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डिप्रेशन के कारक बायोमार्कर की हुई पहचान, इलाज का मिल सकता है नया रास्ता - स्टडी

डिप्रेशन के कारक बायोमार्कर की हुई पहचान, इलाज का मिल सकता है नया रास्ता - स्टडी

इंसान में अवसाद की जांच की जटिलता (Complexity) आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. Image - Shutterstock

इंसान में अवसाद की जांच की जटिलता (Complexity) आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है. Image - Shutterstock

Causative Biomarkers of Depression Identified : अवसाद की जांच की जटिलता (Complexity) आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई. इसलिए समय पर इसकी पहचान नहीं हो पाती है और फिर इलाज में भी देरी होती है, जिससे स्थिति बिगड़ जाती है. लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस शिकागो (University of Illinois Chicago) के रिसर्चर्स की एक टीम ने अपनी नई स्टडी में इस समस्या के समाधान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. रिसर्च टीम ने प्लेटलेट्स (Platelets) में डिप्रेशन के बायोमार्कर (Biomarkers) की पहचान की है, जिससे इस डिजीज की गंभीरता का पता लगाना आसान होगा. इससे पहले हुई कई स्टडीज में ये बताया गया है कि इंसान और जानवरों के मॉडलों में एडेनिल साइक्लेज (adenylyl cyclase) की कमी से डिप्रेशन की स्थिति पैदा होना पाया गया है.

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Causative Biomarkers of Depression Identified : आजकल की लाइफस्टाइल में टेंशन और स्ट्रेस जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. ना चाहते हुए भी ये आपकी लाइफ में किसी ना किसी तरह एंटर कर जाते हैं और ज्यादा दिन तक अगर ये बने रहें तो आप अवसाद यानी डिप्रेशन (Depression) की जद में जा सकते हैं. इंसान में अवसाद की जांच की जटिलता (Complexity) आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई. इसलिए समय पर इसकी पहचान नहीं हो पाती है और फिर इलाज में भी देरी होती है, जिससे स्थिति बिगड़ जाती है. लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस शिकागो (University of Illinois Chicago) के रिसर्चर्स की एक टीम ने अपनी नई स्टडी में  इस समस्या के समाधान की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. रिसर्च टीम ने प्लेटलेट्स (Platelets) में डिप्रेशन के बायोमार्कर (Biomarkers) की पहचान की है, जिससे इस डिजीज की गंभीरता का पता लगाना आसान होगा. इससे पहले हुई कई स्टडीज में इंसान और जानवरों के मॉडलों में एडेनिल साइक्लेज (adenylyl cyclase) की कमी से डिप्रेशन की स्थिति पैदा होना पाया गया है.

एडेनिल साइक्लेज सेल्स के अंदर एक छोटा सा मॉलीक्यूल (अणु) होता है, जो न्यूरोट्रांसमीटर -सेरोटोनिन और एपिनेफ्रीन की प्रतिक्रिया में बनता है. इस स्टडी का निष्कर्ष मॉलीक्यूलर साइकेट्री (Molecular Psychiatry) जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

क्या कहते हैं जानकार 
यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस शिकागो (University of Illinois Chicago) में फिजियोलॉजी एंड बायोफिजिक्स एंड साइकाइट्री (Physiology and Biophysics and Psychiatry) के प्रोफेसर और इस स्टडी को लीड करने वाले मार्क रसेनिक (Mark Rasenick) के अनुसार, जब आप अवसादग्रस्त होते हैं तो एडेनिल साइक्लेज (adenylyl cyclase) का लेवल कम होता है. इसका कारण यह होता है कि एडेनिल साइक्लेज के कम होने से ऐसा इंटरमिडिएटरी प्रोटीन (Intermediate protein) क्षीण (emaciated) हो जाता है, जो न्यूरोट्रांसमीटर को एडेनिल साइक्लेज- जीएस अल्फा (Gsα) बनाने में की मदद करता है और ये कोलेस्ट्रॉल युक्त मैट्रिक्स वाली झिल्ली (लिपिड राफ्ट) से चिपक जाता है, जहां वह अपना काम ठीक तरह से नहीं कर पाता है. इस नई स्टडी के दौरान ऐसे कोशिकीय बायोमार्कर (cellular biomarkers) की पहचान की गई है, जो जीएस अल्फा (Gsα) को लिपिड राफ्ट से स्थानांतरित कर देता है. इस बायोमार्कर की पहचान ब्लड टेस्ट से की जा सकती है.

