vidhan sabha election 2017

VIDEO: महफ़िल-ए-मुशायरा- 'इश्क ने यूं दोनों को हम-आमेस किया, अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी न'

News18Hindi
Updated: December 7, 2017, 4:18 PM IST
VIDEO: महफ़िल-ए-मुशायरा- 'इश्क ने यूं दोनों को हम-आमेस किया, अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी न'
क्या क़यामत है, कोई चीज़ ठिकाने से है
News18Hindi
Updated: December 7, 2017, 4:18 PM IST
शेर-शायरी के प्रेमियों के लिए hindi.news18.com ने कॉलम शुरू किया है. इसमें आप हर रोज़ कविताएं, शायरी, गज़लें और नज़्म सुनने का लुत्फ़ उठाते हैं. आज की महफ़िल-ए-मुशायरा में सुनिए और पढ़िए अम्बरीन हसीब के क़लाम.

देखें वीडियो और पढ़ें, अम्बरीन हसीब के क़लाम

ये शोले आज़माना जानते हैं
सो हम दामन बचाना जानते हैं

ताल्लुक़ जो भी रखो सोच लेना
के हम रिश्ता निभाना जानते हैं

कहां वो सत किसी इमक़ान में है
जो अपने घर के दालान में है

बदल सकता है सब कुछ लेकिन
वो एक चेहरा जो मेरे ध्यान में है

उठाऊं बोझ क्यों मंज़िल तक इसका
ये दुनिया कब मेरे सामान में है

क्या क़यामत है, कोई चीज़ ठिकाने से है
ये शिकायत मुझे ख़ुद से है ज़माने से नहीं

काश ये बात कोई ख़िज़्र को समझा देता
मंज़िलें शौक से हैं, राह दिखाने से नहीं

ख़िलत-ए-ज़ुल्मत-ओ दस्तार-ए-रिया पहने हुए
आप जो भी हों मगर मेरे घराने से नहीं

ख़ुशी का लम्हा रेत था, सो हाथ से निकल गया
जो चौधवीं चांद था, अंधेरी शब में ढल गया

है वस्फ़ उसके पास ये, बदल सके हर ए शय
सो मुझको भी बदल दिया, और आप भी बदल गया

समझ लिया अहम नहीं, मैं उसके वास्ते मगर
नज़र फिर उससे मिल गई, ये दिल फिर बहल गया

मचल रहा था दिल बहुत, दिल की बात मान ली
समझ रहा है ना समझ, दांव उसका चल गया

अजीब मेरा अक्स था, उतर के उसकी आंख में
संवारा मुझको इस तरह, के आइना ही जल गया

मिला भी ज़ीस्त में क्या, रंज-ए-रहग़ुज़ार से कम
अपना शौक-ए-सफ़र भी नहीं, ग़ुबार से कम

तेरे फ़िराक़ में दिल का अजीब आलम है
न कुछ ख़ुमार से बढ़कर, न कुछ ख़ुमार से कम

अजीब रंगो से मुझको संवार देती है
वो निगाह-ए-सताइश नहीं सिंघार से कम

मेरी अना ही सदा दरमियां रही हायल
वगरना कुछ भी नहीं, मेरे इख़्तियार से कम

शब थी बे-ख़्वाब एक आरज़ू देर तक
शहर-ए-दिल में फिरी कु-ब-कु देर तक

दफ़अतन उठ गई हैं निगाहें मेरी
आज बैठे रहो रू-ब-रू देर तक

तुमने किस क़ैफ़ियत में मुख़ातिब किया
क़ैफ़ देता रहा तू लफ़्ज़ देर तक

क़दम जो भी उठाना चाहिए था
नया रस्ता बनाना चाहिए था

तमन्ना थी नई बातों की तुमको
मुझे लहज़ा पुराना चाहिए था

चलो मैं तो भुला बैठी हूं लेकिन
तुम्हे तो याद आना चाहिए था

ध्यान में आकर बैठ गए हो, तुम भी न
मुझे मुसलसल देख रहे हो, तुम भी न

दे जाते मुझको कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी न

हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझमें ऐसे आन बसे हो, तुम भी न

इश्क ने यूं दोनों को हम-आमेस किया
अब तो तुम भी कह देते हो, तुम भी न
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर