Book review : ठहरे हुए बिहार की बहती हुई कहानी है 'रुकतापुर'

इस किताब की बड़ी खासियत हैं वे सरकारी आंकड़े और बयान जो लेखक ने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान जुटाए.
इस किताब की बड़ी खासियत हैं वे सरकारी आंकड़े और बयान जो लेखक ने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान जुटाए.

रुकतापुर एक रिपोर्टर की डायरी है - इसमें पत्रकार की पैनी दृष्टि है. पत्रकार का काम सरकारी प्रवक्ता बनना नहीं होता, वह हमेशा विपक्ष की भूमिका निभाता है. कुशल वैद्य की तरह अपने समाज, अपने परिवेश की नब्ज पर पकड़ बनाए रखता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 27, 2020, 6:31 PM IST
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'रुकतापुर'. जी हां, पुष्यमित्र को पढ़ते हुए लगा कि यही नाम हो सकता है बिहार की अब तक की सरकारों का. पुष्यमित्र की किताब 'रुकतापुर' राजकमल प्रकाशन के उपक्रम 'सार्थक' से छपकर आई है. इस किताब में भूमिका और परिशिष्ट मिलाकर कुल 10 अध्याय हैं. हर अध्याय में 4 से 6 रिपोर्ट हैं. भूमिका और परिशिष्ट के अलावा सिर्फ दो अध्याय ऐसे हैं जिनमें एक-एक रिपोर्ट है. सच कहूं तो यह किताब एक रिपोर्टर की डायरी की तरह है. इस डायरी में रिपोर्टर की वह पैनी दृष्टि है, जो विकास के सरकारी दावों को आईना दिखलाती है. उसके रेशे-रेशे की सच्चाई सामने रखती है. बिहार की बदहाली को लेकर रिपोर्टर की चिंता भी इसमें शामिल दिखती है. बदहाली की वजहों की बारीक पड़ताल भी है इस डायरी में.

इसके बावजूद कहना होगा कि यह किताब बिहार का प्रतिनिधि चेहरा नहीं है. बिहार महज कमियों का, कमजोरियों का, गरीबी का, अशिक्षा का, विपन्नता का और सरकारी लूट-खसोट का नाम नहीं. बल्कि संस्कृति का, साहित्य का, ज्ञान और जिजीविषा का दूसरा नाम है बिहार. यहां पर एक सवाल मन में उठ सकता है कि फिर पुष्यमित्र की किताब रुकतापुर क्यों पढ़ी जाए? मैंने पहले ही कहा है कि रुकतापुर एक रिपोर्टर की डायरी है - इसमें पत्रकार की पैनी दृष्टि है. जाहिर है पत्रकार का काम सरकारी प्रवक्ता बनना नहीं होता, वह हमेशा विपक्ष की भूमिका निभाता है. कुशल वैद्य की तरह अपने समाज, अपने परिवेश की नब्ज पर पकड़ बनाए रखता है. कमजोर पड़ते तंत्रों पर अंगुली रखता है, उसके दुखते रगों को दुरुस्त करने के लिए जरूरत पड़ने पर कुरेदता भी है. कुल मिलाकर कुशल पत्रकार अपने वक्त की छुपी हुई कमजोरियों की पहचान कर उसे सामने लाता है. जाहिर है पुष्यमित्र की यह किताब बिहार के संदर्भ में अपनी इस भूमिका में परिवक्वता और तार्किकता के साथ खड़ी दिखती है. शायद ऐसी ही भूमिका के कारण पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दर्जा बिन मांगे मिला है.

रुकतापुर की भूमिका की पहली पंक्ति में ही पुष्यमित्र ने लिखा है 'अपने राज्य के मौजूदा हालात को 'रुकतापुर' का नाम देना अच्छा नहीं लगता'. जाहिर है यह लेखक का बिहार प्रेम है. वे बिहार को करीब से पहचानते हैं, बिहारियों की उस मजबूत इच्छाशक्ति को जानते हैं जो अतिवृष्टि और अनावृष्टि का शिकार होते रहने के बावजूद अपनी जिजीविषा को मंद नहीं पड़ने देते. बल्कि सामूहिकता में जीने की अपनी संस्कृति के कारण ही तकलीफ में भी खिलखिलाना जानते हैं, थिरकना जानते हैं. यह सब जानता-समझता लेखक खुद को मुग्ध नागरिक होने देने के बजाए बहुत सजगता से इसकी उन वजहों की पड़ताल करता है जिससे इस राज्य की पहचान 'मजदूर सप्लायर' राज्य के रूप में बनती जा रही है. लेखक जानता है कि बिहार में अधिकतर समस्याएं कृत्रिम हैं, रची गई हैं. राजनीतिक इच्छा-शक्ति और उसके लोभ की वजह से पैदा हुई समस्याएं हैं. इसीलिए तो उसने बड़ी तकलीफ के साथ लिखा है 'मगर आजादी के पहले इसे अंगरेजों ने लूटा और तबाह किया. आजादी के बाद हमारे अपने राजनेताओं ने इसे अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं के दोहन का जरिया बना लिया. आजादी के 73 सालों में देश के ज्यादातर राज्यों ने धीरे-धीरे अपनी परिस्थितियों को संवारा और विकसित हुए, जबकि बिहार एक लेबर सप्लायर राज्य बनकर रह गया.'



