• Home
  • »
  • News
  • »
  • lifestyle
  • »
  • BOOK REVIEW THE PATH TO DETENTION CAMP GOES THROUGH THE LAW NO LANDS PEOPLE PUR

Book Review: डिटेंशन कैंप का रास्ता कानून से होकर जाता है- 'नो लैंड्स पीपल'

'नो लैण्ड्स पीपल-दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ असम'स एनआरसी क्राइसिस'.

Book Review: नागरिकता एक ऐसा टूल बन गया है, जिसका इस्तेमाल कर रातों रात हम मनुष्य अपने से 'कमतर मनुष्य' (Lesser Human) का सृजन कर डालते हैं.

  • Share this:
    (आशुतोष कुमार ठाकुर)

    कुछ किताबें आपको अपने परिचित भय के पास ले जाती है. उस डर के पास जिनके बारे में सोचने से आप घबराते हैं. ऐसा ही एक डर तब लगता है जब हम सुनते हैं कि अब भी ऐसे लोग हैं जिनकी नागरिकता तय नहीं है या तय है तो वह आधी अधूरी है या किसी शासक के मनमर्जी पर है उनका जीवन. एक पल के लिए आप खुद को उस आदमी की जगह पर रख कर देखते हैं जिसे अगली सुबह इस वतन से दूसरे वतन जबरिया भेज दिया जाना है, और आप सिहर जाते हैं. या आप अपने को उस दृश्य के दर्शक के रूप में देखते हैं जिसमें एक लड़की दो देशों की सीमा पर लगे बाड़ से झूल गई है, उसे गोली मार दी गई है, तब आप कांप जाते हैं. नागरिकता के सारे सवाल आपको डराते हैं और उस डर के मूल में है, राष्ट्रवाद की खेती. नागरिकता एक ऐसा टूल बन गया है, जिसका इस्तेमाल कर रातों रात हम मनुष्य अपने से 'कमतर मनुष्य' (Lesser Human) का सृजन कर डालते हैं.

    यह और ऐसे अनेक डर हैं, जिसका सामना आपका इस किताब से गुजरते हुये होता है: 'नो लैण्ड्स पीपल-दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ असम'स एनआरसी क्राइसिस'. अभिषेक साहा ने यह किताब आधुनिक भारत में असम प्रदेश और असमिया जनता के जीवन के ऐसे पहलूओं को पेश करती है जिनसे हमें नावाकिफ रखा गया है और उस नावाकिफ रखने के एवज में इस अंदाज के आख्यान ( Narratives) थमा दिये गए हैं, जो झूठ और मौकापरस्ती की बुनियाद पर रचे गए हैं.

    उदाहरण देना जरूरी हो तो उसकी शुरुआत यहीं से कर सकते हैं कि कितने लाख या करोड़ बांग्लादेश के नागरिक भारत में आकर बस गए हैं और भारत में भी सबसे अधिक प्रभाव उनकी बसावट का असम पर पड़ा है. कभी कोई कह देता है कि करोड़ो लोग ऐसे हैं जो बांग्लादेश से निकल कर भारत आए हैं और यहीं बस गए हैं. इन अफवाहों की शृंखला में अगली बात यह होती है कि पचास लाख या अस्सी लाख, यह संख्या झूठ बोलने वालों के साहस पर निर्भर करती है, मुसलमान बंग्लादेश से आकर यहां भारत में और वह भी खास तौर पर असम में बस गए हैं. यह आख्यानबाजी इस कदर जनमानस में पैठ गई है कि कहीं न कहीं स्थानीय मुद्दे भी इसी के इर्द-गिर्द भटकने लगते हैं. आश्चर्य नहीं कि किताब के पहले खंड, फाइटिंग दी फॉरेनर्स', में अभिषेक जिस मुद्दे को सबसे पहले स्पष्ट करते हैं उस अध्याय का नाम ही है: अ नंबर्स गेम'.

    एक अंग्रेज़ अधिकारी, सी.एस.मुलान, जो कि उन दिनों की इंडियन सिविल सर्विस का अधिकारी था, के लिखित बयान से अभिषेक यह स्थापित करते हैं कि यह समस्या, विभाजनकारी हर समस्या की तरह अंग्रेजों की देन है। वह जो हिन्दू-मुस्लिम विभाजन अंग्रेजों का प्रिय विषय था, इस विभाजन के प्रकार से उन्होने असम को भी अछूता नहीं रह गया था और जो आवागमन 1900 के आस पास शुरू हुआ था, वह आजादी के समय हौलनाक हिंसा के रूप में सामने आया. 1951 के उस दौर, जिसमें पहली बार असम में नागरिक रजिस्टर जैसा कुछ तैयार करने की कोशिश की गई थी, से पहले विभाजन की त्रासदी को पंजाब और बंगाल की तरह असम को भी झेलना पड़ा था लेकिन इस गुत्थी को सुलझाया जा सकता था अगर नीयत साफ होती.

