OPINION: कौन है वो समाज? जिस से सब डरते हैं

हमें किसी हाल में चैन नहीं है. हमें हमेशा अपने आधिपत्य, अपनी हुकूमत की चिंता रहती है. और ये मिज़ाज शोषित समाज में सबसे ज़्यादा पाया जाता है. क्योंकि यही वो तरीके होते हैं जिनसे वो ख़ुद को संतुष्ट कर लेते हैं. जिसके ज़रिए वो अपने ‘राजा’ ना हो पाने की पीड़ा को दरकिनार कर लेते हैं.

Mahwish Razvi | News18India
Updated: July 15, 2019, 2:07 PM IST
OPINION: कौन है वो समाज? जिस से सब डरते हैं
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Mahwish Razvi | News18India
Updated: July 15, 2019, 2:07 PM IST
हम सबने एक कहानी सुनी है. दो बाप बेटे एक गधे को साथ लेकर चल रहे थे, मगर जब बाप गधे पर बैठता तो समाज बाप को कोसता, जब बेटा गधे पर बैठे तो बेटे को बाप के बुढ़ापे की दुहाई दे. और फ़िर जब दोनों लोग गधे पर बैठ जाते तो कमज़ोर गधे की काया का हवाला देकर दोनों को ज़ालिम करार दे.

ये छोटी सी कहानी ही हमारा समाज है. हमें किसी हाल में चैन नहीं है. हमें हमेशा अपने आधिपत्य, अपनी हुकूमत की चिंता रहती है. और ये मिज़ाज शोषित समाज में सबसे ज़्यादा पाया जाता है. क्योंकि यही वो तरीके होते हैं जिनसे वो ख़ुद को संतुष्ट कर लेते हैं. जिसके ज़रिए वो अपने ‘राजा’ ना हो पाने की पीड़ा को दरकिनार कर लेते हैं.



हंगामा है क्यूंं बरपा, शादी ही तो की है

पिछले दिनों दो अलग-अलग समुदाय की लड़कियों ने शादी की. पहली शादी में लड़की ने अपने पिता की रज़ामंदी के साथ एक हिंदु युवक से विवाह किया. उसके पापा ना सिर्फ उसके साथ दिखे बल्कि बहुत ज़्यादा ख़ुश और सुकून में दिखे. उन्होंने अपनी बेटी की शादी को लेकर किसी को कोई बयान नहीं दिया. ना उन्होंने ये बताया कि मैं सहमत नहीं था पहले, ना उन्होंने ये सूचना दी कि मैं ख़ुश हूंं तो क्यों हूं. क्यों मैं अपनी बेटी के साथ खड़ा हूं और उसका साथ देने के मोह से बंधा हुआ हूं. लेकिन हमने उस कहानी में अपनी कुंठा निकाली. “बड़ी हीरोइन है, इनका क्या धर्म ईमान. अरे सिंदूर लगा लिया पर रहेगी तो मुसलमान. भाई तुम किसकी बातों में आ रहे हो उसने शादी भले हिंदु रीति रिवाज से की हो लेकिन सुना नहीं, वो साफ-साफ कह रही है कि मुसलमान पैदा हुई थी, वैसे ही मरेगी. बताओ तो जनप्रतिनिधि होकर उसने ऐसा फैसला किया और एक बार नहीं सोचा, थू है ऐसी लड़की पर.”

पिताके साथ नुसरत


वहीं दूसरी कहानी में एक दूसरी लड़की ने शादी की. पिता बाहुबली हैं, सत्ता में अच्छी पहुंच रखते हैं. अपने पिता को करीब से जानने वाली लड़की ने एहतियात के तौर पर वीडियो बनाई और अपनी सुरक्षा की मांंग की. इस बार पिता सामने आए और उन्होंने बेटी के बालिग़ होने की जानकारी दी. उन्होंने साफ कहा कि “ना मैं नाराज़ हूं ना ख़ुश हूं. वो जहां रहें ख़ुश रहें. मुझे अपने काम से ही फुरसत नहीं जो मैं उनपर ध्यान दूं”.

अपुन को हर कहानी में मसाला मांगता
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लेकिन वो समाज ही कैसा जो इतने भर से संतुष्ट हो जाए. एक बड़ी भीड़ सामने आई जो लड़की की दिलेरी पर वाह-वाही करने लगी. मसाला खत्म हो रहा था, तो धीरे-धीरे नई भीड़ सामने आने लगी जो बाप को "पीड़ित" सिद्ध करने में लग गई. बाप ने हिसाब नहीं मांगा लेकिन समाज को हिसाब चाहिए था. तुम्हें इतने प्यार से पाल पोसकर बड़ा किया. तुम्हें पढ़ाया लिखाया शादी के क़ाबिल बनाया. इशारा उस लड़की की तरफ था लेकिन सवाल अपने बच्चों से था. बताओ हमारे इतने इन्वेस्टमेंट का तुम ऐसे जवाब दोगे? इन्होंने तो कर लिया है, तुम सोच भी ना लेना. हम पहले ही तुम्हें अपनी मानसिकता से सावधान किए देते हैं.

