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Kabir Jayanti 2019: संत कबीर के इन दोहों में छिपा है जीवन का रहस्य, पढ़ें

News18Hindi
Updated: June 18, 2019, 8:49 AM IST
Kabir Jayanti 2019: संत कबीर के इन दोहों में छिपा है जीवन का रहस्य, पढ़ें
कबीर जयंती: संत कबीर के इन दोहों में छिपा है जीवन का रहस्य, पढ़ें

Kabir Jayanti 2019, कबीर जयंती २०१९: कबीर जयंती पर जानें संत कबीर के विचार जो बदल सकते हैं आपके जीवन की दिशा...

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Kabir Jayanti 2019, कबीर जयंती २०१९: संत कबीर दास की स्मृति में आज 17 जून सोमवार को कबीर जयंती मनाई जा रही है. संत कबीर 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे. वह निर्गुण विचारधारा को मानते थे. इसका मतलब है कि वो ईश्वर के निराकार स्वरुप की पूजा करते थे. वो हिंदू और इस्लाम दोनों के आलोचक थे. उन्होंने यज्ञोपवीत और ख़तना को बेमतलब क़रार दिया.कबीर के शिष्यों ने उनकी विचारधारा पर एक पंथ की शुरुआत की, जिसे कबीर पंथ कहा जाता है. कबीरदास ने स्वयं ग्रन्थ नहीं लिखे. वो केवल मुंह से बोलते थे. उनके भजनों और उपदेशों को शिष्यों ने लिपिबद्ध किया. ये रामनाम की महिमा गाते थे, एक ही ईश्वर (एकेश्वरवाद) को मानते थे. कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे. उनके कुछ दोहों में जीवन का रहस्य छिपा है. आइए पढ़ते है उनके कुछ मशहूर दोहे और सरल भाषा में उनका गूढ़ मतलब.

कबीर के दोहे:

दोहा 1: बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थात- संत कबीर दास जी कहते हैं कि जब मैं इस दुनिया में बुराई की खोज करने निकला तो सबसे बुरा मैंने खुद को ही पाया. जब मैंने अपनी अंतरात्मा में झांक कर देखा जो पाया कि सबसे अधिक दोष मुझ में ही है.



दोहा 2: पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थात- इस दोहे के माध्यम से संत कबीर कहते हैं इस दुनिया के लोग चाहे कितनी ही बड़ी और ज्ञान से भरी हुई पुस्तकें क्यों न पढ़ लें, लेकिन वो विद्वान् नहीं बन सकते. जब तक लोग प्रेम के ढाई अक्षर के गूढ़ मतलब और उसके मर्म को नहीं समझ लेते हैं. केवल वाही विद्वान् है जिसने प्रेम के मर्म को समझ लिया है.

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दोहा 3: जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थात- दोहे के जरिए कबीरदास जी कहते हैं किसी भी इंसान की जाति पर सवाल नहीं करने चाहिए. प्रयास करना चाहिए कि उसके पास जो ज्ञान है उसे हासिल किया जा सके. जिस प्रकार (युद्ध में) मूल्य केवल तलवार का होता है न कि उस म्यान का जिसमें वो रखी जाती है.

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दोहा 4: दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थात: कबीर दास जी का कहना है कि इंसान का स्वभाव है कि वह दूसरों की गलतियों और दोषों पर तो हंसता है, लेकिन तब वो अपने दोषों और गलतियों को पूरी तरह भूल जाता है या अनदेखा करता है जिसकी शुरुआत का भी पता नहीं चलता और न ही ये मालूम होता है कि आखिर उसके ये दोष कब खत्म होंगे.

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First published: June 18, 2019, 8:49 AM IST
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