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पुण्यतिथि विशेषः आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलकर लेखक बनें ओमप्रकाश वाल्मीकि, पढ़ें 'जूठन' का पुस्तकांश

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Updated: November 17, 2019, 8:35 AM IST
पुण्यतिथि विशेषः आर्थिक और मानसिक कष्ट झेलकर लेखक बनें ओमप्रकाश वाल्मीकि, पढ़ें 'जूठन' का पुस्तकांश
आरंभिक जीवन में ओमप्रकाश वाल्मिकी को जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े उसकी उनके साहित्य में मुखर अभिव्यक्ति हुई है.

हिंदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्रकाश वाल्मीकि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. उनका जन्‍म 30 जून 1950 को मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) जिले के बरला गांव में एक अछूत परिवार में हुआ था.

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  • Last Updated: November 17, 2019, 8:35 AM IST
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ओमप्रकाश वाल्मीकि वर्तमान दलित साहित्य के प्रतिनिधि रचनाकारों में से एक हैं. हिंदी में दलित साहित्य के विकास में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है. उनका जन्‍म 30 जून 1950 को मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) जिले के बरला गांव में एक अछूत वाल्‍मीकि परिवार में हुआ था. उन्‍होंने अपनी शिक्षा अपने गांव और देहरादून से प्राप्‍त की थी. उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों के बीच बीता था.

दलित लेखकों के संपर्क में आए
आरंभिक जीवन में उन्हें जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े उसकी उनके साहित्य में मुखर अभिव्यक्ति हुई है. वाल्मीकि कुछ समय तक महाराष्ट्र में रहे. वहां वे दलित लेखकों के संपर्क में आए और उनकी प्रेरणा से डॉ. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का अध्ययन किया. इससे उनकी रचना-दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन हुआ. वह देहरादून स्थित आर्डिनेंस फॅक्टरी में एक अधिकारी के रूप में काम करते हुए अपने पद से सेवानिवृत्‍त हो गए थे.

दलित रचनाकार की चेतना का निर्माण

ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अस्सी के दशक से लिखना शुरू किया, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में वे चर्चित और स्थापित हुए 1997 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘जूठन’ से. इस आत्मकथा से पता चलता है कि किस तरह वीभत्स उत्पीड़न के बीच एक दलित रचनाकार की चेतना का निर्माण और विकास होता है. 17 नवंबर 2013 में उनका निधन हो गया.

‘जूठन’ किताब के बारे में-
आज़ादी के पांच दशक पूरे होने और आधुनिकता के तमाम आयातित अथवा मौलिक रूपों को भीतर तक आत्मसात कर चुकने के बावजूद आज भी हम कहीं-न-कहीं सवर्ण और अवर्ण के दायरों में बंटे हुए हैं. सिद्धांतों और किताबी बहसों से बाहर, जीवन में हमें आज भी अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जिनसे हमारी जाति और वर्णगत असहिष्णुता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है.
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‘जूठन’ ऐसे ही उदाहरणों की शृंखला है जिन्हें एक दलित व्यक्ति ने अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ खुद भोगा है. इस आत्मकथा में लेखक ने स्वाभाविक ही अपने उस आत्म की तलाश करने की कोशिश की है जिसे भारत का वर्ण-तंत्र सदियों से कुचलने का प्रयास करता रहा है, कभी परोक्ष रूप में, कभी प्रत्यक्ष रूप में. इसलिए इस पुस्तक की पंक्तियों में पीड़ा भी है, असहायता भी है, आक्रोश और क्रोध भी और अपने आपको आदमी का दर्जा दिए जाने की सहज मानवीय इच्छा भी है.

