घरों में बंद बच्चे हो रहे हैं डिप्रेशन के शिकार, डॉक्टर से जानें कैसे करें उनकी मदद

बच्चों की अनदेखी न करें. उनकी समस्याओं का सामधान ढूंढें. Image-shutterstock.com

Corona And Child Depression: कोरोना काल में जिधर देखो तनाव (Stress) देने वाली बातें हो रही हैं और इन सबका असर बच्चों पर बुरी तरह से पड़ रहा है. ऐसे में उनका बर्ताव (Behaviour) बदल रहा है. वहीं कई बच्चों में तो डिप्रशेन भी नजर आ रहा है.

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    Corona And Child Depression: पिछले काफी समय से कोरोना ने दुनियाभर को लोगों को परेशान कर रखा है. बुजुर्ग से लकेर छोटे बच्चे तक सभी इस मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. इन हालातों में लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. वर्क फ्राम होम (Work From Home) करने से लोगों में कई प्रकार की शारीरिक समस्याएं बढ़ गई हैं. लोग अपने बढ़ते वजन (Weight Gain) से परेशान हो रहे हैं. तो वहीं कई लोगों मांसपेशियों में परेशानी हो रही है. इसका प्रभाव मेंटल हेल्थ (Mental Health) पर भी पड़ रहा है. लंबे समय तक घर में बंद रहने के कारण लोग तनाव में आ जा रहे हैं. एक और बड़ी समस्या है जिस पर लोगों का ध्यान कम है, लेकिन ये बढ़ती ही जा रही है. ये समस्या है बच्चों में बढ़ता स्ट्रेस. दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार यह इस हद तक बढ़ गया है कि बच्चे आत्महत्या तक करने की सोच रहे हैं.

    इस बारे में कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट डॉ. प्रज्ञा रश्मि का कहना है कि कोरोना महामारी की वजह से स्कूल बंद हैं. बच्चो खेलकूद नहीं पा रहे. दोस्त-साथी के साथ घूमना-फिरना नहीं हो रहा. बच्चों की आउटिंग, शॉपिंग सब बंद है. जिधर देखो तनाव देने वाली बातें हो रही हैं और इन सबका असर बच्चों पर बुरी तरह से पड़ रहा है. ऐसे में उनका बर्ताव बदल रहा है. वहीं कई बच्चों में तो डिप्रशेन भी नजर आ रहा है. हालांकि डॉक्टर प्रज्ञा का ये मानना है कि लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम कर रहे पैरेंट्स को देखकर बच्चों में कुछ पॉजिटिव प्रभाव भी पड़ा है.

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    पैरेंट्स से सीख रहें हैं बच्चे
    डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि वर्क फ्रॉम होम कर रहे पैरेंट्स को देखकर बच्चे काफी कुछ सीख रहे हैं. भले ही वर्क फ्रॉम होम कर रहे पैरेंट्स बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पाते हैं, लेकिन उनके पास रहने से बच्चे सिक्योर फील करते हैं. बच्चे इस बात को समझने लगे हैं कि उनके पैरेंट्स ऑफिस में कैसे काम करते हैं. उन पर कितना वर्क प्रेशर होता है. बच्चे ये सीखते हैं कि कैसे एक जगह बैठकर धैर्य के साथ काम किया जा सकता है. साथ ही वह काम की जिम्मेदारी को भी समझ रह हैं.

    बच्चों को समझ में आता है वर्क प्रेशर
    एक केस का जिक्र करते हुए डॉक्टर ने बताया कि एक आठ साल का बच्चा अपनी चार्टर्ड अकाउंटेंट मां को काम करते हुए देखकर कहता है कि मेरी मां को दिन भर कितने सम्स करने पड़ते हैं. वहीं, एक बच्चा जब हर रोज ये नोटिस करता है कि खाना खाते वक्त भी उसके पैरेंट्स को लगातार कॉल या ईमेल का रिस्पॉन्स करना पड़ता है तो वह वर्क प्रेशर को समझने लगता है. कई बार बच्चे पैरेंट्स को काम करता हुआ देखकर अपने छोटे-छोटे काम खुद ही करने की कोशिश करने लगते हैं और जिम्मेदार बनने लगते हैं.

    डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि जब ज्यादा वर्क प्रेशर ज्यादा होता है तो पैरेंट्स खुद चिड़चिड़े हो जाते हैं. काम के चलते वह अपने स्ट्रेस से डील नहीं कर पाते हैं तब उनके बच्चे डिप्रेस होने लगते हैं. दरअसल पैरेंट्स जब काम के बीच में बार-बार बच्चों को कहते हैं कि अभी जाओ यहां से हम बिजी हैं, तो इससे बच्चों को ये लगने लगता है कि उन्हें इग्नोर किया जा रहा है. ज्यादातर बच्चों में इग्नोरेंस ही डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बन जाता है.

    बच्चों को खुलकर चिल्लाने दें
    डॉक्टर प्रज्ञा के अनुसार घरों में बंद बच्चों को पैरेंट्स कई बार डांटकर हल्ला करने के लिए मना करते हैं. ऐसे में बच्चों में वॉयस प्रेशर हाई रहता है. बच्चे खुलकर अपनी खुशी जाहिर नहीं कर पाते हैं. वह धीरे-धीरे इतना शांत हो जाते हैं कि गुमसुम रहने लगते हैं. इसलिए जब तक बच्चों को घर से बाहर निकलना शुरू नहीं हो जाता, उनकी फिजिकल एक्टिविटी पहले की तरह नहीं हो जाती, तब तक उनकी इन चीजों पर बार-बार रोक-टोक न करें. अच्छा होगा अगर आप भी उनकी खुशी में उनकी तरह की हल्ला करते हुए शामिल होंगे. यह खासतौर पर उन बच्चों के लिए जरूरी है जो इकलौते होते हैं, जिनका कोई भाई-बहन नहीं होता. ऐसे बच्चों के साथ पैरेंट्स का इन्वॉल्व रहना बहुत ही जरूरी हो जाता है क्योंकि ये बच्चे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं.

    कभी-कभी पैरेंट्स बच्चों को बाहरी दुनिया की अजीबोगरीब बातों से बचाने के चक्कर में उन्हें सही जानकारी से दूर कर देते हैं. पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चों को यह जानने की जरूरत नहीं है कि इस वक्त क्या चल रहा है लेकिन डॉ. प्रज्ञा के मुताबिक यह बिल्कुल गलत है. बच्चों को बताएं कि महामारी क्या है और इस समय उनका घर में रहना क्यों जरूरी है. अक्सर पैरेंट्स बच्चों को ये तो बताते हैं कि क्या नहीं करना है, लेकिन क्या करना है इस बारे में सही जानकारी नहीं दे पाते हैं. बच्चों के साथ खुलकर बात करें.

    टीनएजर्स में डिप्रेशन का खतरा ज्यादा
    कोरोना महामारी में सबसे ज्यादा टीनएजर्स इफेक्ट हुए हैं. बोर्ड एग्जाम का कैंसिल होना, स्कूल-कॉलेज का बंद होना, दोस्तों से न मिल पाना, करियर की चिंता इन सबकी वजह से उनमें डिप्रेशन और एंग्जाइटी की बढ़त देखी गई है. डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि टीनएजर्स में डिप्रेशन के सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं. से में जरूरी है कि पैरेंट्स बच्चों पर ध्यान दें और उनसे खुलकर बात करें.

    टीनएजर्स के साथ ऐसे करें व्यवहार
    डॉक्टर प्रज्ञा का कहना है कि टीनएजर्स को डिप्रेशन से बचाने के लिए जरूरी है कि पैरेंट्स उनसे खुलकर बात करें और उनकी समस्याओं का समाधान निकालें. बच्चों से उनकी पढ़ाई और उनके करियर के बारे में सही तरीके से बात करें, उन्हें अच्छे और पॉजिटिव ऑप्शन बताएं. उन्हें डराने की बजाय उनका हौसला बढ़ाएं.

    इकलौते बच्चे का ऐसे रखें ख्याल

    -इस समय बच्चों का दुखी होना सामान्य है लेकिन बच्चों को उनके एहसासों से बचाना पैरेंट्स का काम है. डॉ. प्रज्ञा के मुताबिक, आप बच्चों के बुरे एहसासों को मैनेज कर उनकी मदद कर सकते हैं. उन्हें किसी भी तरह से इंग्नोर न करें.

    -माता-पिता खुद को बच्चों का रक्षक समझते हैं, खासतौर पर जो बच्चे इकलौते होते हैं लेकिन यह तरीका बच्चों को और कमजोर बना देता है. बच्चों को अपने एहसासों को मानकर और निराशाओं से जीतकर जीवन जीना सिखाना चाहिए.

    बड़े भाई या बहन छोटे का ख्याल रखें
    डॉ. प्रज्ञा के अनुसार आज के इस समय में बच्चे अपने दोस्तों से दूर हो गए है. ऐसे में अगर घर पर उन्हें उनका दोस्त मिल जाए तो उनकी मेंटल हेल्थ अच्छी बनी रहेगी. बड़े भाई या बहन अगर छोटे भाई-बहन के साथ खेलेंगे या उनके दोस्त बनेंगे तो इससे उनके बीच की बॉन्डिंग मजबूत होगी. वह हमेशा एक दूसरे के बारे सोचेंगे और एक दूसरे का ख्याल रखेंगे.

    रोज करें फिजिकल एक्टिविटी
    कोरोना काल में बच्चों के लिए एक सही रूटीन बहुत जरूरी है. इससे बच्चों को अच्छा महसूस होता है. डॉ. प्रज्ञा के अनुसार, रूटीन बनाने से जीवन में निश्चितता आती है. इससे आगे के बारे में सोचने में भी मदद मिलती है. इसलिए रोज की आदतों में फिजिकल एक्टिविटी को जरूर शामिल करें. बच्चों को दिनभर किसी न किसी काम में व्यस्त रखें. दरअसल फिजिकल एक्टिविटी डिप्रेशन को खत्म करने और इससे बचने में मदद करती है. बच्चों के साथ थोड़ा घूमने बाहर जाएं.

    बच्चों को डिप्रेशन से ऐसे बचाएं
    -बच्चों को अपनी जिंदगी में जरूर शामिल करें. इनसे अपनी बातें करें.
    -पैरेंट्स भी बच्चों की जिंदगी में शामिल हों. बच्चों से खुलकर बात करें.
    -बच्चों को हर दिन फिजिकली एक्टिव रखें.
    -बच्चों की अनदेखी न करें. उनकी समस्याओं का सामधान ढूंढें.
    -बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी पर निगाह रखें.
    -बच्चों के कौन दोस्त हैं इस पर निगरानी रखें.
    -डिप्रेशन के लक्षण दिखने पर डॉक्टर से संपर्क करें.

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    बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण
    डॉक्टर प्रज्ञा के अनुसार जब बच्चे क्लीनिकली डिप्रेस्ड होते हैं, तो वह चीजों में दिलचस्पी खोने लगते हैं. किसी भी एक्टिविटी का मजा नहीं ले पाने पर आप यह भरोसे के साथ कह सकते हैं कि यह बच्चे के लिए अबनॉर्मल है. यह डिप्रेशन का सबसे आम लक्षण होता है. इसके अलावा दूसरे भी लक्षण होते हैं, जैसे बच्चा पहले से ज्यादा या कम खाने और सोने लगे. इसके साथ ही वह अधिक शांत या फिर चिड़चिड़े हो जाते हैं. अगर ऐसा दो हफ्तों से ज्यादा रहता है या रोज हो रहा है, तो यह चिंता की बात है. इस मामले में आप पीडियाट्रीशियन की सलाह ले सकते हैं. नजदीक के लोकल मेंटल हेल्थ क्लीनिक या हॉस्पिटल की मदद भी ले सकते हैं. मदद के लिए चाइल्ड लाइन 1022 पर भी कॉल कर सकते हैं.

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