पुण्‍यतिथि विशेष: कवि-कथाकार राजकमल चौधरी की कविताएं अपने समय का आईना हैं

पुण्‍यतिथि विशेष: कवि-कथाकार राजकमल चौधरी की कविताएं अपने समय का आईना हैं
हिंदी और मैथिली के कवि-कथाकार राजकमल चौधरी

हिंदी और मैथिली के कवि-कथाकार राजकमल चौधरी (Rajkamal Chaudhari) का जन्म उत्तरी बिहार (Bihar) में मुरलीगंज के समीपवर्ती गांव रामपुर हवेली में हुआ था. उनका वास्तविक नाम मणींद्र नारायण चौधरी था.

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आज (19 जून) हिंदी और मैथिली के कवि-कथाकार राजकमल चौधरी (Rajkamal Chaudhari) की
पुण्यतिथि है. उनका जन्म उत्तरी बिहार (Bihar) में मुरलीगंज के समीपवर्ती गांव रामपुर हवेली में हुआ था. उनका वास्तविक नाम मणींद्र नारायण चौधरी था. वह अपने लेखन की ख़ास शैली के लिए पहचाने जाते हैं. उनके लेखन में विरोध के स्‍वर थे और उन्होंने सिर्फ अपने उन पाठकों के लिए लिखा, जो वास्‍तव में सच जानना चाहते थे. शायद यही वजह है कि उन्‍होंने अपनी रचनाओं के माध्‍यम से हिंदी साहित्‍य (Hindi Literature) की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. हालांकि उन्‍होंने हिंदी की तुलना में मैथिली में ज्यादा समय तक लिखा. इसके बावजूद हिंदी में लिखे गए उनके उपन्यास, कविताएं (Poetry) और कहानियां अपनी अलग पहचान रखते हैं. उनकी पुण्यतिथि पर उनकी कुछ चर्चित कविताएं दीवार घड़ी के बारे में, एक आदत: प्यार, प्रेम का अंतिम गीत न्‍यूज18 के पाठकों के लिए ख़ासतौर पर प्रस्‍तुत हैं...

 

दीवार घड़ी के बारे में
इस दीवार घड़ी से मत पूछिए कि


समय की क्या कीमत होगी
क्योंकि कीमत नहीं है

पांच बजे शाम के बाद ट्राम-बस
टैक्सियों की भीड़ में आदमी कहां होगा

आदमी कब कील की तरह चौरंगी डल-हौजी के
जूतों से बाहर निकला हुआ अपने ही पांव में चुभने लगेगा

यह दीवार घड़ी है चौबीस घंटे में केवल दो बार बजती है
दस दफा पांच दफा महायुद्ध
शुरू करने के लिए बजती है
दीवार घड़ी कीमत नहीं बताएगी
चावल की नहीं और वक़्त की नहीं और
अमेरिकी गेहूं की भी नहीं बताएगी कीमत
क्योंकि कीमतों का ग्राफ महात्मा गांधी से
शुरू होकर इंदिरा गांधी पर खत्म हो जाता है
हर दफा इतिहास की किताबों में
योजना-दफ्तर के आंकड़ों में और
अफवाहें बम जीवन बीमा पॉलिसी
एक साथ गढ़ने वाले कारखानों में
मूल्य नहीं रह गए हैं अब किसी वस्तु में
अब केवल यह समय रह गया है
केवल यह दीवार घड़ी रह गई है
दस और पांच का समय बताने के लिए

 
एक आदत: प्यार
पहली बार हम उसके कमरे में आते हैं.
बेहद शर्मिंदा-
उसे देख नहीं पाते
उसकी आंखों में खुद को तो और भी नहीं.

इसके बाद,
हर कमरा हर बार हमारे लिए
बेशर्मी का इजहार बन जाता है...

हम वहशत में भीतर घुसते हैं
तोड़ डालते हैं फूलदान
उसकी किताबें चुरा लेते हैं और
वह शर्म से झुकी हुई.

