर खड़ा सिक्योरिटी गार्ड भी. लेखिका उपन्यास में वर्णित भूगोल से भली-भांति परिचित हैं. कुछ सबूत -‘ला मेरेडियन की ऊपरी मंज़िल के चाईनीज़ रेस्तरां से इंडिया गेट तक सब ग्रीन नज़र आता है- ‘कनाट प्लेस, इनर सर्कल, ई ब्लॉक, जैन रेस्तरां, वेंगर्स के पास है.’

बहते-बहते कई बार इतनी प्यारी बात कह जाती हैं जयंती कि लगता है वो सीधा आपसे सम्वाद स्थापित कर रही हों. जैसे-दुनियां का मेला, मेले में लड़की, लड़की अकेली. बस उसका नाम शन्नो नहीं था. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, बचपन का बमचम और ये सारी बातें इतनी सहजता से आती हैं जैसे इससे अच्छा भला और क्या हो सकता था. वहीं अरविंद का लारा-लप्पा छोड़ो कहना खलता है. लगता है ये अरविंद की नहीं लेखिका की भाषा है.

कम शब्दों में बहुत सारी बातें बता देने की कला लेखिका में कूट-कूटकर भरी है. जैसे-इति की शादी के बाद उनका लिखना-बग़ावत, जवानी, आग, जुनून, जोश, पागलपन. श्रुति के घर आने पर, इस बार पापाजी की नाक का, इज़्ज़त का, पोज़ीशन का, घर का, बाहर का, पड़ोसियों का, मोहल्ले का, देश का सवाल था. उदित और सुमित की चाट-चाट में बात संभल गयी. ममता के आने पर- और ममता हाज़िर. हांफते हुए, मस्ती में, अपनी हस्ती में, हक़ से, अदा से, कुछ बिखरी सी, कुछ संवरी सी और भी बहुत कुछ.

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हरेक चरित्र का पोस्टमार्टम हो जाने के बाद बात लेखिका पर आती है कि बताओ आगे क्या होगा? क्योंकि हम लौटकर वर्तमान में पहुंच जाते हैं जहां गौरव आ चुका है जेल से. क्या होता है, कैसे होता है, इसके लिए आपको उपन्यास पढ़ना चाहिए. मैं तो बस इतना कहना चाहती हूं लेखिका से कि इस उपन्यास की अगली कड़ी ज़रूर आनी चाहिए क्योंकि लाइफ़ का नया चैप्टर शुरू हो चुका है और इस नए चैप्टर में काफ़ी सम्भावनाएं हैं जो पाठकों तक पहुंचना ज़रूरी है.

किताब: एफ ओ जिंदगी
लेखिका: जयंती रंगनाथन
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नाइन बुक्स
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