शॉर्ट में कहें तो हमने एक बार फिर अपनी वो कुंठित मानसिकता प्रदर्शित करनी शुरू की जहां मां-बाप सिर्फ अभिभावक नहीं रहते बल्कि देव तुल्य हो जाते हैं. जिसके बाद उनसे किसी भी ग़लती, भूल-चूक की उम्मीद ख़त्म हो जाती है. मां-बाप बनने के बाद वो इंसान रह ही नहीं जाते, सीधे प्रमोट होकर देवस्थान पर पहुंच जाते हैं. वैसे भी इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से कि देवों ने कभी कोई गलती की ही नहीं.

साक्षी मिश्रा


जो उसकी भली परवरिश का ब्यौरा दे रहे हैं उन्होंने उसे अपनी आंखों के सामने पलते देखा है. जो उसके फैसले के खिलाफ हो रहे हैं वो जानते हैं कि किन परिस्थितियों से निकलकर उसने ये काम किया. जो लोग उसके प्यार में समर्थन में आ रहे हैं वो सब उसके विवाह के साक्षी बने थे और दोनों को सुखी जीवन का आशीर्वाद देकर अभी लौटे हैं.

वो टीवी पर इसलिए बात कर रही है क्यूंकि आप बैठे हैं चटखारे लेकर सुनने के लिए, उसे कोसने के लिए, सराहने के लिए, डराने के लिए और तमाशा देखकर ताली बजाने के लिए.

हम शासन के भूखे लोग

हमारी परेशानी है कि हमें हुकूमत के लिए, दबाने के लिए, किसी ना कसी की ज़रुरत रहती ही है. सुन्नी समुदाय, शिया, देवबंद, वहाबी, अहमदी आदि को दबाएंगे और उनसे उनके ईमान का हिसाब मांगेंगे. सवर्ण समाज, दलितों पर अपना आधिपत्य दिखाने की कोशिश करता है. बाकी राजपूत, क्षत्रिय, पिछड़ी जातियां सब एक दूसरे का हिसाब लगाकर खुद को ऊंचा साबित करने में लगी रहती हैं. ये सब लोग कभी वो पर्चा नहीं दिखा पाते जिसके मुताबिक इन्हें दूसरों को सर्टिफिकेट बांटने की छूट दे दी गई है.

पति अपनी पत्नी को दबाकर रखता है. सास को बहू पर हुकूमत चलानी है. मां-बाप को बच्चों को दबाना है ताकि अपने पद की प्रतिष्ठा का दम्भ स्थापित कर सकें. कई बार ऐसा होता है कि मां-बाप बच्चों को सही वजह बताकर किसी काम को करने से रोक सकते हैं, लेकिन वो ऐसा नहीं करते. क्‍यूंकि ऐसा करने पर उनका वो अनकहा दैवीय रूप कैसे स्थापित होगा. भगवान जब अपने बन्दों के साथ भला-बुरा करते हैं तो वजह थोड़ी देते हैं.

हम किसी और की नहीं, अपनी बुराई से डरे हुए हैं

आपको पता है ये जितने लोग उस दूसरी लड़की को भला बुरा कह रहे हैं. वो इस बात से डर रहे हैं कि कहीं अगला नंबर हमारा तो नहीं. कहीं हमारे घर की स्त्रियां भी इस आधिपत्य के खिलाफ आवाज़ ना उठा दें. हम उस अनजान डर से इसलिए डरे हुए हैं क्यूंकि हम जानते हैं कि कहीं ना कहीं हम भी उस जैसी ही मानसिकता से ग्रसित हैं. हम भी दूसरी की बहन बेटियों के किस्से चटकारे लेकर सुनाते हैं तो कोई हमारी कहानियां भी इस ही तरह सुनाएगा. हमें डर है कि जो गिलाज़त हम बो रहे हैं वही काटने का नंबर आएगा. किसी दूसरे की बेटी जीन्स पहनती है तो हम भी भद्दे कॉमेंट्स देकर उसे छेड़ते हैं. “ओह अच्छा… तो उन्होंने लव मैरिज कर ली. बताओ बेटी को इतना पढ़ाया लिखाया था तो ये तो करना ही था. अरे वो तो मां बाप ने लोक लाज के लिए रजामंदी दे दी, वो खुश थोड़ी हैं.

नव विवाहित


अरे उनके बेटे ने तो पसंद से शादी की है, ऐसा भी क्या मॉडर्न होना, हमारे बच्चे ऐसा करें तो हम तो मुंह ना देखें.” समाज ये सब बातें कहते वक्त अपनी ख्वाहिशें बता रहा होता है, कि देखो तुम्हें ऐसा करना चाहिए था. क्यूंकि अगर तुमने अपने बच्चों की नजीर पेश नहीं की तो हमारे बच्चे भी बिना शर्त खुश रहने का अधिकार मांग लेंगे.