पहले अध्याय का शीर्षक है - जा झाड़ के, मगर कैसे (रोजी-रोजगार के मामले में ठहरा हुआ प्रदेश). बिहार को जानने-समझने वाले लोग 'जा झाड़ के ' के बारे में जानते होंगे कि यह एक चर्चित लोकगीत की पंक्ति है. इस पंक्ति का आशय सिर्फ झटकने से नहीं, मटकने से भी है, इठलाने और गर्व करने से भी है. लेकिन शीर्षक में ही लेखक ने सवाल उठाया है कि (इन हालात में) कैसे हम झटककर चलें, कैसे मटककर चले, कैसे इठलाएं और कैसे गर्व करें? ऐसा नहीं कि शीर्षक में सवाल उठाकर लेखक भूल गया. बल्कि इस शीर्षक के तहत लिखी गई चारों रिपोर्ट में बहुत ही पुख्ता ढंग से उसने वे स्थितियां रखी हैं, जो हमें झाड़ कर जाने नहीं देती, बल्कि झटककर रोक लेती हैं और इसीलिए अफसोस के साथ लेखक बार-बार लिखता है अपना राज्य - रुकतापुर - बन गया है. यहां चेन पुलिंग कर सिर्फ ट्रेनें ही नहीं रोकी जातीं, बल्कि विकास की तमाम संभावनाओं की भी चेन पुलिंग कर ली जाती है.
दूसरे अध्याय का शीर्षक है - घो-घो रानी, कितना कितना पानी. बिहार में अपना बचपन गुजार चुके लोग इस घो-घो रानी... को पढ़कर अपने बचपन के उस खेल को याद करेंगे जिसका अंत पानी में डूबने के छपाक की आवाज से हुआ करता था. इस अध्याय के दो लेख बाढ़ से आई तबाही और दो लेख गुम होते तालाबों की कहानी बयान करते हैं. इस अध्याय के पहले लेख में ही पुष्यमित्र तारीख दर तारीख पेश करते हैं जब बाढ़ ने तबाही मचाई हो. वे बताते हैं कि गांव तो गांव, शहर भी बदहाल हो गए थे. सीएम नीतीश कुमार ने बदहाल हुए इलाके का हवाई दौरा किया था और बाद में कहा था कि यह 'फ्लैश फ्लड' है. नीतीश का बयान मीडिया में चला था - फ्लैश फ्लड आ गया था. हम चेत नहीं पाए. अचानक पानी आ जाए तो कोई क्या कर सकता है! पुष्यमित्र लिखते हैं 'फिर आपदा विभाग ने भी यही कहा, डीएम ने, एसडीओ और बीडीओ ने भी. मीडिया भी तोता रटंत की तरह दुहराने लगा. किसी ने नहीं पूछा कि जिस महानंदा का पानी चार रोज पहले सिलीगुड़ी और उत्तर बंगाल में तबाही मचा रहा था, उसे आना तो बिहार के रास्ते किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया जिले में ही था. आपको तो चार रोज पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए था. जिस गंडक का पानी एक हफ्ते से नेपाल को तबाह किए हुए था, वही पानी तो बगहा और बेतिया और आसपास के इलाके में पहुंचा है. इसे फ्लैश फ्लड क्यों कहते हैं? अगर चार रोज पहले आप चेत जाते तो पूरे इलाके को यह परेशानी नहीं होती. खैर...' पुष्यमित्र का अफसोस भरा यह शब्द 'खैर' हमें गोरख पांडेय की कविता की याद दिला देता है -
राजा बोला रात है,
रानी बोली रात है,
मंत्री बोला रात है,
संतरी बोला रात है,
सब बोले रात है,
यह सुबह सुबह की बात है।