    बहुत लंबी राजनीति उस एक सवाल पर भी हुई है कि किसी के असमिया होने या न होने का फैसला किस वर्ष के आधार पर किया जाए. 'दी सर्च फॉर कट-ऑफ ईयर' में अभिषेक इस बात की गहरी पड़ताल करते हैं कि उस खास भूगोल के नागरिक होने के लिए 1971 का वर्ष ही क्यों निर्धारित किया गया था और यह पड़ताल और गहराई में तब उतरती है जब 'एवरीवन वांट्स ए करेक्ट एन आर सी' नामक अध्याय में लेखक उन प्रवृतियों पर बात करते हैं जिनके जरिये मौजूदा सरकार, अपनी हठी में, पूरे भारत में एन आर सी लाना चाहती थी. बड़ी बारीकी से वे समझाते हैं कि असम की मुस्लिम आबादी ने नागरिकता के कठिन प्रश्न का सामना कई बार किया है इसलिए उनकी स्थिति अलग है लेकिन पूरे भारत में अगर मुसलमानों को कागज दिखाना पड़ गया तब मुश्किल बहुत बड़ी हो सकती है क्योंकि सबके पास अपनी जमीन जायदाद, घर आंगन का कागज हो यह जरूरी नहीं. कागज दिखाना और कागज नहीं दिखाना एक बहुत बड़ा मुहावरा बन गया था जब अपनी हेठी में सरकार इस एन आर सी को पूरे भारत में लागू करना चाहती थी.

    अगले खंड में वे दुर्भाग्यपूर्ण उस स्थिति की बात करते हैं जिसमें असम में 'डी' वोटर्स नामक अवधारणा की रचना की गई और फिर अनेक नागरिकों को 'डी' वोटर के कठघरे में रखा गया. जानने वाले जान कर हक्का बक्का रह जाएंगे कि 'डी' वोटर का मतलब डाउटफुल वोटर यानी स्ंदेहास्पद मतदाता है. यह तथ्य कुठाराघात की तरह पड़ता है कि वर्ष 1997 में लेखक की दादी को 'डी' वोटर की श्रेणी में रख दिया गया था जबकि वे 1951 में अपने पूर्वजों के साथ पूर्वी पाकिस्तान से अपनी उम्मीदों के हिंदुस्तान की तरफ आई थीं.

    पूरी किताब नागरिकता ढूंढो के इस सरकारी और प्रायोजित अभियान की कलई खोलती है. खास कर वह अध्याय इस पूरे सरकारी और राजनीतिक कवायद से उपजी निराशा और हताशा को जब बयान करता है जिसमें 'डेटेन्शन और डिपोर्टेशन' पर विस्तृत चर्चा है तब कलेजा चाक हो उठता है. डिटेन्शन कैंप के निर्माण में एक बड़ी पूंजी लगी है, जिसमें न जाने कितने खेल हैं लेकिन जो मजदूर इस निर्माण से जुड़े हैं, उनकी नियति एक है, उन्हें भी लगता होगा कि अगर उनके कागज पूरे नहीं हुए या वे कागज नहीं दिखा सके तब इसी डिटेन्शन कैंप के किसी कोने में उन्हें जगह मिलेगी, जहां मनुष्य को कम मनुष्य समझा जाता है.

    यह किताब अपनी संपूर्णता में उस रुकी हुई दास्तान का आलाप है जिसका नाम नागरिकता है और जिस पर गिद्ध राजनीतिज्ञों की नजर है. अभिषेक साहा किसी सिद्धहस्त की तरह तो चीजों को लिखते ही हैं, उनका इस मुद्दे से भावनात्मक लगाव और इस मुद्दे पर उनकी पिछले वर्षों की मेहनत किताब को गहराई प्रदान करती है. चर्चित पत्रकार अभिषेक साहा गुवाहाटी, असम में रहते हैं, दी इंडियन एक्सप्रेस के लिए पूर्वोत्तर भारत को कवर करते हैं. 2015-2018 के दौरान, दी हिंदुस्तान टाइम्स के लिए कश्मीर का संवाददाता थे तब उन्हें पत्रकारिता का उत्कृष्ट सम्मान रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिला था.

    पुस्तक: नो लैंड'स पीपल:दी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ असम'स एनआरसी
    लेखक : अभिषेक साहा
    प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस इंडिया
    कीमत : 599 रुपए
    Published by:Purnima Acharya
    First published: