लॉकडाउन के बाद देश में बढ़े डिप्रेशन और चिंता के मरीज, न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की ले रहे मदद

लॉकडाउन के बाद देश में बढ़े डिप्रेशन और चिंता के मरीज, न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की ले रहे मदद
देश में लॉकडाउन के बाद से चिंता और डिप्रेशन के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं.

देश में 24 मार्च से लॉकडाउन (Lockdown) लगा है. इस अवधि में डिप्रेशन (Depression) और चिंता (Anxiety) के शिकार मरीजों की संख्या 43 फीसद तक बढ़ गई है. इसके चलते रोगियों ने न्यूरोट्रॉपिक दवाओं (Neurotropic Drugs) का सेवन करना शुरू कर दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 1, 2020, 3:39 PM IST
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भारत में कोरोना संक्रमित (Corona infected) मरीजों का आंकड़ा 17 लाख को पार कर गया है. कोविड -19 के रिकार्ड मामले रोज सामने आ रहे हैं, जो देश के लिए चिंता का विषय है, लेकिन इससे भी बड़ी चिंता के विषय एक सर्वे (Survey)में आए आंकड़े हैं. स्मार्ट तकनीक से लैस रक्षात्मक स्वास्थ्य देखभाल मंच जीओक्यूआईआई के आंकड़े बताते हैं कि मार्च से लेकर अब तक लॉकडाउन के दौरान 43 फीसदी भारतीय चिंता (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) का शिकार हो चुके हैं. जीओक्यूआईआई ने यह 10 हजार भारतीयों पर एक सर्वेक्षण किया है, जिसमें इस बात का पता चला है.

महीने भर पहले इंडियन साइकेट्री सोसाइटी (Indian Psychiatry Society)के एक सर्वे में कहा गया था कि लॉकडाउन के कारण लोगों की जीवनशैली (Lifestle) में अचानक कई तरह के बदलाव आये हैं. जिसने देश के 130 करोड़ से ज्यादा लोगों के जीवन को प्रभावित किया है. लोगों की नौकरी चली गई है, खुद का व्यवसाय बंद हो चुका है. किसी के परिवार का सदस्य कोरोना से पीड़ित हो गया है, इस तरह का तमाम कारण हैं, जिसके चलते आज देश के 43 फीसदी लोग डिप्रेशन का शिकार हो चुके हैं. लॉकडाउन में सिर्फ बेरोजगार ही नहीं बढ़ें हैं, इस दौरान चिंता और डिप्रेशन के साथ ही मानसिक बीमारियां भी बढ़ी हैं. ऐसे में लॉकडाउन के बाद से मानसिक रोगों को दूर करने वाली न्यूरोट्रॉपिक और साइकोट्रॉपिक मेडिसिन्स की खपत भी बढ़ गई है. हालांकि यह खपत सैनेटाइजर और मास्क की तरह नहीं है.

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मानसिक संकट की ओर बढ़ रहा देश?
महीने भर पहले इंडियन साइकेट्री सोसाइटी (IPS) के द्वारा किये गये सर्वे में पता चला था कि लॉकडाउन के बाद से मानसिक बीमारी के मामले 20 प्रतिशत तक बढ़े हैं. देश में हर पांच में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से जूझ रहा है. आईपीएस ने चेतावनी दी थी कि लॉकडाउन जारी रहा तो देश में आर्थिक परेशानी और बढ़ सकती है.

डिप्रेशन के साथ बढ़ी न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की मांग
साल 2019 में 18 अक्टूबर को बीबीसी हिंदी की एक खबर के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के कहा था कि 18 फीसदी भारतीय डिप्रेशन यानी अवसाद के शिकार हैं. यह आंकड़ा लॉकडाउन में बढ़कर 43 फीसदी हो गया है. इसके अनुपात में न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की खपत भी बढ़ गई है.

इसके बारे में Hindi.news18.com ने मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल वैशाली की मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अंजलि नागपाल से बात की. डॉ. नागपाल ने बताया कि चिंता और डिप्रेशन दोनों ही अलग-अलग चीजें हैं. चिंता में घबराहट, बेचैनी और मन न लगना जैसी चीजें होती हैं. वहीं डिप्रेशन में उदासीपन और मन में नकारात्मक विचार आते हैं. उन्होंने कहा कि दोनों ही समस्याओं के तीन चरह होते हैं, जिनमें पहले चरण में लोग डॉक्टर के पास नहीं आते. जब समस्या बढ़ती है और दूसरे और तीसरे चरण में जाती है तो लोग डॉक्टर के पास आते हैं. डॉ नगपाल ने बताया कि हमारे पास जो मरीज आते हैं उनमें 60 फीसदी लोग चिंता का शिकार होते है. करीब 25-30 फीसदी लोग तनाव से पीड़ित होते है. बाकी कुछ लोगों ऐसे होते हैं, जिनको दोनों समस्या होती है. डॉ नागपाल कहती हैं कि मॉडरेट और सीवियर स्टेज के लोगों के उपचार के लिए हम न्यूरोटापिक मेडिसिन (चिंता और तनाव दर करने की) देते हैं.

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मरीज क्या समस्या बताते हैं
डॉ. नागपाल ने बताया कि मरीजों को ज्यादा चिंता, नींद न आना, दिमाग का शून्य होना, घबराहट, बेचैनी, याददाश्त में कमी और डिप्रेशन की समस्या होती है. उन्होने कहा कि पहले जो मामले आते थे उनको कोरोना का डर होता था, लेकिन अब जो मामले आ रहे हैं वो बेरोजगारी और आर्थिक संकट के कारण चिंता और डिप्रेशन में जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो लोगों के सामने आर्थिक संकट होगा तो ज्यादा लोग चिंता और डिप्रेशन कर शिकार हो सकते हैं. ऐसे में जाहिर सी बात है कि उनके उपचार के लिए न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन (चिंता और तनाव दूर करने की) दवा देनी होगी. इससे न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की मांग बढ़ सकती है. डॉ. नागपाल ने कहा कि न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की कीमतों में इजाफा नहीं हुआ है यह अच्छी बात है.

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वहीं मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल पटपड़गंज दिल्ली के मनोचिकित्सक डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि लॉकडाउन में अप्रैल से जून के बीच चिंता और डिप्रेशन के मामलों में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. उसके बाद जैसे-जैसे आर्थिक संकट और तमाम तरह की समस्याएं लोगों के साथ जुड़ेने लगीं तो यह आंकड़ा 40 फीसद से ऊपर जा पहुंचा है. डॉ. राजेश ने बताया कि चिंता और डिप्रेशन के तीन चरण होते हैं. इसमें माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर होता है. चिंता और तनाव के माइल्ड लेवल के रोगी डॉक्टर के पास नहीं आते घर पर ही योग, ध्यान या अन्य घरेलू तरीकों से ठीक हो जाते हैं, लेकिन मॉडरेट और सीवियर स्टेज के चिंता और डिप्रेशन के रोगी डॉक्टरों के पास इलाज के लिए आते हैं.

न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की 25 फीसद मांग बढ़ी
डॉ. राजेश कुमार ने कहा कि हमारे पास या किसी और डॉक्टर के पास जाने वाले सभी मरीजों को न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स नहीं दी जाती, लेकिन इनमें से 60 से 70 फीसदी मरीजों को न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन लेने की डॉक्टर सलाह देते हैं. इनमें से अधिकतर लोग इन दवाओं खाते भी हैं. उन्होंने कहा कि अगर देश में 43 फीसदी लोग चिंता और तनाव से परेशान तो इनमें से करीब 25 से 30 फीसदी लोग डॉक्टर के पास जाते हैं. जो लोग डॉक्टर के पास पहुंचते हैं उनमें से 70 फीसदी लोगों को न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स लेने की सलाह दी जाती है. इसमें से 90 फीसदी लोग इन दवाओं का सेवन करते हैं. डॉ. राकेश ने कहा कि मेरे पास देश का कोई आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि लॉकडाउन से पहले के मुकाबले आज 20 से 25 फीसदी ज्यादा न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की खपत बढ़ गई है. डॉक्टर राजेश ने कहा कि खुश होने की बात यह है कि अभी तक न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स की कीमतों में कोई वृद्धि नहीं हुई है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि न्यूरोट्रॉपिक मेडिसिन्स का देश में उत्पाद पर्याप्त हो रहा है. ऐसे में आगे भी कीमत बढ़ने की संभावना बहुत कम है.
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