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इलाज के असर का भी मिलेगा संकेत
मार्क रसेनिक (Mark Rasenick)
ने 
बताया कि हमने एक ऐसी जांच विकसित की है, जो न सिर्फ अवसाद होना बताएगी बल्कि इससे एक ही बायोमार्कर से इलाज के असर का भी संकेत मिलेगा. रिसर्चर्स का मानना है कि वे इस ब्लड टेस्ट के जरिये मात्र एक हफ्ते में ये भी पता कर सकेंगे कि अवसादरोधी जो इलाज किया जा रहा है, उसका असर हो रहा है या नहीं. इससे पहले की स्टडी में ये बताया जा चुका है कि डिप्रेशन के लक्षण जब कम होते हैं, तो जीएस अल्फा (Gsα)  लिपिड राफ्ट (lipid raft) से अलग हो जाता है. हालांकि अवसादरोधी दवा लेने के बावजूद जिन मरीजों में सुधार नहीं होता है, उनमें जीएस अल्फा राफ्ट से चिपके ही रहते हैं. इसका मतलब यह है कि ब्लड फ्लो में अवसादरोधी (antidepressant) की पर्याप्तता नहीं है, जिससे कि लक्षणों में सुधार हो सके. इलाज शुरू करने के एक हफ्ते बाद ही ब्लड टेस्ट से यह पता चल जाएगा कि जीएस अल्फा लिपिड राफ्ट से अलग हुआ है या नहीं.

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चूंकि प्लेटलेट्स एक सप्ताह में बदल जाता है, इसलिए यह पता लगाना आसान हो जाता है कि इलाज से किन लोगों की स्थिति बेहतर हो रही है. इससे उस बायोमार्कर का पता लगा सकेंगे, जिससे इलाज सफल हो सकेगा.

कैसे मिलेगा फायदा
मार्क रसेनिक (Mark Rasenick) के मुताबिक इस समय रोगी और डॉक्टरों को कई सप्ताह या महीने यह जानने के लिए इंतजार करना होता है कि अवसादरोधी दवा या इलाज काम कर रहा है या नहीं. ऐसे में जब यह तथ्य सामने आता है कि इलाज का सही प्रभाव नहीं हो रहा है तो तत्काल वैकल्पिक इलाज आजमाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि करीब 30% मरीजों को जब इलाज से फायदा नहीं मिलता तो, ऐसे में यह विफलता आगे की विफलता की सीढ़ी बन जाती है और डॉक्टर और रोगी दोनों को यह लगने लगता है कि कुछ नहीं हो रहा है.वैसे भी अवसाद का डायग्नोसिस डॉक्टरों के ऐसे क्लिनिक में होता है, जहां सटीक स्क्रीनिंग की कोई व्यवस्था नहीं होती है. लेकिन इस जांच के आधार पर डॉक्टर यह कह सकते हैं कि आप अवसादग्रस्त तो दिखते हैं, लेकिन उनका रक्त ऐसा नहीं बताता है. इसलिए दोबारा ब्लड टेस्ट की जरूरत पड़ सकती है. रसेनिक (Mark Rasenick)  ऐसा स्क्रीनिंग टेस्ट (screening tests) विकसित करने के लिए अपनी कंपनी पैक्स न्यूरोसाइंस (Pax Neuroscience) के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.

Tags: Health, Health News, Lifestyle, Mental health

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