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  • BOOK REVIEW MUJHSE BHALA NA KOY COLLECTION OF ARTICLES BY RENOWNED HINDI POET SURENDRA SHARMA

मुझसे भला न कोय: हास्य की मीठी पुड़िया में व्यंग्य की तीखी डोज

जिन्हें पद्य में धार परोसने की महारत हो वे जब गद्य में अपनी पे आ जाएंगे तो सोचिए क्या मारक अंदाज़ होगा.

रचनाओं से पहले सुरेन्द्र शर्मा ने अपने पाठकों को दुर्लभ तस्वीरों के माध्यम से अपने परिवार, व्यक्तित्व, रंगमंच और जीवन के तमाम अहम अवसरों के बारे में रू-ब-रू कराया है.

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    बात शायद 1984-85 के आसपास की होगी, जब पिताजी एक ऑडियो कैसेट खरीदकर लाए थे 'चार लाइना'. हरियाणवी में पति-पत्नी की बीच तीखी और हास्यपद नोकझोंक सुनते हुए हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा के बारे में जाना था. अपट्रॉन के ट्यून-इन-वन पर इस कैसेट को इतना सुना कि सारे कटाक्ष जुवानी याद हो गए. पड़ौसी भी 'चार लाइना' को बड़ा ही रस लेकर सुनते थे.

    अभी हाल ही में उनकी एक कृति 'मुझसे भला न कोय' पढ़ने को मिली. पद्य की दुनिया में मुकाम हासिल करने वाले सुरेन्द्र शर्मा ने गद्य में भी व्यंग्य को बहुत ही रोचक अंदाज में पेश किया है. जिन्हें पद्य में धार परोसने की महारत हो वे जब गद्य में अपनी पे आ जाएंगे तो सोचिए क्या मारक अंदाज़ होगा. धाकड़ व्यंग्यकार सुरेन्द्र शर्मा की कलम ने 'मुझसे भला न कोय' के माध्यम से देश और समाज के हालात पर एक बार फिर सोचनो को मजबूर कर दिया है.

    'मुझसे भला न कोय' में वर्ष 2000 से लेकर 2003 तक विभिन्न हालात और घटनाओं पर लिखे लेखों को शामिल किया गया है. उनकी यह रचना बिल्कुल ही नए अंदाज में कॉफी टेबल बुक के रूप में प्रकाशित हुई है.

    पहली ही नजर में 'मुझसे भला न कोय' का आवरण आपको आकर्षित करता है. पहला पन्ना पलटते ही बचपन से लेकर अबतक के चित्रों के कोलोज में आपको अपने चहेते व्यंग्यकार विभिन्न रूपों में नजर आएंगे.

    रचनाओं से पहले सुरेन्द्र शर्मा ने अपने पाठकों को दुर्लभ तस्वीरों के माध्यम से अपने परिवार, व्यक्तित्व, रंगमंच और जीवन के तमाम अहम अवसरों के बारे में रू-ब-रू कराया है. 'मुझसे भला न कोय' के लेखों की भाषा बहुत सीधी और सच्ची है. इसमें भाषायी दांव-पेंच नहीं हैं. बहुत ही साधारण वाक्यों में सामाजिक कुव्यवस्थाओं पर धारधार व्यंग्य लिखे गए हैं. छोटे-छोटे वाक्यों में कसी हुई भाषा पाठकों को प्रभावित करती है.

    इस पुस्तक का एक और आकर्षक पहलू है इसके चित्रांकन. हर व्यंग्य में रेखाचित्रों के माध्यम से भी अपनी बात स्पष्ट करने का शानदार प्रयास किया गया है.

    'मुझसे भला न कोय' के बारे में वरिष्ठ रचनाकार कमलेश्वर लिखते हैं, 'सुरेन्द्र शर्मा का यह गद्य दुर्लभ और विलक्षण घटना है. मुझे उनकी इस पुस्तक में गद्य का एक नया रूप रूप देखने को मिला है. आज के व्यक्ति की दुविधा, असमंजस भरी जिंदगी, पीड़ा और दुख इंसान के पैरों तले जमीन छीन रहा है. मौजूदी खुली बाजार व्यवस्था में प्रत्येक वस्तु बिकाऊ है. मानवीय रिश्तों को तराजू पर तोला जा रहा है. दुविधाओं के ऐसे मकड़जाल को सुरेन्द्र शर्मा का कलम से भेदने का यह प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय है.'

