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सूरज को दीया दिखाने से लेकर कोख में बेटी की कामना करने का लोकपर्व छठ


Updated: November 1, 2019, 5:44 PM IST
सूरज को दीया दिखाने से लेकर कोख में बेटी की कामना करने का लोकपर्व छठ
सूरज को दीया दिखाना एक मुहावरा है जो परंपरा में शायद छठ के मौके पर ही किया जाता है

यह पर्व मुख्य रूप से बिहार (झारखंड समेत) और पूर्वी उत्तर प्रदेश का है, जो जातीयता के लिए बदनाम है. छठ के गीतों में भी समाज की जातीय संरचना को दरकिनार नहीं किया गया है.

  • Last Updated: November 1, 2019, 5:44 PM IST
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भारतीय संस्कृति में पर्व खास महत्व रखते हैं. इन पर्वों की अपनी सामाजिकता है. जिंदगी को उल्लास और संजीवनी देते ये पर्व अपनी उपस्थिति से समाज को नया रंग देते हैं. ऐसे ही पर्वों के बीच महापर्व के रूप में छठ को पहचान मिली है. सूरज, नदी, माटी, खेत-खलिहान मिलकर भारत का लोक रचते हैं और लोक की प्रकृति के प्रति आस्था का पर्व है छठ. ब्राह्मण, मंत्रों और किसी पुरोहिताई के बिना प्रकृति प्रदत्त चीजों के साथ पूजा का अवसर और समापन के लिए प्राकृतिक चीजें प्रकृति को अर्पित करने का अवसर है यह. भारत में सूर्य की उपासना का संदर्भ ऋग्वैदिक काल से मिलता है और मध्यकाल में आकर छठ पूजा का वह स्वरूप दिख जाता है जो आज वर्तमान रूप में पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है.

छठ शब्द षष्ठी का अपभ्रंश है. कार्तिक शुक्ल पक्ष की पष्ठी को मनाए जाने के कारण इसे छठ पर्व कहा गया. कुछ दंतकथाओं में सूर्यदेव और छठी मैया का संबंध भाई-बहन का है. बिहार में प्रचलित कथाओं में सूर्य और छठी मैया का संबंध मां-बेटे का है. सूर्य को शंकर और पार्वती का पुत्र माना जाता है. एक बार सूर्य पर बड़े राक्षस का संकट आ गया था. शंकर और पार्वती ने गंगा नदी से विनती की कि वह सूर्य की रक्षा करे. राक्षस से बचाने के लिए गंगा ने सूर्य को अपनी गोद में समेट लिया, फिर भी वह बचा नहीं पाई और सूर्य को राक्षस उठा ले गया. इसके बाद गंगा को सूर्य से पुत्रमोह हो गया और वह सूर्य को अपना बेटा बनाने की कामना से भर उठी. गंगा का सूर्य के प्रति इतना मोह पार्वती को पसंद नहीं आता है. लेकिन सूरज के मोह के कारण गंगा मां के रूप में पूजी जाने लगती है. गंगा नदी में खड़े होकर उसके बेटे को अर्घ्य दिया जाता है. गंगा के साथ ही दूसरी नदियों और जल के अन्य स्रोतों में भी सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा शुरू हुई. सूर्य की दो पत्नियां उषा और प्रत्यूषा उनकी दो शक्तियां मानी गई हैं. इसलिए शाम की आखिरी किरण से उषा और सुबह की पहली किरण से प्रत्यूषा को अर्घ्य दिया जाता है. यह साल में दो बार - एक बार चैत्र और दूसरी बार कार्तिक में - मनाया जाता है. लेकिन कार्तिक वाले छठ को मनाने वालों की संख्या बड़ी है.

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सूरज को दीया दिखाना एक मुहावरा है जो परंपरा में शायद छठ के मौके पर ही किया जाता है. हमारी प्रकृति के लिए सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है और कहा जाता है कि छठ व्रती अपने लोककर्म के लिए सूर्य से ऊर्जा ग्रहण करते हैं. पारंपरिक रूप से इस व्रत को महिलाएं ही करती हैं इसलिए छठव्रत करने वाली महिलाओं को भी छठी मैया के प्रतीक के रूप में देखा जाता है और व्रती महिलाएं अन्य लोगों के लिए पूजनीय होती हैं. छठव्रती के पैर छूना, व्रत के दौरान उनकी सेवा करना उस परंपरा का प्रतीक है जिसमें लोक ही पूजनीय है. कोई कथा-पुराण नहीं, पुरोहित नहीं बस व्रती की ही महिमा है.

पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, सूर्यवंशी श्रीराम जब लंका विजय के बाद लौटे तो उन्होंने अपने कुलदेवता सूर्य की आराधना की. अयोध्या में सरयू नदी के तट पर उपवास रखने के बाद अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद से कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत मनाने की परंपरा शुरू हुई. सप्तमी को सूर्योदय के बाद राम-सीता ने फिर से सूर्योपासना की. वहीं छठ पर्व को महाभारत के साथ भी जोड़ा जाता है. दुर्योधन ने कर्ण को अंगप्रदेश (वर्तमान भागलपुर) का राजा बनाया था. कर्ण प्रतिदिन नदी में खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे जिसके बाद उनकी प्रजा भी इसे करने लगी. कुंती से लेकर द्रौपदी तक के छठ पर्व करने का उल्लेख मिलता है. राजा प्रियंवद और उनकी पत्नी मालिनी के भी संतान प्राप्ति के लिए छठ करने का पौराणिक जिक्र है. संतान की कामना से जुड़ा छठ का यह पर्व आज सर्वकामना की पूर्ति के लिए मनाया जाता है.

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छठ को लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है. इस पर्व पर लोककंठों से फूटने वाले गीत महज तुकबंदी नहीं हैं, बल्कि बेहद सारगर्भित हैं. यह बात खूब प्रचलित है कि छठ बेटों का त्योहार है. पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ और पुत्र प्राप्ति के बाद कृतज्ञता जताने के लिए यह व्रत किया जाता है. लेकिन छठ के कुछ गीत हमें यह याद दिलाते हैं कि यह पर्व महज पुत्रों के लिए नहीं है, बल्कि बेटियों की शुभेच्छा से भी भरा हुआ है. इसके कई गीतों में बेटियों की कामना की गई है. ऐसा ही एक गीत है - पांच पुत्तर, अन्न-धन लक्ष्मी, धियवा (बेटी) मंगबो जरूर. यानी बेटे और धन-धान्य की कामना तो की गई है, लेकिन उसमें यह बात भी है कि छठ माता से बेटी जरूर मांगना है. यह ‘जरूर’ शब्द साबित करता है कि बेटियों को लेकर छठ पूजा करने वाले समाज ने बेटों और बेटियों में फर्क नहीं किया. एक और गीत है कि रुनकी-झुनकी बेटी मांगिला, पढ़ल पंडितवा दामाद, हे छठी मइया....
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ये गीत सदियों पुराने हैं. लोककंठों से फूटे थे ये गीत आज भी छठ के मौके पर गाए जाते हैं. इस गीत में रुनकी-झुनकी का मतलब स्वस्थ और घर-आंगन में दौड़ने वाली बेटी है. इसी पंक्ति में दामाद की भी मांग की गई है, पर गौर करें कि उस दामाद की कल्पना शरीर से बलिष्ठ नहीं, बल्कि मानसिक रूप से बलिष्ठ की है. इस गीत में छठी मइया से पढ़े-लिखे दामाद की मांग की गई है. यह बात ध्यान देने लायक है कि गीतों में नौकरीपेशा या व्यापार करने वाले दामाद की कल्पना नहीं है. तब हमारा समाज आज के मुकाबले भले ही अनपढ़ और पिछड़ा रहा हो, पर उस वक्त भी लोग समझते थे कि राजा तो अपने देश में ही पूजा जाता है, लेकिन विद्वान की पूजा सर्वत्र होती है (स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते). इस सिद्धांत की औपचारिक जानकारी उस समाज को भले न हो, लेकिन विद्या के महत्व से वह परिचित था.

यह पर्व मुख्य रूप से बिहार (झारखंड समेत) और पूर्वी उत्तर प्रदेश का है, जो जातीयता के लिए बदनाम है. छठ के गीतों में भी समाज की जातीय संरचना को दरकिनार नहीं किया गया है. इस तल्ख सच्चाई से आंखें नहीं मूंदी गई हैं, बल्कि सभी जातियों को उचित सम्मान देने की कोशिश की गई है. एक बहुचर्चित गीत है- छोटी-मुटी मालिन बिटिया के भुइयां लोटे हो केस, फूलवा ले अइह हो बिटिया अरघिया के बेर. इसी तरीके से ग्वालिन बिटिया का अर्घ्य के समय दूध के लिए भी जिक्र आता है. साथ ही, एक बार फिर इन गीतों में बेटियों का जिक्र आना यह रेखांकित करता है कि ऊपर के गानों में बेटियों की कामना महज संयोग नहीं है. यह अलग बात है कि पांच बेटों पर एक बेटी की कामना समाज में असमान होते लिंगानुपात को समान नहीं कर सकती, पर विचारणीय है कि उस समाज ने बेटी की कामना तो की है.

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First published: November 1, 2019, 5:44 PM IST
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