लाइव टीवी

पुण्यतिथि विशेषः हिंदी कथाओं, ग़ज़ल को नया आयाम देने वाले 'कमलेश्वर'

News18Hindi
Updated: January 27, 2020, 11:23 AM IST
पुण्यतिथि विशेषः हिंदी कथाओं, ग़ज़ल को नया आयाम देने वाले 'कमलेश्वर'
अगर कमलेश्वर नहीं होते तो शायद हिंदी अपने इस नायाब गजलों से मिल नहीं पाती. तो

कमलेश्वर ने जब कहानियां लिखनी शुरू कीं तो उनके पास बिल्कुल एक नई भाषा थी. संवेदनाओं से लबरेज. पहले के कथ्य से बिल्कुल अलग हटकर एक नया कथ्य. शैली भी बिल्कुल अलग. उपन्यास रचे तो उन्होंने मील के पत्थर गाड़े.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2020, 11:23 AM IST
  • Share this:
हिंदी में ग़ज़ल की परंपरा पर कोई भी बात दुष्यंत कुमार की चर्चा के बिना अधूरी है. दरअसल, हिंदी में दुष्यंत कुमार पहले शायर हैं जिन्होंने बताया कि ग़ज़ल का मतलब सुर, सुरा और सुंदरी ही नहीं है या सिर्फ उर्दू ही नहीं है, बल्कि ग़ज़ल हिंदी में भी लिखी जा सकती है. उन्होंने यह भी दिखाया कि हिंदी में गजलें जितनी रुमानी और कातिल हो सकती हैं उतनी ही पॉलिटिकल और मारक भी. उन्होंने अपने ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ की भूमिका लिखते हुए स्वीकार किया है-

…और कमलेश्वर! वह इस अफसाने में न होता तो यह सिलसिला यहां तक न आ पाता. मैं तो- हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था, कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए.

दुष्यंत कुमार की इस स्वीकारोक्ति के बाद कहना पड़ता है कि अगर कमलेश्वर नहीं होते तो शायद हिंदी अपने इस नायाब ग़ज़लगो से मिल नहीं पाती. तो इस अर्थ में कमलेश्वर निश्चित रूप से हिंदी ग़ज़ल को अप्रत्यक्ष रूप में दिशा देने वाले रचनाकार रहे हैं. कमलेश्वर के बारे में ऐसी कई स्वीकारोक्तियां आपको मिल जाएंगी. उनके आसपास के लोग उन्हें ‘लार्जर दैन लाइफ’ वाले अंदाज में याद करते मिल जाएंगे.

कहानियों को दी नई भाषा

कमलेश्वर ने जब कहानियां लिखनी शुरू कीं तो उनके पास बिल्कुल एक नई भाषा थी. संवेदनाओं से लबरेज. पहले के कथ्य से बिल्कुल अलग हटकर एक नया कथ्य. शैली भी बिल्कुल अलग. उपन्यास रचे तो उन्होंने मील के पत्थर गाड़े. पत्रकारिता में आए तो संपादन की नई शैली विकसित की. पत्रकारिता के प्रतिमान गढ़े. अनुवाद किया तो पाठकों को अनूदित सामग्री अपने आसपास की लगी. लगा ही नहीं कि किसी दूसरी भाषा से कोई सामग्री ली गई हो. फिल्म के लिए उन्होंने जब पटकथा और संवाद लेखन करना शुरू किया तो कमलेश्वर के व्यक्तित्व का एक नया आयाम सामने आया. वैसे, अलग-अलग विधाओं में लिखते हुए भी जो एक बात उनकी सिग्नेचर टोन की तरह कॉमन दिखती है, वह है सामाजिक विषमताओं के प्रति उनका विद्रोह.

उनकी कहानी ‘आधी दुनिया’ की मार्था में बहुत से रेशे आपको ऐसे मिल जाएंगे जो आपको अपने कश्मकश से बांधे रखेंगे. ‘एक अश्लील कहानी’ की शांत नायिका कहानी के अंत में अपने कपड़े उतार फेंकती है, पर इस विद्रोह में भी उसमें स्त्रीबोध का दंश दिखता रहा. यह दंश आपको देर तक मथता रहता है. ‘दिल्ली में एक मौत’ संवेदनशून्य होते जा रहे मध्यवर्गीय समाज की कसैली कहानी है. नौकरी का दबाव और श्मशान की औपचारिकता बेहद सहज और सधे अंदाज में अपने साथ आपको लिए चलते हैं. आप महसूस करेंगे की यह दिल्ली में महज एक इनसान की मौत की कहानी नहीं, बल्कि अपने भीतर लगातार मर रही संवेदना की भी कहानी है. इसी तरह ‘राजा निरबंसिया’, ‘पत्थर की आंखें’, ‘नीली झील’, ‘मांस का दरिया’, ‘भूख’... दर्जनों कहानियां याद की जा सकती हैं. इनमें अधिकतर कहानियां ऐसी हैं जो स्त्री जीवन की बारीक पड़ताल करती हैं, उनकी तकलीफें बयां करती हैं.

 इसे भी पढ़ें : OPINION: अनपढ़ों का अपराध नहीं, शातिर पंचों की कारस्तानी

 

यहां यह चर्चा जरूरी है कि नई कहानी आंदोलन जिस त्रयी की उपज थी, उसमें राजेंद्र यादव और मोहन राकेश के साथ तीसरी कड़ी कमलेश्वर ही थे. बल्कि निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि अपनी शैली, अपने प्रवाह और अपनी सहजता के कारण इस त्रयी में भी कमलेश्वर बिल्कुल अलग खड़े दिखते हैं. मोहन राकेश और कमलेश्वर ने एक-दूसरे के साथ लंबा वक्त गुजारा है. कहते हैं कि इन दोनों की यारी 24x7 वाली थी. अपनी यारी के संदर्भ में कमलेश्वर ने एक इंटरव्यू में बहुत ही रोचक तरीके से कहा था ‘नौ सालों तक मैं और राकेश एक ही घर में ऊपर नीचे रहे. वो जमाना था कि जो लोग विभाजन के बाद यहां आए थे, उनको लोग अपना घर किराए पर नहीं देते थे. तब मैंने राकेश की मां को अपनी मां बनाया और मेरे नाम पर मकान लिया गया और राकेश मेरे साथ रहने लगे. क्योंकि हम लोग दिन भर मस्ती में बातें करने, गप्पें लड़ाने और नई कहानी की बातें सोचने में लगे रहते थे, जब भी कोई आता था तो हमें काफ़ी हाउस या टी हाउस में पाता था. एक दिन किसी ने पूछ लिया राकेश भाई आपकी दिनचर्या क्या होती है? राकेश ने कहा हम यही कोई साढ़े ग्यारह-बारह बजे घर पहुंचते हैं, एक-दो घंटे पढ़ कर सो जाते हैं. उन्होंने कहा फिर? फिर हम उठते हैं ग्यारह बजे दिन में. फिर? फिर सुबह की चाय पीते-पीते बारह-एक बज जाते हैं. उन्होंने पूछा, फिर? फिर जरा सा नाश्ता किया, शेव किया, नहाए-धोए - इसी में चार साढ़े चार बज जाते हैं. फिर? फिर हम कॉफी हाउस आ जाते हैं. वो कहने लगे - तब आप लिखते कब हैं? राकेश ने कहा लिखना? लिखते हम कल हैं.’

नई कहानी आंदोलन के दौर में हिंदी कहानीकारों की एक लंबी कतार महत्वपूर्ण काम कर रही थी. इनमें फणीश्वर नाथ रेणु, अमरकांत, निर्मल वर्मा, शेखर जोशी अंगुलियों पर गिने जा सकने वाले दर्जनों नाम हैं. धर्मयुग के एक कथा दशक में इस पीढ़ी का समग्र विस्तार एकत्र है. इस प्रतियोगी दौर में नई कहानी की तिकड़ी जितनी चर्चित रही, उसके पीछे कमलेश्वर की रणनीतिक सूझ की भी चर्चा होती है.

