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स्मृति शेष: मालवी मिठास और ध्रुपद लयकारी के पर्याय का न होना...

News18Hindi
Updated: November 9, 2019, 3:40 PM IST
स्मृति शेष: मालवी मिठास और ध्रुपद लयकारी के पर्याय का न होना...
पद्मश्री रमाकांत गुंदेचा को ध्रुपद में महारत हासिल थी.

रमाकांत (Ramakant Gundecha) का नाम संगीत के पुरोधाओं में शुमार है. गुंदेचा को 2012 में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया था.

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(पंकज शुक्ला)

महफ़िल में वे ही होते थे. उनका ध्रुपद होता. श्रोता, नए-पुराने, मुग्धभाव से चैतन्य हो सुनते रहते. राग भूपाली में जब तान भरते 'तू ही सूर्य तू ही चांद, तू ही पवन, तू ही गगन, तू ही आकाश' तब सब एकाकार हो जाते. जैसे वे दो हो कर भी एक थे. अलग अलग व्यक्तित्व मगर माखन मिश्री सा मेल. दूध-पानी सी सहजता. अपनी सीमा में भरपूर बुलंदी पर और युग्म में एक दूसरे के पर्याय. महफ़िल में भी एक जहां खत्म होता दूजा वहां से प्रारम्भ करता. एक खास तरह की रिले रेस सी ज़िंदगी जी रहे थे वे. पूरक भी, समानांतर भी. उन्हें किसी ने अलग माना ही नहीं. मगर, काल ने अब एक भेद कर दिया है. 50-52 सालों से बड़े भाई उमाकांत गुंदेचा की परछाई बन कर रह रहे अनुज रमाकांत गुंदेचा (Ramakant Gundecha) सशरीर हमारे बीच नहीं रहे!

यह यकीन करना ही मुश्किल है कि ध्रुपद की प्रतीक जोड़ी पद्म श्री गुंदेचा बंधु का एक स्तम्भ पंचतत्व में विलीन हो गया. यह सच है कि जीवन के तमाम झंझावातों में जो मिल कर अडिग रहे, कोई बात जिन्हें अलग न कर पाई वह जोड़ी समय के हाथों छली गई. लोग अक्सर उनके नाम और उम्र के मामले में गफलत कर जाते थे. कोई उमाकांत को रमाकांत कह देता तो कभी कोई उमाकांत को अनुज और रमाकांत को अग्रज बता देता. ऐसा अद्भुत साम्य!


मालवा क्षेत्र के उज्जैन में निर्धन मगर संगीत के संस्कार वाले परिवार के सदस्य उमाकांत और रमाकांत गुंदेचा ने अध्ययन साथ शुरू किया. संगीत की दीक्षा साथ ली. जीवनयापन के संघर्ष साथ किए. संग मिल कर ध्रुपद को उच्च आसान पर प्रतिष्ठित किया. उसे लोकप्रिय बनाया. 2004 में साथ गुरुकुल आरम्भ किया. हर साल देश विदेश के 30-40 शिष्यों को ध्रुपद में दक्ष किया. पुरुषों के वर्चस्‍व वाली शैली मानी जाने वाले ध्रुपद का ज्ञान महिलाओं को देने की पहल भी संग ही की. साथ ही पद्मश्री पाया. साथ ही उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर और जिया फरीदुद्दीन डागर के सुयोग्य शिष्य होना सिद्ध किया. वह जोड़ी अब टूट गई!

अब स्वर्गीय हुए रमाकांत जी ने एक मुलाकात में बताया था कि जब से मैंने होश संभाला, तभी से अपने आप को बड़े भाई के साथ पाया. संगीत शिक्षा, पढ़ाई, नौकरी, जीवन संघर्ष और फिर ध्रुपद गायकी जो भी किया साथ-साथ किया. दोनों ने मिल कर ध्रुपद की शास्त्रीय पहचान को यथावत रखते हुए नवाचार किये. अनुज रमाकांत के जाने से कुछ नवाचार अधूरे छूट गए.


गुंदेचा बंधुओं को पहचानने वाले जानते हैं कि संगीत जगत में हिमालयीन ऊंचाई पर पहुंच कर भी ये सहजता और सरलता की संज्ञा बने रहे. जो महफ़िल में गायन के ओजस्वी सूर्य थे वे ही रमाकांत गुंदेचा अपने जीवन में खांटी मालवी मिठास लिए जीते रहे. श्रेष्ठता और सरलता का अचंभित करने वाला योग. जीवन के गणित में काल ने विभाजन किया है. बकौल केदारनाथ सिंह यह जाना सबसे खतरनाक क्रिया है. रमाकांत गुंदेचा के अवसान के रूप में एक जोड़ी ही नहीं टूटी बल्कि ध्रुपद, संगीत, समाज, हम सब ने कुछ ऐसा खो दिया है जिसकी वापसी सम्भव नहीं है. वे जिस तरह जिए अनुकरणीय रहे. उनकी कर्मठता आगत में भी सबक रहेगी.

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First published: November 9, 2019, 3:39 PM IST
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