Sawan 2019, Kawad Yatra 2019: केवल सावन में क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा, जानें इसका धार्मिक महत्व

Sawan 2019, Kawad Yatra 2019, श्रावण मास, सावन 2019: हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है.

News18Hindi
Updated: July 17, 2019, 11:59 AM IST
Sawan 2019, Kawad Yatra 2019: केवल सावन में क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा, जानें इसका धार्मिक महत्व
Sawan 2019, Kawad Yatra 2019: केवल सावन में क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा, जानें इसका धार्मिक महत्व
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Updated: July 17, 2019, 11:59 AM IST
Sawan 2019, Kawad Yatra 2019, श्रावण मास, सावन 2019: आज झमाझम बारिश के साथ सावन माह की शुरुआत हो चुकी है. हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में भगवान शिव की पूजा अर्चना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है. यह महीना भगवान शिव की भक्ति का माना जाता है. इस महीने में खास महादेव की पूजा कर उन्हें विभिन्न माध्यमों से प्रसन्न किया जाता है. इस महीने में भगवान शंकर के जलाभिषेक का विशेष महत्व है. माना जाता है जलाभिषेक से शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं. इसलिए कांवड़ यात्रा निकाली जाती है? जानिए जलाभिषेक का क्या महत्व है ?

कांवड़ यात्रा के बारे में किवंदतियों में मान्यता है कि भगवान परशुराम दिग्विजय (पृथ्वी जीत) के बाद जब मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ) से होकर निकले तो उन्होंने पुरा नामक स्थान पर विश्राम किया और वह स्थल उनको अत्यंत मनमोहक लगा. उन्होंने वहां पर शिव मंदिर बनवाने का संकल्प लिया. इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वह हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे.

उन्होंने गंगा की आराधना की और मंतव्य बताते हुए उनसे एक पत्थर प्रदान करने का अनुरोध किया. यह अनुरोध सुनकर पत्थर रोने लगे. वह देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे. तब भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि जो पत्थर वह ले जाएंगे, उसका चिरकाल तक गंगा जल से अभिषेक किया जाएगा. हरिद्वार के गंगातट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया.

मान्यता है कि जब से भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से कावड़ यात्रा की शुरूआत हुई. लंबी कावड़ यात्रा से मन में संकल्प शक्ति और आत्मविश्वास भी बढ़ता है. सावन में श्रद्धालु कांवड़ में पवित्र जल लेकर एक स्थान से लेकर दूसरे स्थान जाकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं.



कांवड़ का मूल शब्द 'कावर' है. इसका अर्थ कंधे से है. कांवड़ का एक और अर्थ परात्पर शिव के साथ विहार भी है. अर्थात ब्रह्म यानी परात्पर शिव, जो उनमें रमन करे वह कांवरिया. शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए ईष्ट शिवलिंगों तक पहुंचते हैं. कांवड़ यात्रा के पीछे तथ्य यह भी है कि गंगा भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हैं. इसलिए भगवान शंकर को गंगा अत्यंत प्रिय हैं. गंगाजल के अभिषेक से वह अत्यंत प्रसन्न होते हैं. श्रावण मास भगवान शिव की साधना का सर्वश्रेष्ठ समय है, इसीलिए श्रद्धालु श्रावण मास में शिवभक्ति में लीन रहते हैं. कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है. कंधे पर गंगा को धारण किए श्रद्धालु इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं.

कांवड़ यात्रियों के लिए बताए गए नियम-
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कांवड़ यात्रियों के लिए नशा वर्जित बताया गया है. इस दौरान तामसी भोजन यानी मांस, मदिरा आदि का सेवन भी नहीं किया जाता.

बिना स्नान किए कावड़ यात्री कांवड़ को नहीं छूते. तेल, साबुन, कंघी करने व अन्य श्रृंगार सामग्री का उपयोग भी कावड़ यात्रा के दौरान नहीं किया जाता.

कांवड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना मना है. चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कावड़ रखने की भी मनाही है.

कांवड़ यात्रा में बोल बम एवं जय शिव-शंकर घोष का उच्चारण करना तथा कावड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहां कावड़ रखी हो उसके आगे बगैर कावड़ के नहीं जाने के नियम पालनीय होती हैं.

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.

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First published: July 17, 2019, 11:38 AM IST
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