ले डूबेगा ये सेलेक्टिव एप्रोच

हमारी सबसे बड़ी परेशानी यही है कि हम सेलेक्टिव रहना चाहते हैं, फिर चाहे वो कोई भी मामला हो. हम धर्म की जो बातें नहीं मान पाते उन्हें दकियानूसी बता देते हैं. हम बच्चों के जिन सवालों के जवाब नहीं दे पाते उन्हें फ़िज़ूल बता देते हैं. हम जब किसी चीज़ को हासिल नहीं कर पाते तो उसे अनमोल करार देते हैं. यही वजह कि हमें क्रान्ति, कहानियों, फिल्मों और दूसरों के घरों में तो अच्छी लगती है लेकिन अपने निजी जीवन से हम उसे दूर ही रखना चाहते हैं. आज ये जितने लोग एक लड़की की लव मैरिज पर सोशल मीडिया को ज्ञान से भर दे रहे हैं. वो तब कहां थे जब उस वीडियो के वायरल होने वाले दिन ही गुजरात में सरकारी काउंसलर की मौजूदगी में एक लड़के को मार दिया जाता है. जब महीने भर में दसियों हत्याएं सिर्फ मर्जी से शादी करने की वजह से हो जाती हैं. वो जोड़े तो नहीं आए ना, मीडिया के सामने. उन्होंने नहीं मांगी सुरक्षा, बचा कर संभाल कर रखी अपने मां-बाप की इज्ज़त. उनके लिए आपने क्या कर दिया? सैकड़ों गर्भवती लड़कियां कोर्ट के चक्कर काट रही हैं न्याय के लिए, आपमें से कितने लोग एक बार भी उनके साथ कोर्ट तक पहुंचे? ये जितने लोग इन्तु, किन्तु, परन्तु के साथ उस लड़की का समर्थक होने का दावा कर रहे हैं ये सब असंतुष्ट लोग हैं. ये कोई ना कोई वजह ढूंढ ही लेंगे असंतुष्ट होने की.

हम सोचना ही नहीं चाहते कि कितने संकीर्ण हैं हम जो इज्ज़त का सारा दारोमदार हमने स्त्री के शरीर के सबसे पवित्र अंग (योनी) को दे रखा है. हम उसका सौदा करने को तैयार बैठे हैं. जहां हमारा मन होगा, वही इसका मालिक बनेगा. तुम अपनी मर्जी का मालिक चुनना चाहोगी तो हर तरह से बेईज्ज़त करेंगे तुम्हें.

सवाल


ये समाज चुप क्यों रहता है?

इस समाज का गुस्सा उस लड़की को लेकर क्‍यूं नहीं निकला जिसे सरेआम नंगा करके पीटा गया. जब एक 6 महीने की बच्ची का बलात्कार सिर्फ इसलिए कर दिया गया, क्यूंकि उसके पास एक संभावित योनी थी. वो लड़की जिसे वैलेंटाइन के दिन प्रेमी से मिलने पर बालात्कार का शिकार होना पड़ा. वो लड़की जिसे दहेज़ के लिए सांतवीं मंजिल से फ़ेंक दिया गया. वो लड़की जिसे दलित होने के कारण आत्महत्या को मजबूर किया गया. ये लोग उस बाप का विरोध क्यूं ना कर सके जिसने अपनी ही बेटी को अपनी पत्नी बना लिया. ये गुस्सा तब कहां गया जब भाई ही अपनी बहन का बालात्कारी निकला. मैं बताती हूं क्यों. क्यूंकि हम सब किसी ना किसी रूप में उन सबसे जुड़े हुए हैं. क्यूंकि हम सबमें संभावित हत्यारे हैं जो अपनी मानसिकता को चुप रहकर दबाने की कोशिश करते हैं.

ये समाज से हम इतना डरते इसलिए हैं क्यूंकि हम ही समाज हैं. हम सिर्फ शोषित नहीं हैं, शोषण करने वाले भी हम हैं. फिर खुद को सुधारना मुश्किल होता है और दूसरों को दुत्कारना बहुत आसान.

पाकिस्तान के एक बहुत बड़े शायर हैं अहमद फरहाद, उन्होंने लिखा था,

काफ़िर हों सर फिरा हूँ मुझे मार दीजिये,

मैं सोचने लगा हूँ मुझे मार दीजिये.

मैं पूछने लगा हूँ सबब अपने क़त्ल का,

मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे मर दीजिये.

(इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं, इससे न्‍यूज18 का कोई संबंध नहीं है और ना ही संस्‍थान किसी तथ्‍य की पुष्टि करता है)

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