पुस्तकांश

उन दिनों मैं नौवीं कक्षा में था. घर की आर्थिक हालत कमजोर हो चुकी थी. एक-एक पैसे के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को खटना पड़ता था. मेरे पास पाठ्य-पुस्तकें हमेशा कम रहती थीं. दोस्तों से मांगकर काम चलाना पड़ता था. कपड़ों की भी वही स्थिति थी. जो मिल गया, पहन लिया. जो वक्त पर मिल गया, खा लिया. उन दिनों गांव में मरनेवाले पशुओं को उठाने का काम भी चूहड़ों के जिम्मे था. जिनके घर में जो काम करता था, उनके पशु भी उसे ही उठाने पड़ते थे. इसके बदले में कोई मेहनताना या मजदूरी नहीं मिलती थी.

एक गाय, एक भैंस या बैल को उठाने के लिए चार से छह लोगों की जरूरत पड़ती थी. जिसका मवेशी मर जाता था, उसे जल्दी लगी रहती थी. इसलिए वह बार-बार बस्ती में आकर चिल्लाता था. देर होने पर गालियां बकता था. उठानेवालों को इकट्ठा करने में अक्सर देर हो जाती थी. मरे हुए पशु को उठाना बहुत कठिन काम होता है. उसके अगले-पिछले पैरों को रस्सी से बांधकर बांस की मोटी-मोटी बाहियों से उठाना पड़ता है. इतने श्रम-साध्य काम के बदले मात्र गालियां...? कितने क्रूर समाज में रहे हैं हम, जहां श्रम का कोई मेल ही नहीं बल्कि निर्धनता को बरकरार रखने का एक षड्यंत्र ही था यह सब.

मरे हुए पशु की खाल मुजफ्फरनगर में चमड़ा बाजार में बिक जाती थी. उन दिनों एक पशु की खाल 20 से 25 रुपए में बिकती थी. आने-जाने और मरे जानवर को उठानेवालों की मजदूरी देकर मुश्किल से एक खाल के बदले 10-15 रुपए हाथ में आते थे. तंगी के दिनों में 10-15 रुपए भी बहुत बड़ी रकम दिखाई पड़ते थे. चमड़ा खरीदनेवाला दुकानदार खाल में बहुत मीन-मेख निकालता था. कट-फट जाने पर खाल बेकार हो जाती थी. खाल को निकालते ही उस पर नमक लगाना पड़ता था वरना दूसरे दिन ही खाल खराब हो जाती थी जिसे दुकानदार खरीदने से मना कर देता था.

एक रोज ब्रह्मदेव तगा का बैल खेत से लौटते हुए रास्ते में गिर पड़ा. उठ नहीं पाया, मर गया था. कुछ ही देर बाद ब्रह्मदेव ने आकर हमारे घर खबर कर दी थी. पिताजी और मुझसे बड़े भाई जनेसर उस रोज किसी रिश्तेदारी में गए थे. घर पर मां, मेरी बहन माया और सबसे बड़ी भाभी रहती देवी ही थे. जसबीर उन दिनों देहरादून में था मामा के पास. मां परेशान हो गई थी, बैल की खाल उतारने किसे भेजे? बस्ती में एक-दो लोग थे, लेकिन कोई भी उस समय जाने के लिए तैयार नहीं था. मां ने चाचा से बात की. वे तैयार हो गए थे. लेकिन उनके साथ किसी को जाना चाहिए. अकेले से खाल नहीं उतर पाएगी.

मैं उस समय स्कूल में था. मां ने थक-हारकर मुझे ही बुला लिया था. मैंने कभी ये काम नहीं किया था. मां नहीं चाहती थी कि यह काम मुझे करना पड़े लेकिन खाल बेचकर जो 10-15 रुपए मिलने वाले थे, उसे छोड़ पाने की स्थिति में मां नहीं थी. हारकर मां ने मुझे चाचा के साथ भेज दिया. मेरे चाचा सोल्हड़ महाकामचोर थे. बस, सारा दिन ढोल-ताशों में लगे रहते थे. मेहनत के काम से कतराते थे. मां को फिकर लगी थी कि कहीं हमारे पहुंचने से पहले ही बैल पर गिद्ध या जंगली जानवर न टूट पड़ें. चाचा ने खाल उतारना शुरू किया. मैं उनकी मदद कर रहा था. चाचा का हाथ धीरे-धीरे चल रहा था. पिताजी जैसी कुशलता उनमें नहीं थी. थोड़ी देर बाद ही वे थककर बीड़ी पीने बैठ गए थे.

