Pash Death Anniversary: विद्रोही कवि 'पाश' जिनकी कविताओं से क्रांति की लौ निकलती है

Pash Death Anniversary: सबसे ख़तरनाक होता है 
सब कुछ सहन कर जाना...

Pash Death Anniversary: सबसे ख़तरनाक होता है सब कुछ सहन कर जाना...

Pash Death Anniversary: इंकलाबी पंजाबी कवि (Poet) अवतार सिंह संधू उर्फ 'पाश' (Avtar Singh Sandhu) की कविताओं में जहां गांव की मिटटी की महक महसूस होती है, वहीं इंसानी भावनाओं, दुखों की अभिव्‍यक्ति भी इनमें मिलती है.

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  • Last Updated: March 23, 2021, 11:03 AM IST
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Pash Death Anniversary: अवतार सिंह संधू उर्फ 'पाश' (Avtar Singh Sandhu) इंकलाबी पंजाबी कवि (Panjabi Poet) थे. उनका जन्‍म 9 सितंबर 1950 को हुआ था. पंजाबी में उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए. उन्हें क्रांति का कवि माना जाता है. जहां 'पाश' की कविताओं में गांव की मिटटी की महक महसूस होती है, वहीं इंसानी भावनाओं, दुखों की अभिव्‍यक्ति भी उनकी कविताओं में मिलती है. यह उनकी कविताओं की ही विशेषता है कि पंजाबी भाषा के कवि होने के बावजूद वह हिंदी पट्टी के भी प्रिय कवि माने जाते रहे. आज 'पाश' की पुण्य तिथि है. 23 मार्च, 1988 को आतंकवादियों ने इस क्रांतिकारी जन-कवि की गोली मारकर हत्या कर दी थी. 'पाश' को पूरी दुनिया के लिए शोषण, दमन और अत्याचारों से मुक्त समतावादी दुनिया की चाह थी. यही उनका सपना था, जो आज भी उनकी कविताओं से झांकता महसूस होता है-

सबसे ख़तरनाक

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है

सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है



सबसे ख़तरनाक नहीं होता

कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है

जुगनुओं की लौ में पढ़ना

मुट्ठियां भींचकर बस वक्‍़त निकाल लेना बुरा तो है

सबसे ख़तरनाक नहीं होता

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना

तड़प का न होना

सब कुछ सहन कर जाना

घर से निकलना काम पर

और काम से लौटकर घर आना

सबसे ख़तरनाक होता है

हमारे सपनों का मर जाना

सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है

आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो

आपकी नज़र में रुकी होती है

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सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है

जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है

और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है

सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है

जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है

आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर

गुंडों की तरह अकड़ता है

सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है

जो हर हत्‍याकांड के बाद

वीरान हुए आंगन में चढ़ता है

लेकिन आपकी आंखों में

मिर्चों की तरह नहीं पड़ता

सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है

जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए

और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा

आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती

पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती

ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

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सपने

हर किसी को नहीं आते

बेजान बारूद के कणों में

सोई आग के सपने नहीं आते

बदी के लिए उठी हुई

हथेली को पसीने नहीं आते

शेल्फ़ों में पड़े

इतिहास के ग्रंथो को सपने नहीं आते

सपनों के लिए लाज़मी है

झेलनेवाले दिलों का होना

नींद की नज़र होनी लाज़मी है

सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते

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मैं पूछता हूं 

मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से

क्या वक़्त इसी का नाम है

कि घटनाएं कुचलती हुई चली जाएं

मस्त हाथी की तरह

एक समूचे मनुष्य की चेतना को?

कि हर सवाल

केवल परिश्रम करते देह की ग़लती ही हो

क्यों सुना दिया जाता है हर बार

पुराना लतीफ़ा

क्यों कहा जाता है हम जीते है

ज़रा सोचें -

कि हममे से कितनो का नाता है

ज़िन्दगी जैसी किसी चीज़ के साथ!

रब्ब की वह कैसी रहमत है

जो गहूं गोड़ते फटे हाथो पर

और मंडी के बीच के तख़्तपोश पर फैले मांस के

उस पिलपिले ढेर पर

एक ही समय होती है ?

आख़िर क्यों

बैलों की घंटियों

पानी निकालते इंज़नो के शोर में

घिरे हुए चेहरों पर जम गई है

एक चीख़ती ख़ामोशी?

कौन खा जाता है तलकर

टोके पर चारा लगा रहे

कुतरे हुए अरमानो वाले पट्ठे की मछलियों?

क्यों गिड़गिड़ाता है

मेरे गांव का किसान

एक मामूली पुलिस वाले के सामने?

क्यों कुचले जा रहे आदमी के चीख़ने को

हर बार कविता कह दिया जाता है?

मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से
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