मेवात के इतिहास और मेवाती किरदारों की गाथा बयां करता 'ख़ानज़ादा'

Bhagwandas Morwal Book khanzada

Bhagwandas Morwal Book khanzada

ख़ानज़ादा के बारे में खुद लेखक भगवानदास मोरवाल मानते हैं कि वे 'ख़ानज़ादा' को उन अलक्षित और बेनाम नायकों का आख्यान मानते हैं जिनका इतिहास में उल्लेख तो है लेकिन उनकी कभी चर्चा नहीं होती.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 13, 2021, 4:45 PM IST
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भगवानदास मोरवाल (Bhagwandas Morwal) की नई पुस्तक 'ख़ानज़ादा' (Khanzada) पढ़ने का मौका मिला. ख़ानज़ादा में मेवातियों की गाथा है. पुस्तक पर चर्चा करने से पहले यह जिक्र करना जरूरी है कि 'मेवात' के बारे में अभी तक मेरी जानकारी हरियाणा के एक इलाके विशेष तक ही सीमित थी. पता था कि मेवात का इलाका राजस्थान के भरतपुर और उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले में भी आता है. कुछ दिन पहले ही खबर बनाई थी 'देश में साइबर ठगों का अड्डा बना मेवात', और एक खबर की थी 'मेवात के गावों में कम होती हिन्दुओं की आबादी'.

हां, मेवात से जुड़ा एक और शब्द है 'मेव'. मेव के बारे में भी मेरा ज्ञान इतना भर था कि मथुरा जिले में एक गांव है दोसेरस. यह हमारी चाची का मायका है. घर की बातों में अक्सर सुनते आए हैं कि दोसेरस मेवों का गांव है और मेव बहुत ही खतरनाक होते हैं. इनका मुख्य पेशा ठगी और लूटपाट है.

मेवात का इतिहास खंगालता 'ख़ानज़ादा'

अब बात 'ख़ानज़ादा' की. एतिहासिक पृष्ठ भूमि पर लिखी भगवानदास मोरवाल की इस किताब के पन्ने जैसे-जैसे पटलते गए, मेवात और मेव के बारे में चौकाने वाली जानकारी का ख़जाना बिखरने लगा.
दिल्ली पर मुगल शासकों के बारे में खूब पढ़ा और लिखा गया. दिल्ली की गद्दी पर न जाने कितने शासक आए और गए, लेकिन इसी दिल्ली की राजनीति के केंद्र में मेवात की भी बड़ी भूमिका रही है. इतिहास में इसका बहुत कम जिक्र देखने-सुनने को मिलता है. 'ख़ानज़ादा' के माध्यम से मेवात से जुड़ी घटनाओं और वहां के नायकों को गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकालने का एक उम्दा कोशिश है.

ख़ानज़ादा की मार्फत मोरवाल ने इतिहास के ऐसे निर्माताओं का सामने लाने की कोशिश की है जो वक्त की धुंध में ओझल हो गए.

यह उपन्यास दिल्ली के आसपास की सल्तनतों के साथ मेवात और ब्रज क्षेत्र के गावों वहां की रियासतों के बसने-उजड़ने की कहानी बयां करता है. तिजारा, भरतपुर, कामां और दौराला गांव समेत अनगिनत गावों की एतिहासिक पृष्ठभूमि को बहुत ही सजीव तरीके से उकेरा गया है.



लेखक ने इस उपन्यास में मेवात के इतिहास और हसन खां मेवाती जैसे ऐतिहासिक किरदारों को दर्ज कर भारतीय इतिहास के अल्पज्ञात पक्ष पर रोशनी डाली है.

इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप इतिहास की उन ऊबड़-खाबड़ और अनजान पगडंडियों से होकर गुजरेंगे जहां आपको इतिहास, कल्पना और किस्सागोई की दिलचस्प संगत देखने को मिलेगी.

'राजकमल' से प्रकाशित ख़ानज़ादा के बारे में खुद लेखक भगवानदास मोरवाल मानते हैं कि वे 'ख़ानज़ादा' को उन अलक्षित और बेनाम नायकों का आख्यान मानते हैं जिनका इतिहास में उल्लेख तो है लेकिन उनकी कभी चर्चा नहीं होती.

लगभग 400 साल के देशकाल को समेटे यह उपन्यास हसन खां मेवाती या कहें राजपूत मुसलमान जिनके पूर्वजों को अमीर तैमूर लंग ने जिस ख़ानज़ादा के ख़िताब से नवाज़ा था. यह पुस्तक अपने पाठकों को उस दौर के राजनीतिक और सत्ता संघर्षों से भी रूबरू कराती है.

ख़ानज़ादा की मार्फत भगवानदास मोरवाल ने इतिहास को अपनी लेखनी से एक नया आयाम दिया है. यह उपन्यास उन मेवातियों की गाथा बयान करता है जिन्होंने तुगलक, सादात, लोदी और मुगल जैसे भारतीय इतिहास के मशहूर राजवंशों से लोहा लिया था. इसमें उस तहज़ीब की जड़ें देखी जा सकती हैं जिन्हे आगे गंगा जमुनी कहा गया और जो भारतीय समाज और संस्कृति की बुनियादी विशेषता है.

पुस्तक अंश

''अमीर तैमूर लंग ने बहादुर नाहर को गले लगाते हुए कहा, बहादुर नाहर, हम आपके भेजे गए तोहफ़े से इतने ख़ुश हैं कि हम आज से आपको बहादुर नाहर की जगह बहादुर नाहर ख़ां के नाम से तो पुकारेंगे ही बल्कि ख़ानज़ादा के ख़िताब से भी नवाज़ते हैं. आज से आपका खानदान ख़ानज़ादा कहलाया जाएगा.''

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''ख़ानज़ादा की शुरुआत होती है चौदहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से. चौदहवीं सदी के मध्य और देहली सल्तनत में तुग़लक़ वंश के शासक फ़िरोज़ शाह तुग़लक का शासन. देहली से साठ मील दूर बसा था मेवात. पहले बड़गूजरों द्वारा मेवात में जनता से लूटपाट और उन पर अत्याचार करना. फिर निकुम्भों द्वारा शूद्रों की रोज़ाना बलि चढ़ाना. बाद में शौपरपाल और समरपाल, दोनों भाइयों द्वारा मेवात में आए दिन राहगीरों के साथ होने वाली लूटपाट और जनता पर होने वाले अत्याचारों की ख़बरें देहली दरबार में पहुंचने लगीं.''

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''इस तरह बैरम ख़ां का बेटा और ख़ानज़ादों या कहिए शाहे-मेवात हसन ख़ां मेवाती के चचेरे भाई जमाल ख़ां की छोटी पुत्री सलीमा से पैदा हुआ अब्दुर्रहीम ना का कुलदीपक भी बुझ गया. एक ऐसा कुलदीपक जिसकी शिराओं में आधा तुर्कमानी मुसलमान और आधा हिन्दु राजपूत का रक्त दौड़ता था. जिसकी हिन्दवी ज़बान में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत, हिन्दी, ब्रज और मेवाती की मिश्रित मिठास घुली हुई थी. दफ़न हो गई दो सौ सत्तर सालों की मेवातियों की वह कुर्बानी, जिसके सबूत हमें इतिहास के मटमैले पन्नों पर खोजने पर भी नहीं आसानी से नहीं मिलते हैं.''

लेखक परिचय

भगवानदास मोरवाल का जन्म 23 जनवरी, 1960 को हरियाणा के मेवात ज़िले के नगीना कस्ब़े में हुआ. 'हलाला', 'बाबल तेरा देस में', 'रेत', 'नरक मसीहा', 'सुर बंजारन', 'वंचना', 'शकुंतिका', 'काला पहाड़' 'सिला हुआ आदमी', 'सूर्यास्त से पहले' सहित आपकी तमाम रचनाएं चर्चित रही हैं.

पुस्तक- ख़ानज़ादा

लेखक- भगवानदास मोरवाल

प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन

मूल्य- 399 रुपये
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