चाचा ने एक छुरी मेरे हाथ में पकड़ा दी. बोले- धीरे-धीरे खाल उतारो, अकेले से तो शाम तक नहीं उतरेगी. छुरी पकड़ते हुए मेरे हाथ कांप रहे थे. अजीब-से संकट में फंस गया था. चाचा ने छुरी चलाने का ढंग सिखाया. उस रोज मेरे भीतर बहुत कुछ था जो टूट रहा था. चाचा की हिदायत पर मैंने बैल की खाल उतारी थी. मैं जैसे स्वयं ही गहरे दलदल में फंस रहा था, जहां से मैं उबरना चाहता था. हालात मुझे उसी दलदल में घसीट रहे थे. चाचा के साथ तपती दोपहर में जिस यातना को मैंने भोगा था, आज भी उसके जख्म मेरे तन पर ताजा हैं. जैसे-जैसे खाल उतर रही थी, मेरे भीतर का रक्त जम रहा था. खाल उतारने में हमें कई घंटे लग गए थे. चाचा ने खाल को जमीन पर फैला दिया था. उस पर लगे खून को सूखी जमीन ने सोख लिया था.

चाचा ने खाल को चादर में बांध दिया था. गठरी उठाकर सिर पर रख ली थी. लगभग दो मील की दूरी पर हमारा घर था. बोझ के कारण चाचा को तेज चलना पड़ रहा था. मैं हाथ में छुरी पकड़े उनके पीछे-पीछे लगभग दौड़ रहा था. बसेड़ा जानेवाली पक्की सड़क से हम लोग बस-अड्डे के पास पहुंच गए थे. गठरी सिर से उतारकर चाचा ने जमीन पर रख दी थी. यहां से आगे तुम ले जाओ, मैं थक गया हूं. उस रोज मैंने चाचा से बहुत कहा लेकिन वे नहीं माने. चाचा, बस-अड्डे की भीड़ पार करा दो. मेरे स्कूल की छुट्टी का समय है. मेरे स्कूल के साथी यह ले जाते हुए देखेंगे तो वे मुझे स्कूल में तंग करेंगे.

मैंने गिड़गिड़ाकर रुआंसी आवाज में चाचा से कहा. किन्तु वे नहीं पसीजे. गठरी उतारकर मेरे सिर पर रख दी थी. गठरी का वजन मेरे वजूद से ज्यादा था. मजबूरन उठाकर चलना पड़ा. बस-अड्डे की परिचित भीड़ से मैं उस रोज जिस तरह निकला, मेरा ही मन जानता है. एक भय लगातार मेरा पीछा कर रहा था- कोई देख न ले. कोई सहपाठी न मिल जाए. अगर पूछ बैठा कोई तो क्या बताऊंगा? घर तक पहुंचते-पहुंचते मेरी टांगें जवाब दे गई थीं. लग रहा था, अब गिरा.

गांव के किनारे-किनारे चलकर, लम्बा चक्कर काटा था, बस्ती तक पहुचने के लिए. मुझे उस हाल में देखकर मां रो पड़ी थी. मैं सिर से पांव तक गंदगी से भरा हुआ था. कपड़ों पर खून के धब्बे साफ दिखाई पड़ रहे थे. बड़ी भाभी ने उस रोज मां से कहा था- इनसे ये ना कराओ. भूखे रह लेंगे. इन्हें इस गंदगी में ना घसीटो. भाभी के ये शब्द आज भी मेरे लिए अंधेरे में रोशनी बनकर चमकते हैं. मैं इस गंदगी से बाहर निकल आया हूं, लेकिन लाखों लोग आज भी उस घिनौनी जिंदगी को जी रहे हैं.

किताब : जूठन -1
लेखक : ओमप्रकाश वाल्मीकि
विधा : आत्मकथा
प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ठ संख्या : 164
मूल्य : 175/-

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First published: November 17, 2019, 8:35 AM IST
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