लाइव टीवी

पुण्यतिथि विशेषः हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं

News18Hindi
Updated: January 29, 2020, 2:00 AM IST
पुण्यतिथि विशेषः हम इतना समझते हैं कि समझने से डरते हैं
प्रस्तुत है गोरख पांडेय की कुछ खास कविताएं. (फोटो साभारः फेसबुक)

कविता और प्रेम दो ऐसी चीजें हैं जो मुझे मनुष्य होने का बोध कराती हैं. प्रेम की बात करूं तो वो मुझे समाज से मिलता और मैं समाज को कविता देता हूं. मेरे जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, जिसे मजदूर वर्ग पूरा करता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2020, 2:00 AM IST
  • Share this:
कविता और प्रेम दो ऐसी चीजें हैं जो मुझे मनुष्य होने का बोध कराती हैं. प्रेम की बात करूं तो वो मुझे समाज से मिलता और मैं समाज को कविता देता हूं. मेरे जीने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए, जिसे मजदूर वर्ग पूरा करता है. मजदूर वर्ग अपने हित के लिए हर जगह संघर्ष करता है, इसलिए उस संघर्ष में योगदान देकर मैं अपने जीने का औचित्य साबित कर रहा हूं. मैं सिर्फ मजदूर वर्ग और मित्रों के लिए कविता लिखता हूं.

ये पंक्तियां हैं कविता लेखन के बादशाह कहे जाने वाले गोरख पांडेय की. उत्तर प्रदेश के देवरिया ज़िले में बसा 'पंडित का मुंडेरा' गांव में जन्मे गोखर पांडे की कविताएं मस्तिष्क के दरवाजे खोलने, प्यार के मोतियों को पिरोने का काम करती हैं. गोरख पांडेय की पुण्यतिथि पर हम आपके लिए लेकर आए हैं उनकी कुछ खास कविताएं.

इसे भी पढ़ें : हिंदी कथाओं, ग़ज़ल को नया आयाम देने वाले 'कमलेश्वर'

प्रस्तुत है गोरख पांडेय की कुछ खास कविताएं.

घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों में बंद खिड़कियां हैं
बंद खिड़कियों से टकराकर अपना सरलहूलुहान गिर पड़ी है वह

नई बहू है, घर की लक्ष्मी है
इनके सपनों की रानी है
कुल की इज्ज़त है
आधी दुनिया है
जहां अर्चना होती उसकी
वहां देवता रमते हैं
वह सीता है, सावित्री है
वह जननी है
स्वर्गादपि गरीयसी है
हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं
यह भी हम समझते हैं
यहां विरोध ही वाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में पेश करते हैं,
हम समझते हैं
इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी हम समझते हैं

लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

कानूनन समान है
वह स्वतंत्र भी है
बड़े-बड़ों क़ी नज़रों में तो
धन का एक यन्त्र भी है
भूल रहे हैं वे
सबके ऊपर वह मनुष्य है
उसे चहिए प्यार
चहिए खुली हवा
लेकिन बंद खिड़कियों से टकराकर
अपना सर
लहूलुहान गिर पड़ी है वह

चाह रही है वह जीना
लेकिन घुट-घुट कर मरना भी
क्या जीना ?

घर-घर में शमशान-घाट है
घर-घर में फांसी-घर है, घर-घर में दीवारें हैं
दीवारों से टकराकर
गिरती है वह

गिरती है आधी दुनिया
सारी मनुष्यता गिरती है

हम जो ज़िंदा हैं
हम सब अपराधी हैं
हम दण्डित हैं

कैसे अपने दिल को मनाऊं मैं कैसे कह दूं तुझसे कि प्यार है
तू सितम की अपनी मिसाल है तेरी जीत में मेरी हार है
तू तो बांध रखने का आदी है मेरी सांस-सांस आजादी है
मैं जमीं से उठता वो नगमा हूं जो हवाओं में अब शुमार है

मेरे कस्बे पर, मेरी उम्र पर, मेरे शीशे पर, मेरे ख्वाब पर
यूं जो पर्त-पर्त है जम गया किन्हीं फाइलों का गुबार है
इस गहरे होते अंधेरे में मुझे दूर से जो बुला रही
वो हसीं सितारों के जादू से भरी झिलमिलाती कतार है

ये रगों में दौड़ के थम गया अब उमड़नेवाला है आंख से
ये लहू है जुल्म के मारों का या फिर इन्कलाब का ज्वार है
वो जगह जहां पे दिमाग से दिलों तक है खंजर उतर गया
वो है बस्ती यारो खुदाओं की वहां इंसां हरदम शिकार है

कहीं स्याहियां, कहीं रौशनी, कहीं दोजखें, कहीं जन्नतें
तेरे दोहरे आलम के लिए मेरे पास सिर्फ नकार है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए लाइफ़ से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: January 29, 2020, 2:00 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर