Book Review : हिमालय की अंतर्कथाओं से रू-ब-रू कराते संस्मरणों का संग्रह

बांग्ला में लिखे प्रबोधकुमार सान्याल के संस्मरणों का हंसकुमार तिवारी ने किया है हिंदी में अनुवाद.

दृश्य खींचने वाली अभिव्यक्तियों की इस पुस्तक में भरमार है. वे ऐसा दृश्य रचते हैं मानो आप हिमालय की गोद में हों. आप क्षण भर को भूल जाते हैं अपने आज के शहर के कोलाहल को.

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जब आप कोई यात्रा संस्मरण पढ़ते हैं तो यकीन मानिए वह पढ़ना सिर्फ पढ़ना नहीं होता बल्कि लेखक की कलम के साथ उन इलाकों का विचरण करना भी होता है जिसे लेखक ने अपने अनुभवों से रचा है. इस कसौटी पर देखें तो प्रबोधकुमार सान्याल का यात्रा संस्मरण ‘उत्तर हिमालय चरित’ वाकई आपको हिमालय की यात्रा कराता है. हिमालय यात्रा के ये संस्मरण मूल रूप से बांग्ला में लिखे गए हैं. इनका अनुवाद हंसकुमार तिवारी ने किया है और इस संकलन को छापने की महती भूमिका राजकमल प्रकाशन ने निभाई है.

इन संस्मरणों से गुजरते हुए आप हिमालय की प्रकृति, उसके दुर्गम रास्ते और इन इलाकों के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास से भी परिचित होते चलते हैं. ‘चित्राल, पामीर-चिलास-बालतिस्तान’ वाले अपने संस्मरण में सान्याल बताते हैं कि ‘जो लोग हरमुख पर्वत या जोषीला की उत्तुंग चोटी पर चढ़ चुके हैं, वे ही इस बात को जानते हैं कि हिमालय, काराकोरम और हिंदूकुश अविच्छिन्न हैं. किसकी सीमा और अंत किस तरफ है, उनकी चोटियों के स्तर में अलगाव कहां हुआ है, उनसे उतरनेवाली जलधारा की गति कैसी है, किधर को है – इन बहुतेरे प्रश्नों का विचार और उत्तर खोजना पड़ता है. अंगरेजों के उदाहरण से अनुप्राणित होकर फ्रांस, इटली, आस्ट्रिया, स्विटजरलैंड, अमरीका, हालैंड आदि अनेक देशों के लोग आकृष्ट हुए.

काराकोरम के हिमशिखर महाकाल के प्रहरी की तरह सिर ऊंचा किए मध्य एशिया में सदा से खड़े हैं. काराकोरम की तुषार-विगलित अपार जलराशि एक ओर तो तकलामकान की विशाल मरु-सीमा में खो जाती है और दूसरी ओर की जलधारा को महासिंधु नदी सिंधुप्रदेश के दक्षिण अरब सागर को ले आती है. दुर्भाग्य से एक बार इस महासिंधु नदी का प्रवाह रुक गया था. यह जंगली जबर्दस्त और भीषण नदी जब हजारों-हजार फीट की गहराई बनाती हुई पश्चिम की ओर चली तो एक बार जोरों का भूकंप आया. उस भूकंप से गगनचुंबी नंगा पर्वत की एक छोटी चोटी टूटकर पूरी-की-पूरी इस नदी में गिर पड़ी, जिससे इस इलाके में एक और भूकंप-सा आ गया. उसकी गाज-आवाज से 25 मील दूर तक के इलाके कांप उठे. यह सन् 1840 की बात है. इससे नदी का प्रवाह रुक जो गया, तो नदी की गहराई से पानी की जो दीवार बन खड़ी हुई, वह लगभग आठ हजार फीट ऊंची हो गई और तटवर्ती जनपद गोर तथा चालीस मील दूर के गिलगित को केंद्र करके उसने एक विशाल समूह बना दिया. लेकिन छह ही महीने के अंदर काराकोरम के अनगिन हिमप्रवाहों के पानी के भयंकर आघातों से नदी-गर्भ में गिरी वह पर्वत-चोटी चूर-चूर होकर पश्चिम-दक्षिण के बहाव की ओर मेघनाद-सी भयंकर आवाज उठाती हुई बह गई! महासिंधु की उस भयंकर बाढ़ में पश्चिम पंजाब के बहुतेरे नगर और गांव चिड़ियों के पखने-से बहते गए! एक तरफ उत्तर से स्कार्दू और दूसरी तरफ गिलगित – इन दो जनपदों के बीच उस दिन के उस जल-प्राचीर का इतिहास आज भी स्मरणीय है!’

दृश्य खींचने वाली ऐसी अभिव्यक्ति की इस पुस्तक में भरमार है. ऐसे वाक्य विन्यास ऐसा दृश्य रचते हैं मानो आप हिमालय की गोद में हों. नयनाभिराम दृश्य आपको भरमा जाते हैं. आप क्षण भर को भूल जाते हैं अपने आज के शहर के कोलाहल को. लेखक के साथ-साथ हिमालय के मेरुदंड के दोनों किनारों पर आप साथ-साथ चलने लगते हैं.

मुमकिन है कि गाहे बगाहे आपको कुछ रचनाकारों की प्रकृति परक कविताएं याद आती रहें. मुमकिन है कि इन गद्यों को पढ़ते वक्त आपके सामने नागार्जुन उपस्थित हो जाएं और आपसे कह बैठें –

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर विष-तंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

लेकिन सच है कि इस पूरी किताब में कवि की ऐसी कोमल अभिव्यक्ति या दृश्यों से आपकी मुलाकात नहीं होगी. बल्कि सान्याल जी इस हिमालय शृंखला के आसपास घोड़ों की लाश भी दिखाते चलें और बताएं कि इस हिमालय की यात्रा कितनी दुर्गम है. सड़क कितने संकरे और भयावह हैं. यहां के जंगलों में शांति तो पसरी है पर एक अजब सा सन्नाटा भी पसरा है जो आपको सिहराता है.

जाहिर है कि सान्याल जी के संस्मरण आपके भीतर बसी हिमालय की काल्पनिक रुमानी संसार को खंडित कर ऐसे ठोस धरातल से परिचय कराते हैं, जो वाकई बहुत खुरदरा है. पर इस खुरदरेपन की व्याख्या उन्होंने बहुत ही मुलायम भाषा से की है. बिल्कुल हिमालय के बर्फ के फाहे सी भाषा है, जो आपको बोझिल नहीं होने देती, जो आपके भीतर डर नहीं पैदा करती. बल्कि आप इन विवरणों को पढ़कर हिमालय को करीब से महसूसने के इरादे से भर उठते हैं. कहना चाहिए कि ये यात्रा संस्मरण आपके भीतर एक रोमांच पैदा करते हैं.

ये संस्मरण मूल रूप से बांग्ला में लिखे गए हैं. पर हंसकुमार तिवारी ने हिंदी में अनूदित करते समय इसका प्रवाह बेहतरीन तरीके से बनाए रखा है. इसे पढ़ते हुए आपको एकबार भी नहीं लगेगा कि आप अनूदित सामग्री पढ़ रहे हैं. बल्कि जैसा विषय है उसके अनुरूप आप इसे पढ़ते हुए इसकी भाषा हिमालय से निकलती नदी की कलकल और स्निग्ध धारा की तरह महसूस होगी. इसके लिए हंसकुमार तिवारी अतिरिक्त रूप से बधाई के पात्र हैं.

किताब : उत्तर हिमालय चरित (यात्रा संस्मरण)
मूल भाषा : बांग्ला
लेखक : प्रबोधकुमार सान्याल
हिंदी अनुवाद : हंसकुमार तिवारी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
मूल्य : 350 रुपये

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