पुण्यतिथि विशेष: आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, पढ़ें हैरत इलाहाबादी की शायरी

पुण्यतिथि विशेष: आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, पढ़ें हैरत इलाहाबादी की शायरी
हैरत इलाहाबादी की पुण्यतिथि पर पढ़ें उनकी शायरी (सांकेतिक चित्र)

हैरत इलाहाबादी की शायरी (Hairat Allahabadi Ahayari And Ghazals):जहां में बेवफ़ा माशूक़ तुम सा कम निकलता है, कहा आशिक़ से वाक़िफ़ हो तो फ़रमाया नहीं वाक़िफ़, मगर हां इस तरफ़ से एक ना-महरम निकलता है...

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  • Last Updated: September 16, 2020, 10:44 AM IST
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हैरत इलाहाबादी की शायरी (Hairat Allahabadi Shayari And Ghazals): हैरत इलाहाबादी शायरों की दुनिया में एक नामचीन नाम है. हैरत इलाहाबादी ने कई ग़ज़लें, शायरी और शेर लिखे हैं. उन्होंने इश्क, मुश्क और मौत को भी बेहद खूबसूरत शब्दों में उकेरा और शायरी का रूप दिया. उन्होंने लिखा है कि 'बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए'. आज हैरत इलाहाबादी की पुण्यतिथि है. इस मौके पर आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लाये हैं हैरत इलाहाबादी के कुछ शेर और गज़ल...

1.आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस के हैं कल की ख़बर नहीं

आ जाएँ रोब-ए-ग़ैर में हम वो बशर नहीं
कुछ आप की तरह हमें लोगों का डर नहीं



इक तो शब-ए-फ़िराक़ के सदमे हैं जाँ-गुदाज़
अंधेर इस पे ये है कि होती सहर नहीं

क्या कहिए इस तरह के तलव्वुन-मिज़ाज को
वादे का है ये हाल इधर हाँ उधर नहीं

रखते क़दम जो वादी-ए-उल्फ़त में बे-धड़क
‘हैरत’ सिवा तुम्हारे किसी का जिगर नहीं.

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2.बोसा लिया जो चश्म का बीमार हो गए

ज़ुल्फ़ें छूईं बला में गिरफ़्तार हो गए

सकता है बैठे सामने तकते हैं उन की शक्ल

क्या हम भी अक्स-ए-आईना-ए-यार हो गए

बैठे तुम्हारे दर पे तो जुम्बिश तलक न की

ऐसे जमे कि साया-ए-दीवार हो गए .



3.सुना है ज़ख़्मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है

तिरा अरमान ले ऐ क़ातिल-ए-आलम निकलता है

न आँखों में मुरव्वत है न जा-ए-रहम है दिल में

जहाँ में बेवफ़ा माशूक़ तुम सा कम निकलता है

कहा आशिक़ से वाक़िफ़ हो तो फ़रमाया नहीं वाक़िफ़

मगर हाँ इस तरफ़ से एक ना-महरम निकलता है

मोहब्बत उठ गई सारे ज़माने से मगर अब तक

हमारे दोस्तों में बा-वफ़ा इक ग़म निकलता है

पता क़ासिद ये रखना याद उस क़ातिल के कूचे से

कोई नालाँ कोई बिस्मिल कोई बे-दम निकलता है .



4.ये महव हुए देख के बे-साख़्ता-पन को

आईने में ख़ुद चूम लिया अपने दहन को

करती है नया रोज़ मिरे दाग़-ए-कुहन को

ग़ुर्बत में ख़ुदा याद दिलाए न वतन को

छोड़ा वतन आबाद किया मुल्क-ए-दकन को

तक़दीर कहाँ ले गई यारान-ए-वतन को

क्या लुत्फ़ है जब मोनिस ओ यावर न हो कोई

हम वादी-ए-ग़ुर्बत ही समझते हैं वतन को

मुरझाए पड़े थे गुल-ए-मज़्मून हज़ारों

शादाब किया हम ने गुलिस्तान-ए-सुख़न को

ख़िदमत में तिरी नज़्र को क्या लाएँ ब-जुज़ दिल

हम रिंद तो कौड़ी नहीं रखते हैं कफ़न को .
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