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Book Review: फिल्मी गानों में शास्त्रीय संगीत की सुरीली कथा है रागगीरी

Piyush Babele
Updated: October 4, 2019, 1:33 PM IST
Book Review: फिल्मी गानों में शास्त्रीय संगीत की सुरीली कथा है रागगीरी
Book Review: फिल्मी गानों में शास्त्रीय संगीत की सुरीली कथा है रागगीरी

पत्रकार द्वय शिवेंद्र कुमार सिंह और गिरिजेश कुमार को अच्छी तरह पता था कि संगीत सुनना एक बात है और इसकी बारीकियों में उलझना दूसरी बात.

  • Last Updated: October 4, 2019, 1:33 PM IST
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संगीत की दुनिया विराट है. हर आदमी अपने स्तर पर इसमें रमा हुआ है. अगर भारतीय समाज की बात करें, तो संगीत और जीवन को अलग अलग करना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन संगीत का आनंद लेना जितना आसान है, उसकी बारीकियों को समझना उतना ही जटिल. तो उन लोगों को जो बीच सड़क पर कान में माइक्रोफोन लगाए संगीत सुनते चले जाते हैं या उन लोगों को जो अपने ड्राइंगरूप में शांति से बैठकर संगीत का आनंद लेते हैं, यह कैसे पता चले कि जो वे सुन रहे हैं, असल में वह है क्या. जो उन्होंने सुना फिल्मी, सुगम या शास्त्रीय गीत-संगीत उसे संगीत के जानकार किस नाम से पुकारते हैं. जो गीत उन्होंने सुना आखिर क्यों उसमें वही सुर छेड़े गए. इसकी जगह वह सुर लग जाता, तो क्या होता. राग यह न होकर वह होता, तो क्या होता. इन सारी जिज्ञासाओं के समाधान की कोशिश है 'रागगीरी'.

पत्रकार द्वय शिवेंद्र कुमार सिंह और गिरिजेश कुमार को अच्छी तरह पता था कि संगीत सुनना एक बात है और इसकी बारीकियों में उलझना दूसरी बात. इसलिए जब वे 'रागगीरी' किताब लिखने बैठे और तय किया कि राग केदार से राग हमीर तक 66 रागों को आमजन तक पहुंचाएंगे, तो उन्होंने बहुत रोचक तरीका निकाला. जाहिर है उन्हें यह तो बताना ही था कि राग की परिभाषा क्या है, राग गाने का समय क्या है, राग के वादी संवादी सुर कौन से हैं, वह किस थाट का राग है, लेकिन यह सब इस तरह बताना था कि मामला अकादमिक होते हुए भी, सरस रहे.

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इसलिए प्रभात प्रकाशन से छपी 225 पृष्ठों की इस किताब में हर राग को किसी फिल्मी गाने के जरिये समझाया गया है. किताब का उपशीर्षक साफ कहता है- फिल्मी संगीत में शास्त्रीय रागों की अनसुनी कहानी. लेखकों ने यह तरीका निकाला है कि पहले वे कोई पुराना गाना उठाते हैं, फिर उसकी बंदिश को पाठकों के मन में बिठाते हैं. जब पाठक गीत गुनगुनाने लगता है तो उससे मिलती जुलती बंदिश के दूसरे गीत याद दिलाते हैं. संगीत के व्याकरण से अंजान पाठक को भी गीतों के सुरों में समानता महसूस होने लगती है. तब जाकर वे उस राग के बारे में बताते हैं.

मामला और सरस हो जाए, इसलिए इन गीतों से जुड़े फिल्मी किस्से भी हर अध्याय में मिल जाएंगे. कहीं ये किस्से लेखक सुनाते हैं, तो कहीं फिल्म जगत की बड़ी हस्तियां अपने मुंह से ये किस्से सुनाती हैं. किताब में रुचि जगाए रखने के लिए पुराने फोटोग्राफ और स्केच का बड़ा सुंदर उपयोग किया गया है. हर अध्याय के अंत में राग के सुरों को लिखा गया है.

यह सारा प्रस्तुतिकरण इस तरह का है कि जो लोग संगीत को विधिवत नहीं सीख रहे, लेकिन सुर में जिनकी जिज्ञासा है, वे आसानी से रागों के बारे में समझ सकें. संगीत के व्याकरण पर निश्चित तौर पर बहुत सी अच्छी किताबें उपलब्ध हैं, लेकिन यह किताब हिंदी फिल्मी संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत के रिश्ते की जो कथा बुनती है, वह वाकई नई है.

लेखक: शिवेंद्र कुमार सिंह और गिरिजेश कुमार
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प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 450 रुपये

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First published: October 4, 2019, 1:33 PM IST
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