लाइव टीवी

हवा, पानी, मौत या वोट सब बाज़ार है

News18Hindi
Updated: November 4, 2019, 2:20 PM IST
हवा, पानी, मौत या वोट सब बाज़ार है
दिल्ली एनसीआर प्रदूषण

भारत के हिसाब से मानक तय किए बगैर ये जान पाना बेहद मुश्किल है कि हवा कितनी खराब है और उसे साफ करने के लिए हमें किस तरह का मानक अपनाना चाहिए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 4, 2019, 2:20 PM IST
  • Share this:
(पंकज रामेन्दु)

रेडियो पर अचानक एक गंभीर आवाज़ आती है,’दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर बढ़ कर 500 के पार पहुंचा, गाज़ियाबाद की हवा में सांस लेना दूभर, गुरूग्राम में पीएम 10 का स्तर बढ़ कर 800 के पार, क्या आप चाहते हैं कि आपका बच्चा इन हवाओं में सांस ले, क्या आपके लिए सांस लेने दूभर हो गया है, तो आज ही ले आइए..... फलाना कंपनी का ढिकाना एयरप्यूरीफायर. शुद्ध हवा की गारंटी, अब खुल के सांस लेना हुआ आसान,.

हमारे लिए प्रदूषण के बस यही मायने हैं. हम बस बाज़ार खड़े कर रहे हैं. पानी की अशुद्धता के लिए बाज़ार में एक से एक नए वॉटर प्यूरीफायर हैं. आर.ओर सिस्टम है. अब घऱ की हवा को शुद्ध रखने के लिए भी तरीका निकाल लिया गया है. ये सच है कि प्रदूषण के चलते हर इंसान के बस की बात नहीं है कि वो शहर छोड़ कर कहीं और बस जाए. और दिल्ली एनसीआर की आबोहवा तो अब अमूमन पूरे साल भर ही खराब रहती है. ये दो महीने स्थितियां विकट हो जाती है. तो इसका भी समाधान बाज़ार ने ढूंढ लिया है. दिल्ली में कई कंपनिया ऑनलाइन किराए पर एयरप्यूरीफायर दे रही हैं. 500 रू महीने के हिसाब से आप ये हवा शुद्धि यंत्र घर पर ला सकते हैं.

क्या होता है एयरप्यूरीफायर

एयर प्यूरीफायर एक हाइटेक डिवाइस होती है जो घर के अंदर की हवा को साफ रखती है और धूल के कण (जिसमें पीएम 2.5 कण भी शामिल हैं-यानि वो छोटे कण जो इंसानी सेहत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं) धुआं, और हवा में मौजूद दूसरे नुकसानदायक कणों को घर के अंदर नहीं आने देता है. अब तो कई कंपनिया ये दावा भी कर रही है कि उनकी मशीन एलर्जी और अस्थमा अटैक को भी कम करती है.

क्या कहता है बाज़ार
पिछले कुछ सालों में एयरप्यूरीफायर की बिक्री की रफ्तार में रॉकेट की तरह तेजी आई है. इसी का नतीजा है कि कई कंपनियां इसके कारोबार में कूद चुकी हैं. बीते दो तीन सालों में भारत में एयरप्यूरीफायर के बाज़ार की रफ्तार का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि ज़ीरो से शुरू हुआ या कारोबार आज 150 करोड़ रुपए से ज्यादा तक पहुंच चुका है. इनको बेचने वाली कंपनियों का दावा है कि वर्तमान में इस उद्योग की वार्षिक वृद्धि की दर 45 फीसदी है, जो अगले चार-पांच सालों में बढ़कर 55- 60 फीसद तक पहुंच जाएगी.
Loading...

