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नौकरी छूटी, बच्चा नहीं रहा लेकिन बाक़ी रहे ख़्वाब और हौसले

नौकरी छूटी, बच्चा नहीं रहा लेकिन बाक़ी रहे ख़्वाब और हौसले

देहरादून आकाशवाणी में अनाउंसर प्रियंका गोस्वामी  को ब्रेन टीबी है.

देहरादून आकाशवाणी में अनाउंसर प्रियंका गोस्वामी को ब्रेन टीबी है.

वो वक्त मुश्किल था लेकिन बीत गया. अब रोज सुबह उगता सूरज देखती हूं, खिलखिलाते बच्चे दीखते हैं, खुद गाड़ी चलाकर दफ्तर जाती हूं तो जीवन पर आस्था हर दिन के साथ बढ़ जाती है.

    सिरदर्द उठता तो दर्द की दवा निगल काम में जुट जाती. बुखार आने पर बचपन से सुनी दवा खाकर निश्चिंत रहती. धीरे-धीरे ये जरूरत बार-बार पड़ने लगी. अस्पताल जाने पर डॉक्टर ने एडमिट कर लिया. तब शुरू हुआ जांच का सिलसिला, जो ब्रेन टीबी पर जाकर थमा. दर्द की असहनीय पीड़ा में वह सिर दीवारों पर दे मारती. रात कमोड में मुंह डाले उल्टियां करते बीतती. इसी दौरान प्रेगनेंसी का पता चला. वो भावी बच्चे का उत्सव मनाती, उससे पहले ही गर्भ गिर गया. वो मुश्किल वक्त था जो बीत गया. अब वह रोज सुबह उगता सूरज देखती है, खिलखिलाते बच्चे दिखते हैं, जब खुद गाड़ी चलाकर दफ्तर जाती है तो जिंदगी पर भरोसा हर दिन के साथ बढ़ जाता है.

    प्रियंका गोस्वामी देहरादून आकाशवाणी में अनाउंसर हैं. आठ महीने पहले सिरदर्द और बुखार के बाद ब्रेन टीबी का पता चला. इस दौरान नौकरी छोड़ी. दर्द के कारण चलना दुश्वार हो गया, अबॉर्शन हुआ लेकिन हिम्मत नहीं खोई. अब वो बीमारी से बाहर आ रही हैं. पढ़ें, News18 से प्रियंका की ख़ास बातचीत.



    मैं उत्तराखंड के एक छोटे से गांव से हूं. चीड़-देवदार के पेड़, बर्फ, उफनती नदियों और ढेर सी किताबों के बीच बचपन बीता. पढ़ाई के लिए बाहर रही और मनपसंद शादी की. सब ठीक चल रहा था. एक दिन किसी बुरे सपने के साथ नींद खुली. पसीना-पसीना बैठी देर तक ईश्वर का शुक्र मनाती रही कि ये सपना है. लेकिन वो केवल सपना नहीं था, मुसीबतों का आगाज था. कुछ दिनों से लगातार सिर में दर्द और बुखार रह रहा था. छुट्टी लेकर अस्पताल गई तो डॉक्टर ने तुरंत एडमिट कर लिया. कहा गया कि मेरा टाइफाइड बिगड़ गया है. वहां से छुट्टी तो मिल गई लेकिन दर्द और भी पक्का साथी हो गया. इसके बाद से जांचों का सिलसिला चल निकला. कभी कोई डॉक्टर कुछ कहता तो कभी दूसरे की बात सिरे से खारिज कर देता. इस बीच मेरी रातें उल्टियां करते बीततीं.

    एक दिन मुंह से झाग निकलने लगा, जबड़ा टेढ़ा हो गया. आनन-फानन में पति अस्पताल लेकर गए. इसके बाद खून लिया गया, रीढ़ की हड्डी से पानी निकाला गया, तमाम तरह के टेस्ट के बाद पता चला कि मुझे ब्रेन मैनिंजाइटिस है. यानी ब्रेन का टीबी. कई महीनों के गलत इलाज के कारण सिर के भीतर काफी सूजन आ चुकी थी. नए सिरे से इलाज शुरू हुआ. तीन महीनों तक लगातार रोज इंजेक्शन लगते. तेज दवाओं के कारण मुझे हर चीज की दो इमेज दिखाई देती, पूरा शरीर कांपता, हमेशा तपती रहती. डॉक्टरों को पैरालिसिस का डर था. तमाम तकलीफों के बावजूद मैंने जीने की हिम्मत नहीं छोड़ी.



    इस मुश्किल वक्त पर पति और परिवार हौसला बने रहे. रोज मेरे पति उल्टे-फुल्टे तरीके से मेरी कंघी करते. एक वक्त पर हर चीज एकदम कायदे से बनी-संवरी देखने की आदी आंखें अपनी ऊपर-नीचे हुई चोटियां देखकर हंस देतीं. इसमें पति की हंसी भी शामिल रहती. सब दुबला होने के लिए इतनी कवायद करते हैं लेकिन मैं बिना जिम और डायट दुबली हो चुकी थी. खुशी से आने वालों से मजाक करती. अब मुलाकाती भी डबडबाई आंखों से मुझे नहीं देखते थे, बल्कि जोर से गले लगाकर मेरी हिम्मत की मिसालें देते.

    इस बीच डॉक्टर से पूछकर मैंने बच्चा प्लान किया लेकिन कमजोरी और दवाओं के कारण पहले ट्राइमेस्टर में ही वो नहीं रहा. ये तकलीफ शरीर की तकलीफ से कहीं ज्यादा भारी थी. लगता था, मेरा दिल फाहा-फाहा होकर उड़ता जा रहा है, उसी दुनिया में जहां वो बच्चा होगा, जो मेरी गोद में खेलने वाला था. जैसे-तैसे खुद को संभाला. अब भी दवाएं चल रही हैं. ठीक से चल नहीं पाती. कई बार दफ्तर जाते हुए गिरी हूं लेकिन वापस खड़ी हो जाती हूं. गिरना या सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश कतई शर्मनाक नहीं, जिंदगी से हार मान जाना ही असल हार है.

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