क्या सच में मुस्लिम महिलाओं को मिला है समानाधिकार?

News18Hindi
Updated: September 10, 2019, 6:28 PM IST
क्या सच में मुस्लिम महिलाओं को मिला है समानाधिकार?
आज के समय में भी जब कोई पुरुष शादी करने जाता है, तो वह ऐसी दुल्हन चाहता है, जो कुमारी यानी अक्षतयोनि हो अर्थात पुरुष औरत को भी चीज ही समझता है.

आज के समय में भी जब कोई पुरुष शादी करने जाता है, तो वह ऐसी दुल्हन चाहता है, जो कुमारी यानी अक्षतयोनि हो अर्थात पुरुष औरत को भी चीज ही समझता है.

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बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं को लेकर एक बड़ा फैसला किया है. विवाह पंजीकरण फॉर्म के पांच नंबर कॉलम में दुल्हन के लिए 'कुमारी' (वर्जिन) शब्द हटाकर 'अविवाहिता' शब्द रखने के लिए कहा गया है. दरअसल निकाहनामा में व्याप्त इस विषमता को दूर करने के लिए वहां के कुछ संगठनों ने 2014 में अदालत की शरण ली थी. उनकी यह शिकायत थी कि निकाहनामा में जिस तरह से सिर्फ औरत की वैवाहिक स्थिति के बारे में पूछा गया है, वह संविधान के अनुच्छेद 27, 28, 31, 32 के अनुसार, समानता की भावना के खिलाफ है. साथ ही यह संविधान-विरोधी भी है. उन संगठनों का यह भी कहना था कि कुमारी शब्द किसी स्त्री की मर्यादा और गोपनीयता पर एक बड़ा प्रहार है.

निकाहनामा में जरूरी संशोधन किए गए

इन दमदार तर्कों के आधार पर निकाहनामा में जरूरी संशोधन किए गए. हालांकि इसके बाद नारी विद्वेषी लोगों की सोच में बदलाव लाने का तरीका क्या होगा ये किसी को नहीं पता क्योंकि आज के समय में भी जब कोई पुरुष शादी करने जाता है, तो वह ऐसी दुल्हन चाहता है, जो कुमारी यानी अक्षतयोनि हो अर्थात पुरुष औरत को भी चीज ही समझता है. लड़की के शिक्षित या मेधावी होने जैसे गुण पुरुषों को उतने आकर्षित नहीं करते. अधिकतर पुरुषों का सोचना है कि अगर लड़की कम पढ़ी-लिखी होगी या तेज-तर्रार नहीं होगी तो पुरुष इसी बहाने उसे दबाकर रख सकेगा.

पत्नियों के मामले में पुरुष परंपरावादी होता है

पुरुष भले ही अपने आप को प्रगतिशील बताने की कोशिश करे लेकिन स्त्रियों और पत्नियों के मामले में वह परंपरावादी ही होता है. वह चाहता है कि उसकी शादी ऐसी लड़की से हो, जिसका इससे पहले किसी लड़के या पुरुष के साथ संबंध न रहा हो. अगर उसे पता चलता है कि उसकी होने वाली पत्नी की स्कूल या कॉलेज के दिनों में लड़कों से दोस्ती थी, तो वह यह मान लेता है कि फिर वह कुमारी बिल्कुल नहीं हो सकती. इन लड़कियों के साथ शादी करने में लड़कों को नहीं बल्कि उनके परिवार वालों को भी आपत्ति होने लगती है. एक ऐसा दौर भी था, जब लड़के वाले दुल्हन के कुमारी होने की परीक्षा भी लेते थे. हो सकता है आज भी कुछ जगहों पर परीक्षा लेने की यह अपमानजनक और स्त्री गरिमा-विरोधी कुप्रथा का प्रचलन हो.

 पुरुषों को कभी किसी तरह की परीक्षा नहीं देनी पड़ी

अगर ऐसी परीक्षा में दुल्हन खुद के अक्षतयोनि होने का प्रमाण देने में चूक जाती थी, तो फिर उस पर अत्याचार किया जाता था. सोचने वाली बात यह है कि इस मामले में पुरुषों को कभी किसी तरह की परीक्षा नहीं देनी पड़ी. समाज में हमेशा से ही यह मान लिया गया है कि पुरुष के अवगुण किसी तरह की श्रेणी में नहीं आते. समाज का ढांचा ही चूंकि पुरुषवर्चस्ववादी है, ऐसे में, पुरुषों के अवगुणों के बारे में कुछ कहने का दुस्साहस किसी में नहीं है. निकाहनामे में बदलाव पर बांग्लादेश में यह कहा जा रहा है कि इसका फॉर्म दरअसल पाकिस्तान के जमाने का ही है और बांग्लादेश के एक अलग राष्ट्र बन जाने के बाद इस फॉर्म में पाकिस्तान की जगह बांग्लादेश लिखने के अलावा और कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया था.
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दुल्हन को मेहर की रकम क्यों चाहिए?

