बचपन में यौन शोषण झेला था, अब महिलाओं के लिए प्रेरणा हैं डॉक्टर सुरभि सिंह

सुरभि कहती हैं कि ऐसा लगता है कि हम लड़कियों ने ही सारी दुनिया का बोझ हमारे सर पर बिठा रखा है.

एक वक्त था जब डॉ. सुरभि को अपने माता पिता और सगे संबंधियों के विरोध को झेलना पड़ा. यहां तक कि खुद पर भी शक हुआ कि उन्हें सामने आकर बात करनी चाहिए थी या नहीं.

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Women Empowerment: मेरठ की रहने वालीं और कुछ साल तक बतौर गाइनिकोलॉजिस्ट काम करती रहीं डॉक्टर सुरभि ने बचपन में जो झेला, वह चाहती हैं कि ऐसा किसी को न झेलना पड़े लेकिन यदि ऐसी घटना हो तो जब भी समझ विकसित हो और जब भी अवसर मिले, सामने आकर बोलना चाहिए. सुरभि सिंह आज अपने संगठन सच्ची सहेली (Sachchi Saheli) के जरिए महिलाओं के बीच यौन और मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य और जागरूकता के इर्द-गिर्द काम कर रही हैं.

अपने खून के रिश्ते साथ नहीं देते, लेकिन बोलना जरूरी...
एक वक्त था जब उन्हें अपने माता पिता और सगे संबंधियों के विरोध को झेलना पड़ा. यहां तक कि खुद पर भी शक हुआ कि उन्हें सामने आकर बात करनी चाहिए थी या नहीं. लेकिन वह कहती हैं कि सबसे पहले अपने भीतर के डर को जीतना होगा. सुरभि बताती हैं, वह करीब 9 साल की थीं जब एक रिश्तेदार ने उनके साथ वह हरकत की. कहती हैं, उस वक्त पता नहीं चलता कि हो क्या रहा है लेकिन गंदा सा लग रहा होता है और यह समझ आने में बहुत टाइम लगता है कि जो हुआ, वह हरासमेंट था या अब्यूज था. जब यह समझ आया कि क्या हुआ है तो लगा कि किसे क्या बताएं और बताने से क्या होगा.

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प्रिया रमानी के केस में कोर्ट की टिप्पणी ने दी और हिम्मत...
आप जानते ही हैं कि देश और विदेश में एक के बाद एक महिलाएं अपने साथ हुए शोषण के बारे में बोली थीं. ये सिलसिला आज भी जारी है. सुरभि भी उन्हीं महिलाओं में से एक रहीं जिन्होंने मी टू मूवमेंट (Metoo Movement) के दौरान हिम्मत साधी और खुद के साथ हुई तकलीफ को आवाज दी. वह कहती हैं कि इस बीच मैं मेंटल हेल्थ और हेल्थ अवेयरनेस पर काम भी कर रही थी और स्कूल में बच्चों से बात करती थी और समझाती थी. वहीं मैंने महसूस किया कि कुछ बच्चे गुड टच और बेड टच पर कुछ कहना चाहते हैं. तब एक दिन अचानक मैंने अपनी क्लास में बच्चों के सामने जब अपने साथ हुई घटना बताई तो एक के बाद एक कई बच्चों ने मुझे खुद के साथ हुई घटनाएं बताईं.



बाद में बहुत लोग साथ खड़े हुए और मेरी स्ट्रेंथ बने. वह कहती हैं, 'कभी कभी लगता था कि मैं गलत हूं क्या मैंने आवाज उठाकर गलती कर दी लेकिन प्रिया रमानी केस में कोर्ट ने जो कहा उसके बाद लगता है कि नहीं मैं गलत नहीं थी.' सुरभि का कहना है कि जरूरी है कि आप बोलो और आप बोलोगे तो ही लोग सुनेंगे. महिलाओं में हिम्मत आनी जरूरी है कि जब कुछ ऐसा हो तो बोला जा सकता है. इसलिए जब जो कुछ हो तब बोलना जरूरी है. ताकि लोगों में यह डर बने कि यह लड़की कहीं बोल न दे. लोगों में यह डर बनेगा तो इस तरह की घटनाओं में कमी आएगी.

बकौल सुरभि, अपने भीतर के डर को जीत लें...
वह बताती हैं कि मेरी फैमिली के लिए मेरा यह बोलना शॉकिंग था. खुद मां का कहना था कि मुझे बतातीं लेकिन मैंने पाया कि वह शख्स तो मेरे घर आता-जाता है ही जबकि मैंने मां को पहले ही उसके बारे में संकेत दिए थे. माता पिता की ओर से परिवार ने जैसे बॉयकॉट ही कर दिया. वे मेरे घर पूरी फौज लेकर आ गए और हल्ला बोल कर दिया लेकिन पति ने सपोर्ट किया और बच्चों ने मुझे समझा. सबको लग रहा था कि हरासमेंट करने वाले उस शख्स का परिवार है, बच्चे हैं और मैं उनकी लाइफ खराब कर रही हूं. मेरे माता पिता पर भी दबाव बनाया गया कि मैं माफी मांग लूं. इस पूरे वाकयात के दौरान मेरे पति पूरी तरह से साथ रहे.

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सुरभि कहती हैं कि ऐसा लगता है कि हम लड़कियों ने ही सारी दुनिया का बोझ हमारे सर पर बिठा रखा है. महिलाओं को पहले अंदर की लड़ाई से जीतना होगा कि मैं गलत नहीं हूं और जब यह आवाज रोकने लगे तो खुद को समझाना होगा. बाहर के लोगों से डर लगना अपने आप बंद हो जाएगा. सुरभि ने 2005 से 2013 तक डॉक्टर के तौर पर काम तो किया लेकिन 2013 के बाद से वह समाज सेवा से जुड़ गईं. पहले वीकेंड में गांव में काम करना शुरू किया, कैंम्प्स में काम करना शुरू किया, धीरे धीरे दिल्ली सरकार के साथ जुड़कर डेंगू मलेरिया को लेकर स्कूलों आदि में अवेयरनेस फैलाई. 2016 में अपने जैसी सोच के लोगों के साथ मिलकर सच्ची सहेली की स्थापना की.

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