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रॉकेट ने आंखों की रौशनी छीनी थी, वर्ल्ड कप जीतने का ख्वाब नहीं

रॉकेट ने आंखों की रौशनी छीनी थी, वर्ल्ड कप जीतने का ख्वाब नहीं

रॉकेट मेरी दाहिनी आंख पर जाकर लगा. बाईं आंख पर भी तेज चिंगारियां लगीं. इसके बाद मेरी आंखें अस्पताल में खुलीं- अपने आसपास अंधेरा देखने के लिए. मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा था. तब मैं 9 साल का था. जोर-जोर से चीखने लगा. तब भी मुझे ये तकलीफ नहीं थी कि मैं देख नहीं सकता, ये तकलीफ हो रही थी कि अब मैं क्रिकेट नहीं खेल सकूंगा.

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    दूसरे बच्चों की तरह वो भी एक खिलंदड़ बच्चा था, जिसे घरवालों को तंग करना और क्रिकेट खेलना खूब पसंद था. अलसुबह से स्कूल के वक्त तक और फिर स्कूल के बाद भी खेलने की प्रैक्टिस करता.

    वर्ष 2004 में रौशनी के त्यौहार ने उसकी आंखों की रौशनी ले ली लेकिन सपने फिर भी अपनी कौंध से हौसलों को हवा देते रहे. आज दीपक मलिक ब्लाइंड क्रिकेट टीम में ऑलराउंडर हैं. हाल ही में इस टीम ने वर्ल्ड कप जीता. दीपक ने hindi.news18.com से अपनी कहानी साझा की.

    तब मैं छह साल का था. हमारे गांव में सब लोग कबड्डी और कुश्ती खेलते लेकिन मुझे क्रिकेट खेलना पसंद था. चाचा-ताऊ लोग कहते कि कुश्ती हरियाणा के मर्दों का खेल है. क्रिकेट शहरी खेल है, इसमें कुछ नहीं रखा. फिर भी मैं क्रिकेटर बनने के सपने देखता. सुबह उठकर जैसे-तैसे मुंह धोता और दौड़ लगा देता. गली में ही दोस्तों के घर थे, सबके नाम पुकारता हुआ दौड़ता तो खेल के मैदान में जाकर ही सांस लेता था.

    क्रिकेट खेलना हमारे गांव में उतना पसंद नहीं किया जाता था इसलिए हमारे पास ढंग की बैट या बॉल भी नहीं थी. लेकिन खेलने का जुनून इतना था कि तब तक खेलते, जब तक बड़ों से डांट न मिल जाए. मैं टीवी पर सचिन-धोनी को देखते हुए दिल ही दिल में उनकी तरह बनना चाहता. उनकी स्टाइल फॉलो करता था लेकिन ऊपरवाले को मेरी इच्छा को परखना बाकी था. वर्ष 2004 की बात है. दिवाली का दिन था. मैं रॉकेट छोड़ रहा था कि तभी वो मेरी दाहिनी आंख पर जाकर लगा. बाईं आंख पर भी तेज चिंगारियां लगीं.



    मेरी आंखें अस्पताल में खुलीं- अपने आसपास अंधेरा देखने के लिए. तब मैं 9 साल का था.

    जोर-जोर से चीखने लगा. तब भी मुझे ये तकलीफ नहीं थी कि मैं देख नहीं सकता, ये तकलीफ हो रही थी कि अब मैं क्रिकेट नहीं खेल सकूंगा. अस्पताल से लौटने के बाद मेरा पूरा वक्त अपने कमरे में बीतने लगा. मैं रोता रहता. अपने ही घर में मैं एक कदम बिना सहारे के नहीं चल पाता था.

    वो वक्त बेहद मुश्किल था. मेरी एक आवाज पर सुबह घर से दौड़ पड़ने वाले दोस्त अब घर नहीं आते थे. आते भी थे तो हमारे पास करने को कोई बात नहीं होती थी. आंखों की रौशनी थी, तब तक दोस्त थे, उनके जाते ही दोस्त भी चले गए. मैं डिप्रेशन में था. दो सालों तक स्कूल नहीं गया. तब घरवालों ने सोनीपत के छोटे से गांव से दिल्ली आने का फैसला लिया.

    2008 में दिल्ली के ब्लाइंड स्कूल में मुझे पहली क्लास में एडमिशन मिला. मैंने ब्रेल सीखी. एक नई रौशनी में पढ़े हुए को दोबारा पढ़ना सीखा.

    इसने मुझे दोबारा जीने का हौसला दिया. अब मैं बिना देखे भी अपने काम खुद से करने लगा था. ऐसे ही एक दिन ब्लाइंड क्रिकेट के बारे में पता चला. मैंने सर से रिक्वेस्ट किया कि मुझे भी ये खेल सिखाएं. पहले तो उन्होंने मना किया लेकिन फिर मेरी जिद को देखते हुए मुझे ट्रेन करना शुरू कर दिया.

    अब मेरे लिए क्रिकेट खेलना भी ब्रेल सीखने की तरह था. सीखे हुए को फिर-फिर दोहरा रहा था.

    ब्लाइंड क्रिकेट खेलने की तकनीक थोड़ी सी अलग होती है, जल्द ही मैंने वो सब तकनीकें सीख लीं. अच्छा खेलने के कारण मेरा ब्लाइंड क्रिकेट टीम में चयन हो गया. अब तक मैं इस टीम के साथ 2014 और 2018 में पाकिस्तान को हराकर वर्ल्ड कप जीत चुका हूं. हमारी टीम ने 2012 और 2017 में T20 वर्ल्ड कप भी जीता. हर साल दिवाली पर मुझे वही दिन याद आता है, जब मेरी आंखों की रौशनी चली गई, मुझे एक नया रास्ता देने के लिए.

    वो दिन न होता तो शायद आज मैं अपने जुनून को हकीकत में बदलता न देख पाता.

    Tags: Cricket, Indian blind cricket team

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