'तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था', पढ़ें 'दाग़' देहलवी का दिलकश कलाम

'तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था', पढ़ें 'दाग़' देहलवी का दिलकश कलाम
'दाग़' देहलवी का जुदा अंदाज़...

दाग़ (Daagh Dehlvi) की शायरी में एक नयापन था. उनके इसी अलग अंदाज़ ने उन्‍हें अलग बनाया. यहां तक कि उन्‍हें 'ग़ालिब' (Ghalib) जैसे बड़े शायरों की सराहना भी मिली...

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नवाब मिर्ज़ा ख़ान 'दाग़' (Nawab Mirza Khan 'Dagh') उर्दू के महान शायर रहे हैं. उन्होंने उर्दू ग़ज़ल (Ghazal) को उसकी परंपरावादी छवि से निकाल कर उसमें मुहब्बत (Love) के वे नए रंग भरे, जो उस वक्‍़त उर्दू ग़ज़ल के लिए नए थे. उन्‍होंने उर्दू ग़ज़ल को फ़ारसी के कठिन अल्‍फ़ाज़ से निकाल कर उसे सहल शब्‍दों में पिरोया और यही वजह है कि उनका कलाम बेहद पसंद किया गया. 'दाग़' का असल नाम नवाब मिर्ज़ा ख़ान था. हालांकि वह अपना तख़ल्‍लुस 'दाग़' (Dagh ) रखते थे और उर्दू शायरी की दुनिया में वह 'दाग़' देहलवी के नाम से जाने गए. वह 1831 में दिल्ली (Delhi) में पैदा हुए. उन्‍हें शायरी (Shayari) का शौक़ पैदा हुआ और उन्‍होंने 'ज़ौक़' (Zauq) की शागिर्दी इख़्तियार करली. दाग़ की शायरी में एक नयापन था. उनके इसी अलग अंदाज़ ने उन्‍हें अलग बनाया. यहां तक कि उन्‍हें 'ग़ालिब' (Ghalib) जैसे बड़े शायरों की सराहना भी मिली. आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं 'दाग़' देहलवी का इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...

 

'दाग़' बेवफ़ा निकला...
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था



वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं

ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा

मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

न पूछ-गछ थी किसी की वहां न आव-भगत

तुम्हारी बज़्म में कल एहतिमाम किस का था

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़

कहो वो तज़्किरा-ए-ना-तमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं

सुना जो तू ने ब-दिल वो पयाम किस का था

उठाई क्‍यों न क़यामत अदू के कूचे में

लिहाज़ आप को वक़्त-ए-ख़िराम किस का था

गुज़र गया वो ज़माना कहूं तो किस से कहूं

ख़याल दिल को मेरे सुब्ह ओ शाम किस का था

हमें तो हज़रत-ए-वाइज़ की ज़िद ने पिलवाई

यहां इरादा-ए-शर्ब-ए-मुदाम किस का था

अगरचे देखने वाले तेरे हज़ारों थे

तबाह-हाल बहुत ज़ेर-ए-बाम किस का था

वो कौन था कि तुम्हें जिस ने बेवफ़ा जाना

ख़याल-ए-ख़ाम ये सौदा-ए-ख़ाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर

जो लुत्फ़ आम वो करते ये नाम किस का था

हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकला

ये पूछे उन से कोई वो ग़ुलाम किस का था
शुमार कौन करे...
आप का एतबार कौन करे

रोज़ का इंतज़ार कौन करे

ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते

पर तुम्हें शर्मसार कौन करे

हो जो उस चश्म-ए-मस्त से बे-ख़ुद

फिर उसे होशियार कौन करे

तुम तो हो जान इक ज़माने की

जान तुम पर निसार कौन करे

आफ़त-ए-रोज़गार जब तुम हो

शिकवा-ए-रोज़गार कौन करे

अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद

दाना दाना शुमार कौन करे

हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊं

मौत का इंतज़ार कौन करे

आंख है तर्क-ए-ज़ुल्फ़ है सय्याद

देखें दिल का शिकार कौन करे

वादा करते नहीं ये कहते हैं

तुझ को उम्मीद-वार कौन करे

'दाग़' की शक्ल देख कर बोले

ऐसी सूरत को प्यार कौन करे

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क़यामत का इंतज़ार किया...
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एबार किया

तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया

किसी तरह जो न उस बुत ने एतबार किया

मेरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया

हंसा हंसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया

तसल्लियां मुझे दे दे के बे-क़रार किया

ये किस ने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया

कि दिल से शोर उठा हाए बे-क़रार किया

सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया

अगर ये सच है तो बे-शुबह हम पे वार किया

न आए राह पे वो इज्ज़ बे-शुमार किया

शब-ए-विसाल भी मैं ने तो इंतज़ार किया

तुझे तो वादा-ए-दीदार हम से करना था

ये क्या किया कि जहां को उमीद-वार किया

ये दिल को ताब कहां है कि हो मआल-अंदेश

उन्हों ने वादा किया इस ने एतबार किया

कहां का सब्र कि दम पर है बन गई ज़ालिम

ब तंग आए तो हाल-ए-दिल आश्कार किया

तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादां कि ग़ैर कहते हैं

आखिर कुछ न बनी सब्र इख़्तियार किया

मिले जो यार की शोख़ी से उस की बेचैनी

तमाम रात दिल-ए-मुज़्तरिब को प्यार किया

भुला भुला के जताया है उन को राज़-ए-निहां

छुपा छुपा के मुहब्बत को आश्कार किया

न उस के दिल से मिटाया कि साफ़ हो जाता

सबा ने ख़ाक परेशां मेरा ग़ुबार किया

हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता

मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होश्यार किया

हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्र

शब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया

रक़ीब ओ शेवा-ए-उल्फ़त ख़ुदा की क़ुदरत है

वो और इश्क़ भला तुम ने एतबार किया

ज़बान-ए-ख़ार से निकली सदा-ए-बिस्मिल्लाह

जुनूं को जब सर-ए-शोरीदा पर सवार किया

तेरी निगाह के तसव्वुर में हम ने ऐ क़ातिल

लगा लगा के गले से छुरी को प्यार किया

ग़ज़ब थी कसरत-ए-महफ़िल कि मैं ने धोके में

हज़ार बार रक़ीबों को हम-कनार किया

हुआ है कोई मगर उस का चाहने वाला

कि आसमां ने तेरा शेवा इख़्तियार किया

न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर ये कहते हैं

वो बे-क़रार रहे जिस ने बे-क़रार किया

जब उन को तर्ज़-ए-सितम आ गए तो होश आया

बुरा हो दिल का बुरे वक़्त होश्यार किया

फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को इक कहानी थी

कुछ ए'तिबार किया कुछ न एतबार किया

असीरी दिल-ए-आशुफ़्ता रंग ला के रही

तमाम तुर्रा-ए-तर्रार तार तार किया

कुछ आ गई दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे

कुछ आप ने मेरे कहने का एतबार किया

किसी के इश्क़-ए-निहां में ये बद-गुमानी थी

कि डरते डरते ख़ुदा पर भी आश्कार किया

फ़लक से तौर क़यामत के बन न पड़ते थे

आखिर अब तुझे आशोब-ए-रोज़गार किया

वो बात कर जो कभी आसमां से हो न सके

सितम किया तो बड़ा तू ने इफ़्तिख़ार किया

बनेगा मेहर-ए-क़यामत भी एक ख़ाल-ए-सियाह

जो चेहरा 'दाग़'-ए-सियह-रू ने आश्कार किया
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