 

अपनी 75 साल की जिंदगी में कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और 100 से ऊपर फिल्मी पटकथाएं लिखे.
अपनी 75 साल की जिंदगी में कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और 100 से ऊपर फिल्मी पटकथाएं लिखे.


12 उपन्यास, 100 से ज्यादा फिल्मी पटकथाएं
अपनी 75 साल की जिंदगी में कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और 100 से ऊपर फिल्मी पटकथाएं लिखे. अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उन्होंने ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास लिखा, जिसमें उनके लेखन की ऊंचाइयां दिखती हैं. ‘कितने पाकिस्तान’ के लिए कमलेश्वर को साहित्य अकादमी सम्मान मिला. हालांकि कहा जाता है कि इस पर कुर्तुल एन हैदर के ‘आग का दरिया’ की छाया दिखती है. यह छाया विषयवस्तु, कथ्य और शिल्प के स्तर पर भी भी है.

उनकी ‘काली आंधी’ पर फिल्म ‘आंधी’, आगामी अतीत पर ‘मौसम’ और ‘तलाश’ पर आधारित ‘फिर भी’ बनी. पर बाद के दिनों में ‘सारा आकाश’, ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी-सी बात’ जैसी सार्थक फिल्मों से निकलकर कमलेश्वर ‘साजन की सहेली’ और ‘सौतन की बेटी’ जैसी घोर कमर्शियल फिल्मों में उलझ गए. इसका खास नुकसान कमलेश्वर को नहीं, बल्कि अच्छी फिल्मों के दर्शकों को ज्यादा हुआ.

मुंबई प्रवास के दिनों में कमलेश्वर बहुत व्यस्त रहा करते थे.
मुंबई प्रवास के दिनों में कमलेश्वर बहुत व्यस्त रहा करते थे.


मुंबई प्रवास के दिनों में कमलेश्वर बहुत व्यस्त रहा करते थे. वे टेलीविजन पर उस समय का बहुत लोकप्रिय कार्यक्रम ‘परिक्रमा’ कर रहे थे. ‘सारिका’ के संपादन की ज़िम्मेदारी उनके ऊपर थी और फिल्म लेखन भी जारी था. ‘आंधी’ फिल्म बहुत चली, लेकिन फिल्म की क्रेडिट गुलजार ने ले ली. कमलेश्वर की पत्नी गायत्री की किताब है ‘कमलेश्वर मेरे हमसफर’. उसमें वह लिखती हैं, ‘गुलज़ार ने फिल्म के ‘क्रेडिट्स’ में ‘रिटेन एंड डायरेक्टेड बाई गुलजार’ लिख कर सिर्फ ‘स्टोरी’ में कमलेश्वरजी का नाम दिया, जबकि सारी फिल्म कमलेश्वर ने जे ओम प्रकाश से सबकुछ तय हो जाने के बाद भोपाल के ‘जहांनुमा’ और दिल्ली के ‘अकबर’ होटल में लिखी थी. कमलेश्वरजी को इसका बहुत दुख हुआ. एक बार घर पर ही इन्होंने गुलजार से पूछा, तो उन्होंने गोलमोल सा उत्तर दिया, ‘भाईसाहब फिल्म तो ‘सेल्यूलाइड’ पर ही लिखी जाती है, उसे ‘डायरेक्टर’ ही लिखता है.’

उन्होंने एकसाथ इतनी विधाओं में काम किया और इतना काम किया कि यह सहज विश्वास नहीं हो पाता. शुक्र है कि कमलेश्वर उस दौर में पैदा नहीं हुए जब मुद्रण या प्रसार की व्यवस्था नहीं थी या लिखित जैसा कोई प्रमाण नहीं होता था, अन्यथा एक झटके में आज यह भ्रम हो सकता था कि कमलेश्वर नाम के कई रचनाकार थे.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 27, 2020, 8:49 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर