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पुण्यतिथिः हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

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Updated: October 15, 2019, 3:52 PM IST
पुण्यतिथिः हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
निराला ने 1920 के आसपास से लेखन कार्य आरंभ किया था. उनकी पहली रचना जन्मभूमि पर लिखा गया एक गीत था.

निराला ने 1920 के आसपास से लेखन कार्य आरंभ किया था. उनकी पहली रचना 'जन्मभूमि' पर लिखा गया एक गीत था.

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  • Last Updated: October 15, 2019, 3:52 PM IST
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आज सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की पुण्यतिथि है. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं. उन्होंने कहानियां, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं लेकिन उनकी ख्याति विशेष रूप से कविता के कारण ही है. निराला ने 1920 के आसपास से लेखन कार्य आरंभ किया था. उनकी पहली रचना 'जन्मभूमि' पर लिखा गया एक गीत था. उनके कविता संग्रह 'अपरा' से कुछ कविताएं.

तोड़ती पत्थर

वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर -

वह तोड़ती पत्थर ।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
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श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार -
सामने तरु-मालिका, अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,

प्रायः हुई दुपहर -
वह तोड़ती पत्थर ।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं;
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा -
"मैं तोड़ती पत्थर ।"
गहन है यह अन्ध कारा

गहन है यह अन्ध कारा;
स्वार्थ के अवगुण्ठनों से
हुआ है लुण्ठन हमारा ।

खड़ी है दीवार जड़ की घेर कर,
बोलते हैं लोग ज्यों मुँह फेरकर,
इस गगन में नहीं दिनकर,
नहीं शशधर, नहीं तारा ।

कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नहीं आता समझ में,
कहाँ है श्यामल किनारा।

प्रिय, मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता-फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा ।
बाँधो न नाव इस ठाँव बन्धु !

बाँधो न नाव इस ठाँव बन्धु !
पूछेगा सारा गाँव, बन्धु !

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर;
कँपते थे दोनों पाँव, बन्धु !

वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव बन्धु !

उक्ति

कुछ न हुआ, न हो।
मुझे विश्व का सुख, श्री, यदि केवल
पास तुम रहो !

मेरे नभ के बादल यदि न कटे-
चन्द्र रह गया ढका,
तिमिर रात को तिरकर यदि न अटे
लेश गगन-भास का,
रहेंगे आधार हँसते, पथ पर, तुम
हाथ यदि गहो।

बहु-रस साहित्य विपुल यदि न पढ़ा
मन्द सबों ने कहा,
मेरा काव्यानुमान यदि न बढ़ा -
ज्ञान, जहाँ का रहा,
रहे, समझ है मुझमें पूरी, तुम
कथा यदि कहो।

किताब का नाम - अपरा

लेखक - सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
विधा - कविता
प्रकाशऩ - राजकमल प्रकाशन
कीमत - 95/- रुपये

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First published: October 15, 2019, 3:52 PM IST
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