पुष्यमित्र बताते हैं कि जिस राज्य में बाढ़ का इतना पानी हर साल आता है कि गांव-के गांव डूब जाते हैं, शहरें बदहाल हो जाती हैं, उसी राज्य में गर्मी के दिनों में पेयजल संकट पैदा हो जाता है. यह बेहद आश्चर्य की बात है. पुष्यमित्र की टिप्पणियां बताती हैं कि इस राज्य के तालाब गुम होते जा रहे हैं. लोगों ने उसे भर दिया है. सरकार भी सहयोगी रही है. तालाब भर कर, नदियों के तट पर कब्जा कर बस्तियां बसाई जा रही हैं. सरकार और यहां रहने वाले लोग पानी से हो रही हत्या भी झेल रहे हैं साथ ही पानी की भी हत्या कर रहे हैं.

तीसरे और चौथे अध्याय का शीर्षक क्रमशः दूध न बताशा, बउवा चले अकासा और जै-जै भैरवी है. इन दो अध्यायों में पुष्यमित्र ने बिहार की दो बड़ी समस्याओं पर विस्तृत रिपोर्ट दी है. इलाके में घूम-घूमकर लोगों से बात की है. सरकारी अधिकारियों से फाइलें छनवाई हैं, आंकड़े निकलवाए हैं और अपने पाठकों को जमीनी हकीकत से रूबरू करवाया है. उन्होंने बताया है कि एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार से बच्चे मर रहे हैं. इन बच्चों को बचाया जा सकता है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो, स्थानीय अस्पतालों की स्थिति ठीक करनी होगी और साथ ही इलाके में जागरूकता फैलानी होगी. बस यही छोटे से उपाय करने भर से मर रहे बच्चों को बचाया जा सकता है. इसी तरह उन्होंने बताया है कि बिहार के गांवों जहां गरीबी सिर चढ़कर बोल रही है, वहां के लोग हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के लोगों के हाथो अपनी बेटियां बेच रहे हैं. यह अलग बात है कि यह 'बेचना' शादी की आड़ में किया जा रहा है. पुष्यमित्र ने अपनी इस किताब में एसीड अटैक झेल रही महिलाओं की भी कहानी बताई है. बिहार में सरकारी अधिकारियों का इनके प्रति रवैया बताया है. सरकार की ओर से मिलने वाली मुआवजा राशि की सच्चाई बताई है. एसीड अटैक की शिकार महिलाओं के बयान से इन्होंने बताया कि यह समाज कितना क्रूर है, जो तेजाब की शिकार महिला के खिलाफ खड़ा हो जाता है जबकि तेजाब फेंकने वालों की शादी में शरीक होकर जश्न मनाता है.

अपनी इस किताब में पुष्यमित्र ने यह गुजारिश की है कि इसे नीतीश के कार्यकाल की समीक्षा के रूप में न देखा जाए, इस किताब का मकसद तो आजादी के बाद से बिहारियों की बदहाली की ओर बढ़ते कदम की ओर इशारा करना मात्र है. यह किताब हमें बिहार के गांवों में पसरी गरीबी, अशिक्षा की ओर तो ध्यान दिलाती ही है, यह, यह भी बताती है कि आखिर इस गरीबी और अशिक्षा की वजहें क्या हैं. दरअसल, यह किताब घर में बैठकर या गूगल के आंकड़ों के बल पर नहीं लिखी गई है, बल्कि इसमें आपको गांव-गांव भटकता लेखक मिलेगा, सरकारी आंकड़ों के लिए दफ्तरों की खाक छानता रिपोर्टर मिलेगा.