    डॉक्टर विश्वनाथ त्रिपाठी लिखते हैं कि ये निबंध हास्य के नहीं, व्यंग्य के हैं क्योंकि विविध प्रतिष्ठानों या प्रतिष्ठित पुरुषों पर निर्मम प्रहार करते हैं.

    आत्मज्ञान जिसको हो जाए
    'मुझसे भला न कोय' में सुरेन्द्र शर्मा जी ने अपना जीवन परिचय भी अपने अनोखे अंदाज 'एक महान व्यक्ति यानि मैं' में दिया है. यहां वे लिखते हैं, ''आत्मज्ञान जिसको हो जाए, उसे बाहरी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है. बेशक पूरा देश मुझे एक आम आदमी समझता हो, लेकिन मुझे तो मालूम है ना कि मुझमें क्या खास है. मैं हनुमानजी तो हूं नहीं कि दूसरे के याद दिलाने पर मुझे अपना बल याद आए, मुझे तो पूरे विश्व को अपना विराट स्वरूप खुद ही दिखाना है.''

    अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए वे लिखते हैं, 'मेरा बचपन खेलते-कूदते और पिटते हुए गुजरा, आज के बच्चों को याद तक नहीं आता कि उन्हें पिता ने कब डांटा था. अब से कुछ साल पहले बच्चे यदा-कदा पिटते थे और उससे कुछ साल पहले बच्चे सर्वदा पिटते थे. मेरा बचपन उसी काल है. कई बार तो मेरे पिता मुझे पीटने के बाद पिटाई का कारण मुझसे से पूछते थे और न बता पाने के कारण फिर पीटते थे.'

    'एक महान व्यक्ति यानि मैं' में सुरेन्द्र शर्मा लिखते हैं, 'मैंने तीन साल का बी.कॉम, का कोर्स चार साल में गौरवशाली ढंग से पैंतालीस प्रतिशत अंकों के साथ संपन्न किया. पैंतालीस प्रतिशत इसलिए बताए क्योंकि अगर मैं नब्बे प्रतिशत लाता तो शायद कवि नहीं बनता. आज भी मेरा कॉलेज अपने होनहार छात्रों में मेरा उल्लेख नहीं करता क्योंकि उसे खतरा है कि कट ऑफ लिस्ट फिर से इक्यावन प्रतिशत न हो जाए.'

    संसार रुलाने वालों याद रखता है
    हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा का जन्म 29 जुलाई 1945 को हुआ था. अपने जन्मदिन के महत्व को वे कुछ इस तरह बताते हैं, '29 जुलाई के पूरे अखबार छान मारे. कहीं कोई जिक्र नहीं, कहीं कोई शोर-शराबा नहीं, कहीं उत्सव नाम की कोई चीज नहीं.'

    '30 जुलाई, 1945 को सुबह का सूर्य कुछ अलौकिक चमक लिए हुए था, सुबह-शाम सुहावनी हो गई थी. उस दिन की आज भी याद आती है तो आंखों से आंसू टपक पड़ते हैं. संसार क्या जानेगा इस तारीख का महत्व, जब देश ही नहीं जान पाया.'

    'संसार रुलाने वालों याद रखता है, हंसाने वालों को नहीं.'

    कैसे-कैसे कंधे, कैसे-कैसे धंधे
    धर्म और धंधे पर कटाक्ष करते हुए 'कैसे-कैसे कंधे, कैसे-कैसे धंधे' में कवि सुरेन्द्र शर्मा ने लिखा है, 'कंधों पर जिम्मेदारी तभी दी जाती है जब उसमें फायदा हो. क्योंकि सेवाएं अब उद्योग हो गई हैं. जह हमें कोई फायदा दिखा तो हमने गांधी को कंधे से उतार दिया और अंबेडकर को बैठा दिया.

    पिछले 50 साल में कंधों का भरपूर इस्तेमाल हुआ और यहां तक हुआ कि जिन लोगों को धर्म को कंधों पर बैठाकर लाना चाहिए था, वो धर्म के कंधों पर बैठकर राजनीति में आ गए.

    धर्म को कमजोर कंधे मिले रात हिन्दुओं तक सीमित रह गए, नानक सिखों तक, ईसामसीह ईसाइयों तक और मोहम्मद मुसलमानों तक. वरना इन सब संदेश तो संपूर्ण मानव जाति के लिए था.'

    देश में बढ़ते उधारी के जाल पर वे 'उधारी मांगने की कला' में कटाक्ष करते हैं, 'उधार के मामले में धीरे-धीरे तरक्की हुई है. अब उधार लेना एक कला नहीं व्यापार है. बड़े-बड़े लोग बड़ा उधार लेते हैं कि एक छोटा उधार चुका दें तो फिर वे बड़ा उधार लेकर मुकर जाते हैं. जो भी आपको लंबी और बड़ी गाड़ियों में धूमता दिखाई दे तो समझ लेना कि उसने बड़ा मोटा उधार लिया है.'

    रंग भी साम्प्रदायिक
    सांप्रदायिकता और बंटवारे की राजनीति पर तंज कसते हुए वे लिखते हैं, '26 जनवरी की परेड में शिवाजी की झांकी इसलिए नहीं निकाली जाती कि शिवाजी के हाथ में गेरुआ झंडा था, जिससे कई लोगों को साम्प्रदायिकता की बू आती थी, जबकि हकीकत ये है कि उस समय के राजाओं के झंडों का रंग गेरुआ ही होता था. हमने हरा रंग मुसलमानों का मान लिया. रंगों की मालूम भी नहीं होगा कि वे एक दिन साम्प्रदायिक हो जाएंगे.'

    प्यार का फार्मूला
    नौजवानों को प्यार करीरने से पहले प्रेम के कुछ फार्मूले देते हुए 'प्रेम के चक्कर में पड़ने से पहले' में देते हुए वे लिखते हैं, 'प्रेम की तैयारियों के लिए काफी सोच-समझकर काम किया जाए तो जोखिम कम रहता है.'

    'प्रमिका का नाम जानने के बाद जरू होती है, उसके बाप और भाई की जानकारी. ऐसा न हो कि उसका बाप या भाई थानेदार हो, बड़ा अफसर हो, गुंडा-बदमाश हो या गुंडे-बदमाश जैसा दिखता हो. शरीफ बाप प्रेम का पता चलने पर बेटी को पीटकर घर में बैठा देगा, प्रेमी को कभी नहीं पीटेगा.'

    महानायक पर तंज
    टीवी पर आने वाले कौन बनेगा करोड़पति शो के माध्यम से सुरेन्द्र शर्मा सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को भी कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूके. 'हुजूर आप ही बनेंगे करोड़पति' में सुरेन्द्र शर्मा लिखते हैं, 'गांधी ने अपनी पूरी जिंदगी एक लंगोटी में गुजार दी और उसी का नाम लेकर नेता करोड़पति क्या अरबपति हो गए. अमिताभ बच्चन! देश के लोगों को यह मत सिखाओ कि सुविधा से कैसे करोड़पति बना जाता है, सिखाना है यह सिखाओ कि कैसे संघर्ष करके आदमी करोड़पति बनता है.'

    राजनीतिक दलों पर सवालिया निशान
    'राष्ट्रीय पशु तो है पर राष्ट्रीय मनुष्य कहां' में व्यंग्यकार लिखते हैं, 'लोकतंत्र एक दुकान थी, अब समय के बदलाव को देखते हुए ये प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी हो गई है.'

    'कांग्रेस ने इस लोकतंत्र की दुकान से खाया. अब ये जो मिली-जुली सरकारें बन रही हैं, इस लोकतंत्र को ही खाने की कोशिश कर रही हैं. देश में राष्ट्रीय पशु है, राष्ट्रीय पक्षी है पर राष्ट्रीय इंसान नहीं मिल पा रहा.'

    मुझसे भला न कोय
    लेखक- सुरेन्द्र शर्मा
    साज-सज्जा- चिराग जैन
    अव्यक्त प्रकाशन
    मूल्य- 1000 रुपये
    Published by:Shriram Sharma
    First published: