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24 की उम्र में चौथी स्टेज के कैंसर को हराया, रंगों को जीने के लिए रोज़ 14 घंटे करता है पेंटिंग

खुलते दरवाजे, जो जिंदगी में मेरे दोबारा लौटने को बताते हैं

खुलते दरवाजे, जो जिंदगी में मेरे दोबारा लौटने को बताते हैं

तब मैं 11वीं में था. लगातार पीठ में दर्द रहता. डॉक्टर के पास गए, टेस्ट हुए और पता चला कि मैं कैंसर की पहली स्टेज में हू ...अधिक पढ़ें

    वो 30 दिन मैं नरक जीता रहा. दिन-रात एक कमरे में बंद रहता, जहां डॉक्टरों के अलावा कोई भी नहीं आता था. छाती में सुइयां लगी हुई थीं और स्टैंड के साथ ही मुझे बाथरूम जाना होता. कभी उल्टियां होतीं तो कभी कहीं से खून बहने लगता.

    सुबह के 11 बजते तक इतना कुछ हो जाता कि लगता आधी रात हो गई है. मैं फिर भी स्केचिंग करता. 30 दिनों बाद वॉर्ड में शिफ्ट हुआ तो मेरे पास 30 पेंटिंग्स थीं.

    24 साल के कार्तिकेय शर्मा इतने खुशदिल  हैं कि उनसे बात करते हुए कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि महज 17 साल की उम्र से वे कैंसर से लड़ रहे हैं. सालभर पहले कैंसर का चौथा स्टेज डायग्नॉस हुआ, 9 महीने अस्पताल में बीते. इस दौरान भी कार्तिकेय पेंटिंग करते रहे. रंग उनकी जिंदगी है. कार्तिकेय ने hindi.news18.com से अपनी कहानी साझा की.

    तब मैं 11वीं में था. लगातार पीठ में दर्द रहता. डॉक्टर के पास गए, टेस्ट हुए और पता चला कि मैं कैंसर की पहली स्टेज में हूं. कमउम्र था. लोग मिलने-मिलाने आने लगे, पेरेंट्स खूब-खूब प्यार लुटाने लगे और मैं खुश था कि मुझे अपनी सख्त रुटीन से ब्रेक मिल रहा है. इलाज के दौरान मेरे पूरे शरीर में गांठें बढ़ने लगीं. उल्टियां होतीं, बुखार रहता लेकिन फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया. सालभर चले इलाज के बाद डॉक्टरों ने मुझे ग्रीन सिग्नल दे दिया. तब मेरे बोर्ड एग्जाम करीब थे.

    दिनभर दो ही काम होते, पढ़ाई करना और पेंट करना. पढ़ाई दूसरों के लिए थी लेकिन पेंटिंग खुद के लिए.

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    सिंबियोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, पुणे में इंजीनियरिंग में मेरा सलेक्शन हुआ. तब तक मैं बीते साल का दर्द भूल चुका था. दूसरे बच्चों की ही तरह कॉलेज फेस्ट में हिस्सा लेता, तभी मेरा ध्यान कॉलेज की सूनी-सपाट दीवारों की तरफ गया. मैं उन्हें रंगना चाहता था. सीनियर्स की इजाजत ली और दीवारें रंगनी शुरू कीं. सबको मेरा काम इतना पसंद आया कि मुझे क्रिएटिव हेड बना दिया गया. मैं हर मौके पर सजावट का काम करता.

    मैं बहुत तेजी से पेंट करता. इतना कि एक ही शॉट में 100 स्कवायर फीट की दीवार पेंट कर लेता. एक बार लगातार 14 घंटे तक बिना रुके पेंट किया.

    इसके बाद से मुझे यहां-वहां से बुलावे आने लगे. मैं खुद पुणे के रेस्तरां, पब्स, दूसरे कॉलेजों में जाता और उनकी दीवारें पेंट करता. जिंदगी से जुड़े रंग जैसे सुर्ख लाल, हरा और नीला मेरी लगभग सभी वॉल आर्ट में दिखते. स्केचिंग के लिए मैं पुणे के एक छोर से दूसरे छोर तक जाता. तब अस्पतालों के फेरे थोड़े कम हो चुके थे इसलिए सालभर में 50 रेस्तरां की दीवारें रंग डालीं.

    दोस्त मजाक उड़ाते कि मंगल ग्रह की दीवारें रंगनी हों तो मैं वहां भी चला जाऊंगा. रंगों के लिए मेरा पागलपन सचमुच इतना था. 

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    तभी-तभी मुझे दोबारा पीठ और कमर में दर्द रहने लगा, हल्का बुखार भी रहता. तेजी से वजन कम होने लगा. मुझे लगा कि ज्यादा काम के कारण ऐसा हो रहा होगा और टालता रहा. दर्द बढ़ने पर चेकअप के लिए गया तो पता चला कि मेरा कैंसर लौट आया है, वो भी चौथी स्टेज के साथ. इलाज शुरू हुआ लेकिन तब तक कैंसर पेट से लेकर दिमाग तक पसर चुका था. 24 घंटे दर्द में रहता, पेन किलर्स अब बेअसर हो चुके थे. कीमो से बाल झड़ गए. जीभ का स्वाद चला गया.

    अब मैं खाना खाता तो चाहे वो कितना ही अच्छा बना हो, न तो मुझे कोई गंध आती और न ही स्वाद.

    कैंसर इतना फैल चुका था कि कीमोथैरेपी काम नहीं कर रही थी, अब बोन मैरो ट्रांसप्लांट अकेला ऑप्शन था. डॉक्टरों ने बताया कि इसमें भी बहुत खतरा है लेकिन हम तैयार हो गए. मां के स्टेम सेल्स मुझमें ट्रांसप्लांट किए जाने थे. वे दिन मेरी जिंदगी के सबसे दर्दनाक दिन थे. 30 दिनों तक मुझे एक कमरे में रखा गया. शरीर की सारी सेल्स खत्म हो चुकी थीं, छोटी से छोटी खरोंच जानलेवा हो सकती थी.

    तब डॉक्टरों ने मुझे नाक में उंगली डालने से मना किया और बिल्कुल बच्चों की सी उत्सुकता से मैंने नाक में उंगली डाल ली. खून बहना शुरू हुआ तो रुकने का नाम नहीं ले रहा था. जैसे-तैसे उसे कंट्रोल किया गया. मैं हर थोड़ी देर में उल्टियां करता.

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    सबसे ज्यादा मुश्किल ये थी कि खुले मैदानों का मेरा कैनवास अब एक कमरे में सिमट गया था. फिर भी मैंने स्केचिंग नहीं छोड़ी और एक महीने में मेरे पास पूरे 30 स्केच थे. इसके बाद के नौ महीने अस्पताल में ही रहा और लगभग रोज पेंट करने की कोशिश करता. जनवरी में वॉर्ड में शिफ्ट हुआ था और सितंबर खत्म होने पर मुझे घर जाने दिया गया.

    घर आते ही मैंने पहला काम किया, इन दिनों की अपनी सारी तस्वीरें जमा करना और आर्ट गैलरीज से संपर्क करना. मुझे पहली आर्ट एग्जिबिशन लगाने का मौका मिला. मेरी प्रदर्शनी महीनेभर चली और लगभग सारी पेंटिंग्स खरीद ली गईं.

    बीमारी के दोबारा लौटने के बाद से मैं अमूर्त पेंटिंग करने लगा हूं. खुलते दरवाजे, जो जिंदगी में मेरे दोबारा लौटने को बताते हैं या फिर स्टेम सेल्स, जिनसे मेरी जान बची. हफ्तेभर पहले चैन्नई में हुए TED टॉक में मुझे बुलाया गया.

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    मैं अब भी स्टेरॉइड्स पर हूं, दो मुझे दिन में 15 बार लेनी होती हैं. इसके लिए मैंने अलार्म लगा रखा है. वो सारे काम करता हूं जो मुझे जिंदा रखने के लिए जरूरी हैं लेकिन पेंटिंग इन सबसे ऊपर है. चाहे मुझे उल्टियां हों, बैठ न पा रहा हूं या फिर बुखार हो जाए, मैंने खुद को लक्ष्य दे रखा है. दिन में एक स्केच हर हाल में बनाता हूं. घर ही मेरा वर्क स्टेशन है. काम करने में कोताही न हो, इसलिए 9 से 5 किसी दफ्तर की ही तरह काम करता हूं. बीच में लंच ब्रेक लेता हूं.

    चाहता हूं कि एक सुबह उठूं और सारे दर्द खत्म हो जाएं, बस बचें रंग और कैनवास. 

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