पांचवें अध्याय - केकरा से करीं अरजिया हो सगरे बटमार - में कुछ छह रिपोर्ट हैं. इसमें किसानों की दुर्दशा, बटन उद्योग, सोनपूर मेला और सरकारी धोखे की कहानियां हैं. पहली टिप्पणी सवाल उठाती है कि गांव के किसान क्यों पैक्स ( प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसाइटी) के भरोसे नहीं रहना चाहते, जबकि बिहार में यही संस्था धान की सरकारी खरीद के लिए अधिकृत की गई है. इन टिप्पणियों में यह भी खोज करने की कोशिश दिखती है कि किसानों को खेती के लागत मूल्य से भी कम में क्यों बेचना पड़ता है अनाज. पुष्यमित्र बताते हैं कि तरारी जाने के रास्ते में एक गांव से गुजरते हैं जिसका नाम है धनछुआं. वे बताते हैं कि उस गांव का नाम इसलिए धनछुआं पड़ा है कि वहां धान की पैदावार बहुत होती है. पर उन्हें इस गांव में एक अजब दृश्य दिखता है. वे बताते हैं कि सड़क किनारे एक घर के दरवाजे पर सैकड़ों बोझे धान के पड़े हैं. उन बोझों में धान की बालियां साफ नजर आ रही थीं. पूछने पर किसान बबन ने बताया 'क्या करें. सोच रहे हैं, पैक्स वाला खरीदने का वादा करेगा तो दौनी कराएंगे. नगीं चो ऐसे ही छोड़ देंगे. दौनी कराने में भी कम पैसा थोड़े ही लगता है. अगर रेट नहीं मिलेगा तो इसमें पैसा काहे लगाएंगे?' उस किसान ने बताया कि पूरे धनछुआं गांव का यही हाल है. वहीं खड़े एक दूसरे किसान ने भी अपने खर्च की बात बताई और कहा कि इस बार अगर नुकसान उठाना पड़ा तो अगली बार से चना वगैरह की खेती करेंगे. इस गांव में तकरीबन डेढ़ हजार किसान हैं. सबका यही हाल है. एक किसान ने कहा कि कहीं गार्ड की नौकरी कर लेंगे पर अब किसानी नहीं करेंगे. पुष्यमित्र बताते हैं कि इस बातचीत के क्रम में कई किसान उग्र हो गए. एक ने कहा 'भोजपुर जिले के सभी पैक्स संचालकों ने मिलकर फैसला किया है कि किसानों को 1200 रुपए से अधिक का रेट नहीं देना है. सरकार अलग रेट तय करती है, पैक्स अलग. सरकार कहती है कि किसान को धान की सही कीमत दे रहे हैं, मगर खरीद मूल्य का बड़ा हिस्सा पैक्स संचालक और बिचौलिया हड़प लेता है. इसलिए सबसे अच्छा होगा कि पैक्स को ही बंद कर दिया जाए.' वहां मौजूद सभी किसानों ने उनकी राय का समर्थन किया और जोर जोर से कहने लगे, 'पैक्स मतलब बिचौलिया. सरकार अगर किसानों का हित चाहती है तो पैक्स संस्था को खत्म करे, नहीं तो किसान मारे जाएंगे. बाजार ओपन करना होगा, फ्री सेल होना चाहिए.'

किसानों की बात से आगे बढ़कर इस अध्याय की तीसरी रिपोर्ट सोनपुर मेले की दुर्दशा बयान करती है. यह दिखता है कि परंपरागत रूप से सोनपुर का जो मेला लगता था, उसपर अब कानूनों की मार पड़ी है. स्वतः स्फूर्त मेले का जो चेहरा होता था, वह कानून की सख्तियों के आगे दम तोड़ रहा है. जिस मेले में पशु-पक्षियों के खरीदार आते थे, हाथी-घोड़े, पंछी बेचने वाले आते थे, उन दोनों की संख्या बुरी तरह घटने लगी है. जिन नर्तकियों की वजह से मेले में भीड़ लगती थी अब उनके पोस्टरों को अश्लीलता के नाम पर प्रशासन लगने नहीं देता, बल्कि हद तो यह है अब उन्हें नृत्य की इजाजत भी प्रशासन की ओर से नहीं मिल पा रही. इस सीरीज की चौथी टिप्पणी बदहाल हो चुके बटन उद्योग की कहानी बताती है. पुष्यमित्र बताते हैं कि विश्वभर में चर्चित मेंहसी का नाम उनके जेहन में उनके छुटपन से बसा है और उन्हें लगता था कि यह कोई बेहद आकर्षक नगरी होगी. पर वहां पहुंचने पर 2016 में पुष्यमित्र ने पाया कि वह बेहद सामान्य सा इलाका है जहां हर घर में बटन बनाए जाते हैं. लेकिन इन बटनों को बनाने का तरीका आज भी वही है जो सौ बरस पहले हुआ करता था. वे बताते हैं कि बटन बनाने वाली मशीने पैडल से चलने वाली सिलाई मशीन की तरह है जिसमें सिर्फ शारीरिक ऊर्जा लगती है. हर घर में वैसे ही घिसे-पिटे सौ बरस पुराना वाला ढांचा पड़ा है. कारीगरों के तन पर ढंग के कपड़े भी नहीं हैं.

इस सीरीज की पांचवी टिप्पणी सरकारी धोखाधड़ी को उजागर करती है. पुष्यमित्र याद दिलाते हैं कि चार-पांच साल पहले गौरव लग्जरी की बस सेवा सरकार के संरक्षण में 'बदलेत बिहार' के स्लोगन के साथ धूम-धाम से लॉन्च हुई थी. इसकी खूब ब्रांडिंग की गई थी. पर 2017 के नवंबर महीने में लेखक ने देखा कि राजधानी पटना स्थित परिवहन भवन के कैंपस में गौरव लग्जरी ट्रांसपोर्ट की दसियों मर्सिडीज बसे धूल फांक रही हैं. बसें कबाड़ बनने की हालत में हैं. जब उन्होंने इसकी वजहों की पड़ताल की तो लग्जरी बस सेवा के सीनियर मैनेजर विजय कुमार सिंह ने बहुत कुरेदने पर बताया कि 'सच यही है कि हमें सरकार का सहयोग नहीं मिला. 2011-12 में यह सेवा शुरू हुई थी. उस वक्त सरकार के साथ जो एग्रीमेंट हुआ था, उसपर सरकार कायम नहीं रह सकी. एग्रीमेंट में तय हुआ था कि बिहर में गौरव लग्जरी 500 बसों का संचालन करेगी. पहली किस्त में 45 बसें आईं, मगर सरकार ने सिर्फ 20 बसों को परमिट दिया. शेष 25 बसें साल भर बेकार इसी कैंपस में खड़ी ह गईं और सड़कर बर्बाद हो गईं. इसने कंपनी के ओनर हैदराबाद के उद्योगपति गौरव संघी और उनके परिवारवालों का उत्साह खत्म कर दिया. आप ही सोचिए, एक-एक बस 1 करोड़ 30 लाख रुपए में आती है. किसी बिजनेसमैन का 32-35 करोड़ का इन्वेस्टमेंट ऐसे ही बेकार पड़ा रह जाए तो क्या उसे अखरेंगा नहीं?'

इस किताब के सारे अध्यायों से गुजरते हुए जो कहानियां सामने आती हैं, वे बतलाती हैं कि क्यों बिहार का दूसरा नाम रुकतापुर है. सच है कि यहां विकास अगर रुका है तो उसकी एक बड़ी वजह सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति भी है, लेकिन उससे ज्यादा दोषी वह सरकारी वर्क कल्चर है जो अपनी ओछी मानसिकता से बाहर नहीं आना चाहता. रुकतापुर में दिए गए आंकड़े कोरी कल्पना नहीं हैं, बल्कि इनमें अधिकतर आंकड़े सरकार से ही लिए गए हैं. ये आंकड़े बतलाते हैं कि सरकार को इस रुकतापुर के बारे में जानकारी है और वह यह भी जानती है कि राज्य जबतक रुकतापुर बना रहेगा तबतक सरकार और उनके अफसरों का निजी फायदा होता रहेगा.

इस किताब में जहां एसीड अटैक के केसेज की चर्चा है, पीड़ित महिलाओं के जो बयान हैं, वे सिहराने वाले हैं. चमकी रोग से मर रहे बच्चों की कहानी और उस परिवार की पीड़ा को पढ़ने के बाद आपके विचार वहीं अटक जाते हैं. तेजाब से हुए हमले या चमकी से मरे बच्चों के लिए जो तय मुआवजे हैं, वह भी सही तरीके से पीड़ित परिवार तक नहीं पहुंच पाते. अपने अंतिम अध्याय - सवाल तो बनता है - में पुष्यमित्र ने जितने आंकड़े पेश किए हैं, वे यह स्थापित करने के लिए काफी हैं कि सरकार के पास पहले के मुकाबले जितने आर्थिक संसाधन हैं, उसके मुकाबले उसकी इच्छाशक्ति कमजोर है इसलिए वाकई सवाल तो बनता ही है.

मानता हूं कि रिपोर्टिंग ऐसा साहित्य है जिसमें लेखक दूसरों के मन की बात को आकार देता है. रुकतापुर में पुष्यमित्र ने यही किया है. बिल्कुल तटस्थ भाव से उन्होंने बिहार में पनप रही स्थितियों को देखा, उसकी वजहें तलाशी और उनके जवाब भी तलाशे. इन सारी चीजों को तार्किकता और तटस्थता के साथ लिखा. बल्कि कहना चाहिए कि रिपोर्टर जब समझदार और संवेदनशील होता है तो वह चीजों को जितने करीब से महसूसता है, उतनी ही शिद्दत और लगन के साथ वह उसे लिखता है और तभी रुकतापुर जैसी कोई शानदार रचना हमसबों के बीच आ पाती है.

किताब : रुकतापुर
लेखक : पुष्यमित्र
प्रकाशक : 'सार्थक' राजकमल प्रकाशन का उपक्रम
कीमत : 250 रुपए
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