इसे भी पढ़ेंः दिल्ली एनसीआर में Pollution का असर होगा फेल, आज ही खाने में शामिल करें ये Superfoods

ये तो कुछ भी नहीं है. जिन्हें सांस की तकलीफ है अभी तो सिर्फ वो ही हैं जो इस उत्पाद में दिलचस्पी दिखा रहे हैं या फिर वो वर्ग जो उच्च मध्यमवर्गीय की श्रेणी में आता है. लेकिन जिस तरह से वायु प्रदूषण दिन दोगुनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है, उसे देखकर लगता है कि आने वाले वक्त में एयरप्यूरीफायर का बाजार भारत में ठीक वैसे ही पैर पसारेगा जिस तरह वॉटरप्यूरीफायर ने खुद का विस्तार किया है. 2015 में भारत में साफ पानी बेचने वाले उद्योग का बाज़ार करीब 4,862 करोड़ का था. एक एयरप्यूरीफायर की कीमत 15 हजार से लेकर 95 हज़ार तक जाती है. लेकिन जैसे जैसे इसका बाज़ार बढ़ेगा वैसे वैसे इसकी कीमतो में भी असर पड़ेगा.
क्या एयरप्यूरी फायर असरदायक है.
एयरप्यूरीफायर घर के अंदर की हवा को तो साफ कर देता है लेकिन इस बात को लेकर अभी तक कोई विस्तार से शोध नहीं हुई है कि ये मशीन पहले से सांस की बीमारी से पीड़ित या अस्थमा के मरीज को कोई लाभ पहुंचा सकता है. और अभी तक ये अऩुमान ही लगाए जा रहे हैं कि एयरप्यूरीफायर से निकली हवा में सांस लेने से उम्र बढ़ जाती है. हालांकि ये पूरी तरह सच नहीं है इस पर कोई शोध भी नहीं हुई है. यही नहीं डॉक्टरों को एक खास तरह के एयरप्यूरी फायर को लेकर ज्यादा चिंता है जिसे कुछ कंपनिया बेच रही है ये है आयोनिक एयरप्यूरीफायर. दरअसल इस मशीन से निकलने वाला उपोत्पाद (बाय-प्रोडक्ट) ओज़ोन फेफड़ों को दिक्कतों के लिए जाना जाता है. जिससे गले में खुजली, गंभीर फेफड़े की बीमारी होने का खतरा बना रहता है. वहीं कंपनी दावा करती हैं कि ओज़ोन गले और फेफड़ों को साफ करने में लाभदायक है बस इसका नुकसान तभी होता है जब ओजोन वातावरण में मौजूद धूल के कणों से प्रतिक्रिया करता है.

इसे भी पढ़ेंः  रेसिपी: दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण से रक्षा करेगी ये Drink, सुबह पीकर ही बाहर निकलें

इसके साथ ही ये समझने की भी ज़रुरत है कि जिस रेटिंग सिस्टम के आधार पर इसे बेचा जा रहा है वो भारत के माहौल के हिसाब से माकूल हैं भी या नहीं. बगैर ये समझे और भारत के हिसाब से मानक तय किए बगैर ये जान पाना बेहद मुश्किल है कि हवा कितनी खराब है और उसे साफ करने के लिए हमें किस तरह का मानक अपनाना चाहिए. फिलहाल भारत में जो एयरप्यूरीफायर बेचे जा रहे हैं वो पश्चिमी देशों के माहौल के मुताबिक तैयार हुए हैं, जबकि हमारी इमारतें हमारा वातावरण उससे बिल्कुल जुदा है.

जिस प्यूरीफायर को पहले एक ऐश्वर्य का साधन समझा जाता था, उसने दिल्ली के मध्यमवर्ग के बीच में ज़रूरी चीज़ की तरह खुद को स्थापित कर लिया है. एक कंपनी अपनी मशीन से निकली हवा को प्यार की तरह शुद्ध बता कर बेच रही है तो दूसरा ब्रांड बता रहा है कि उनका प्यूरीफायर मां की तरह ख्याल रखने वाला है. ब्रांड अपनी टेग लाइन दे रहा है कि घर की हवा को रखे एकदम साफ. यानी आप घर में रहे और बचे रहें. अपनी कांच की बनी हुई बड़ी सी खिड़की से बाहर उठती धुंध को देखिये और एक ठंडी सांस लेकर प्यार से अपने प्यूरीफायर की तरफ देखिये और फिर गर्दन घुमा कर बाहर की गिरती हालत पर एक फेसबुक अपडेट लिख डालिए. यही तो हमारा नज़रिया बनता जा रहा है. और बाज़ार चाहता भी है कि आपका ये नज़रिया बरकरार रहे.

बीते दिनों सोनभद्र मे बढते प्रदूषण पर रिपोर्टिंग करने के दौरान मालूम चला कि घने जंगलों से घिरा ये इलाका भयानक प्रदूषण को झेल रहा है. यहां प्रदूषण का स्तर इस कदर बढ़ गया है कि पानी में फ्लोराइड, मर्करी, आर्सेनिक निकल रहा है जो हवा में भी घुलता जा रहा है. और प्रदूषण के स्तर का आलम ये है कि इतने घने जंगल भी हांफने लगे हैं. गांव वालों को बहुत ज्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन उनको ये बता दिया गया है कि आरओ का पानी साफ होता है. बस अब उनकी मांग आरओ लगाने तक सिमट कर रह गई है. इलाके की बिगड़ती हालत पर काम करने वाले लोग उन्हें समझाने की कोशिश भी करते हैं कि आरओ इसका समाधान नहीं है लेकिन उन्हें दिमाग में आरओ की शुद्धता इस कदर घर कर गई है कि वो इस नज़रिये को बदल ही नहीं पा रहे है. सरकार और नीतिनिर्माता भी यही काम करने में लगे हुए है. वो ये समझने को राजी ही नहीं है कि आरओ से निकला हुआ पानी तो उनके ज़मीन के पानी को और ज़हरीला बना रहा है. आप बड़े, मंझोले और अब तो छोटे शहरो में भी चले जाइए आपको लगभग हर घर में आरओ सिस्टम लगा हुआ मिल जाएगा. पुरानी अदाकारा और सांसद से लेकर नए कलाकार तक ये बताने में जुटे हुए हैं कि आरओ लगवा लो पानी साफ हो जाएगा. नदी को और हमारे प्राकृतिक स्रोतों को बचाने की, ठीक करने की कोई ज़रूरत नहीं है. एयरप्यूरीफायर लगवा लीजिए, मास्क पहन लीजिए, जंगल उगाने की कोई ज़रूरूत नहीं है हवा साफ हो जाएगी.

हमारी सरकारों का रवैया भी कुछ इसी तरह का हो गया है. वो नदी को साफ करने से ज्यादा उसके सौंदर्यीकरण में जुटी हुई हैं, नए घाट बन रहे हैं, पुराने घाटों का जीर्णोद्धार हो रहा है और उसके घाट के किनारे बहती हुई नदी को हमने बड़ा नाला मान लिया है जिसमें शहर से जुड़े छोटे नालों को शहर से बाहर ले जाकर जोड़ा जाता है. पेड़ लगाने कि हमारी कवायद कुछ इस तरह की है कि प्रदेश और देश के मंत्री लाखों पौधे लगवा देते हैं, सुनने में लगता है अब तो चारों तरफ ऐसी बयार बहेगी कि जिसे अपने फेफडों से अंदर लेते ही आपके फेफड़े आपको किसी सुपरहीरो की तरह होने का अहसास कराएंगे. और इसके एवज में विकास के नाम पर हमने उन प्राकृतिक एयरप्यूरीफायर को जड़ों से उखाड़ दिया जो कई सालों से हमारी फेफडों को मजबूती दे रहे थे.

खैर घर में प्यूरीफायर लगाइये पानी के लिए भी और हवा के लिए भी. बाकि घर से बाहर निकलिए तो मास्क पहन कर निकलिएगा. प्रदूषण को तो खैर छोड़ दीजिए लेकिन इससे बाज़ार ज़रूर बना रहेगा और हां वैसे भी जब हम हवा खरीद सकते है तो जंगलों की ज़रूरत है भी क्या और जब घर पर शुद्ध हो सकता है तो गंगा जल जैसी शब्दावली तो बेमानी ही है. इसी बीच अखबारों में देश के माननीय प्रधानमंत्री की फोटो थाइलैंड और सिंगापोर के प्रधानमंत्री का हाथ थामे खिलखिलाते हुए छपी है. इसी के ठीक ऊपर दिल्ली की आबोहवा की भी धुंधली झलक है. पता नहीं ये अखबारों की गलती से हुआ या ऐसा प्रतीत हो रहा है गोया देश के मुखियाओं की हंसी शहरों की भयावहता में क्रूरता शामिल कर रही है.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए ट्रेंड्स से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 4, 2019, 2:17 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...