प्रेम का अंतिम गीत
हम (मैं और तुम) स्वयं को सम्पूर्ण करते हैं
बांहों के बीच की वह जमीन खोलकर
जिसे जमाने के सामने खोलते हुए डरते हैं

हमारे शरीर की तपन, हमारी ख्वाहिशों का बुखार
तुम्हारे स्तूप, मेरी कब्र के पास खड़े मीनार...
इनसे कभी एक दुनिया बनी थी
शारीरिक जड़ता और जंगलीपन की एक खास स्थिति में

शुरू में शरमाई थीं तुम मांगते हुए. अन्त में
बिना मांगे ही ले लिया था-क्यों?

दोस्ती बनने या टूटने में
कभी दीवार या हथौड़ा नहीं बना करती है नैतिकता!
हम (मैं और तुम) अनैतिक हैं, क्योंकि
हम दोस्त हैं
मैं आकाश का रक्त-स्राव झेलता हूं
तुम धरती का गर्भधारण करती हो!

जीवन एक घड़ी है जिसमें मुझे इतना ही करना है।
कि तुममें घुल जाऊं,
शारीरिक जड़ता और जंगलीपन की एक खास स्थिति में
तुम मुझे पैदा करो
तुम झुको और तुम टूटो और तुम घायल बिल्ली की तरह
छटपटाओ और मैं तुम्हें पैदा करूं
मेरी बच्ची बनकर तुम मुझमें सो जाओ
और जागो नहीं जब तक
मैं दफ्तर से लौट नहीं आऊं.

 

अकाल का पहला दिन
जब पूरा का पूरा यह शहर

मुजफ्फरपुर
खारे पानी में डूब गया
औरत वह बेमिसाल
मीराजी की ग़ज़ल में शीशे के बिखरे हुए-
टुकड़ों पर टूटती-बिखरती रह गई
बेनहाई हुई, बगैर संवारे बाल...

उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं,

हरे, पीले, नीले, सफेद सांप रेंगते हैं
उसके होंठों में शब्द नहीं

शब्द नहीं
मुड़े हुए घुटनों के ऊपर
अंधेरी झाड़ियों में
सिर्फ एक अक्षर
होता है बीज-मंत्र
स्त्रीं स्त्री स्त्री
स्त्री स्त्री
और
कुछ नहीं होता है अकाल...केवल यही...कि...
पूरा का पूरा यह शहर खारे पानी में डूब जाता है
उस एक बेनजीर औरत के मातम में,
हम एक नया मर्सिया क्यों नहीं लिखें?
नींद में भटकता हुआ आदमी
नींद की एकांत सड़कों पर भागते हुए आवारा सपने
सेकेंड-शो से लौटती हुई बीमार टैक्सियां,
भोजपुरी छुरी जैसी चीखें
बेहोश औरत की ठहरी हुई आंखों की तरह रात
बिजली के लगातार खम्भे पीछा करते हैं
साए बहुत दूर छूट जाते हैं
साए टूट जाते हैं

मैं अकेला हूं.
मैं टैक्सियों में अकारण खिलखिलाता हूं,
मैं चुपचाप फुटपाथ पर अंधेरे में अकारण खड़ा हूं.
भोथरी छुरी जैसी चीखें
और आंधी में टूटते हुए खुले दरवाजों की तरह ठहाके
एक साथ
मेरे कलेजे से उभरते हैं
मैं अंधेरे में हूं और चुपचाप हूं.

सतमी के चांद की नोक मेरी पीठ में धंस जाती है
मेरे लहू से भीग जाते हैं टैक्सियों के आरामदेह गद्दे
फुटपाथ पर रेंगते रहते हैं सुर्ख-सुर्ख दाग
किसी भी ऊंचे मकान की खिड़की से
नींद में बोझिल-बोझिल पलकें
नहीं झांकती हैं
किसी हरे पौधे की कोमल, नन्ही शाखें,
शाखें और फूल,
फूल और सुगंधियां
मेरी आत्मा में नहीं फैलती हैं.

टैक्सी में भी हूं और फुटपाथ पर खड़ा भी हूं
मैं सोए हुए शहर की नस-नस में
किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी मां खो गई है
भटकता रहता हूं,
(मेरी नई आजादी और मेरी नई मुसीबत...उफ्!)
चीख और ठहाके
एक साथ मेरे कलेजे से उभरते हैं.
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