अधिकतर लोगों का मानना है कि कुमारी की जगह अविवाहिता लिख देने से निकाहनामा अब पूरी तरह दुरुस्त हो गया है. हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं है. निकाहनामे के फॉर्म के 13वें, 14वें और 15वें कॉलम को लेकर भी आपत्ति जताई गई है. इसमें पूछा गया है कि दुल्हन को मेहर की रकम क्यों चाहिए? दहेज लड़की वालों की ओर से लड़के को दिया जाता है। जबकि मेहर की रकम लड़के वालों की तरफ से दुल्हन को दी जाती है. अगर दहेज देने पर प्रतिबंध है, तो फिर मेहर की रकम पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया है. ऐसे ही 18वें कॉलम में लिखा है कि पति ने पत्नी को तलाक देने का अधिकार प्रदान किया है या नहीं? अगर हां, तो किन शर्तों पर? यानी पति अगर पत्नी को तलाक देने का अधिकार प्रदान करे, तभी पत्नी तलाक दे सकती है, वरना नहीं. उसमें भी पति की तरफ से जो-जो शर्तें रखी जाएंगी उसको मानकर ही कोई पत्नी अपने पति को तलाक दे सकती है.

पत्नी को तलाक देने के मामले में ऐसी कोई शर्त नहीं 

हालांकि पति द्वारा पत्नी को तलाक देने के मामले में ऐसी कोई शर्त नहीं है. पत्नी की कोई शर्त माने बगैर ही पति उसे तलाक दे सकता है. यही नहीं, उसे पत्नी से तलाक देने का अधिकार हासिल करने की जरूरत भी नहीं है. ये सारी बातें विषमता नहीं तो और क्या है? आपको बता दें कि पुरुष 18वें कॉलम को भरने की जरूरत महसूस नहीं करते. इसका मतलब साफ है कि कोई अपनी होने वाली दुल्हन को तलाक देने का अधिकार नहीं देता. अगर कोई स्त्री अपने पति को तलाक देना चाहती है, तो इस्लामी कानून में यह संभव नहीं है. अगर ऐसा है तो उसे अदालत की शरण में जाना होगा लेकिन वहां भी तलाक देने के लिए उसे
सही और ठोस कारण बताने होंगे.

पति अपनी पत्नी को आराम से तलाक दे सकता है

पत्नी अगर किसी दूसरे पुरुष से प्यार करती है और उससे शादी करना चाहती है, तो इस बात के आधार पर भी उसे तलाक नहीं मिलेगा. लेकिन अगर पति किसी दूसरी महिला से प्यार करता है और उससे शादी करना चाहता है, तो इस आधार पर वह अपनी पत्नी को आराम से तलाक दे सकता है. निकाहनामे के 21 वें और 22 वें कॉलम में दूल्हे को बहुविवाह का अधिकार है लेकिन दुल्हन को ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया गया है. विवाह कानून में इस तरह की विषमताएं क्यों बरकरार हैं, यह एक बड़ा प्रश्न बनकर रह गया है. भारत में तत्काल तीन तलाक के खिलाफ कानून बन जाने के बाद बहुत सारे लोगों ने यह मान लिया है कि मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिल गया है.

धर्म महिलाओं को समानाधिकार देता ही नहीं

ऐसे ही, बांग्लादेश में उच्च न्यायालय के निर्देश पर मुस्लिम विवाह पंजीकरण फॉर्म से कुमारी शब्द हटाकर अविवाहिता कर देने से बहुत से लोगों ने मान लिया है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिल गया है. यह धारणा पूरी तरह से गलत है. धर्म पर आधारित पारिवारिक कानून को पूरी तरह खत्म किए बिना महिलाओं को बराबरी का अधिकार कभी मिल ही नहीं सकता. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि धर्म महिलाओं को समानाधिकार देता ही नहीं है. वैसे देखा जाए तो निकाहनामे में एक बदलाव भी बहुत बड़ा बदलाव होता है जिसके लिए अदालत का शुक्रिया अदा करना तो बनता ही है.

अमर उजाला में छपे तस्लीमा नसरीन के लेख के आधार पर 

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First published: September 10, 2019, 6:28 PM IST
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