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स्त्री-पुरुष का यह फर्क हमें नहीं गढ़ने देगा एक नया समाज…

News18Hindi
Updated: October 22, 2019, 2:45 PM IST
स्त्री-पुरुष का यह फर्क हमें नहीं गढ़ने देगा एक नया समाज…
लैंगिक भेदभाव का समाज पर प्रभाव

मकान को घर बनाने की जिम्मेवारी तो महिलाएं निभाती हैं, पर जब फैसला करने की बारी आती है तो उस पर मर्दों का कब्जा दिखता है.

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  • Last Updated: October 22, 2019, 2:45 PM IST
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(अनुराग अन्वेषी)

भारतीय परंपरा में पर्वों का खास महत्व है. यह निर्विवाद है कि यहां के लोग उत्सवधर्मी हैं. कई बार हम उत्सवों में डूब जाते हैं और धर्मों के निहितार्थ पकड़ने में चूक जाते हैं. यह दौर कुछ ऐसा ही है जहां हमसब चूकते जा रहे हैं.
दुर्गापूजा में हमने मां दुर्गा की आराधना की. शक्ति की कामना की. अब इस माहौल से हम बाहर निकल चुके हैं. बढ़ चले हैं दीपावली की ओर जहां लक्ष्मी और गणेश की पूजा होगी. लक्ष्मी (धन) की कामना करते हुए हम वसंत ऋतु का स्वागत करेंगे और पंचमी के दिन मां शारदे की पूजा करेंगे. यह बात याद दिलाने की नहीं कि मां शारदा विद्या की देवी के रूप में जानी जाती हैं. यहां यह ध्यान दिलाना जरूरी लगता है कि पर्वों में हमने स्त्रीशक्ति को, उसके महत्व को स्वीकारा है. धर्म-शास्त्रों में हमने स्त्री का अस्तित्व देवी के रूप में स्वीकार किया है, पर उसी देवी की प्रतिनिधियों के साथ यह समाज आज कैसा सलूक कर रहा है - यह रोज छपने वाली खबरों में दिखता है.

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भाषा के स्तर पर गौर करें तो स्त्रीलिंग और पुल्लिंग शब्द जब साथ रहते हैं तो अधिकतर जगह पहले स्त्रीलिंग शब्द का इस्तेमाल करते हैं. मसलन, माता-पिता, देवी-देवता, लक्ष्मी-गणेश... नातेदारी की चर्चा करते वक्त अक्सर हम कहते हैं ननिहाल से लौटे या नानीघर गए. यह उसका मायका है. यानी, हमने भाषा के स्तर पर अपनी सामाजिक बुनावट में घर का स्वामित्व स्त्री के हवाले किया है. पर ध्यान दें कि भारतीय समाज के अधिसंख्य घरों में तमाम फैसले पुरुष करता है. मतलब यह कि मकान को घर बनाने की जिम्मेवारी तो महिलाएं निभाती हैं, पर जब फैसला करने की बारी आती है तो उस पर मर्दों का कब्जा दिखता है.

आखिर इसकी वजह क्या है? दरअसल, यह हिंदुस्तानी मर्दों की साजिश का नतीजा है. आदिम जमाने में जब शिकार और कंद-मूल पर ही हम निर्भर थे, तो बलिष्ठ शरीर का तर्क देकर मर्द शिकार पर निकले होंगे. हो सकता है कि यह तर्क सचमुच सहयोग की भावना के तहत ही उपजा हो. पर बाद में इसे हमने परंपरा का रूप दिया और यह तय कर लिया कि देहरी के अंदर का काम महिलाओं की जिम्मेवारी और बाहरी मोर्चे पर मर्द रहेंगे. दरअसल, यह मर्दों की असली साजिश थी कि स्त्रियों को आर्थिक मामले में आत्मनिर्भर न होने दिया. ध्यान दें कि सिलाई-कटाई-बुनाई का काम घर में महिलाओं के जिम्मे छोड़ा गया, पर जैसे ही यह काम देहरी से निकलकर बाजार का हिस्सा बना, उस पर मर्दों ने कब्जा किया. घर में खाना बनाने की जिम्मेवारी महिलाओं के जिम्मे रही यह मानकर कि यह श्रम आर्थिक रूप से अनुत्पादक है. पर जैसे ही खाना बनाने का काम रोजगार से जुड़ा, उसे हम मर्दों ने हथिया लिया. यानी मर्दों ने बड़ी चालाकी से परंपरा का हवाला देते हुए स्त्रियों को देह-दिमाग से कमजोर बताने में कोई कोताही नहीं बरती, साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से गुलाम बनाए रखने के हर अवसर का भरपूर इस्तेमाल भी किया.

हालांकि हालिया वर्षों में स्त्रियां भारतीय मर्दों की इस साजिश का तोड़ तलाशने लगी हैं. वे स्वावलंबन, स्वाभिमान और अपनी पहचान के प्रति सजग हुई हैं. पर मर्द अब भी अपने दुराग्रह पर अड़े हैं. उनकी निगाह में स्त्रियां दोयम दर्जे की नागरिक हैं. मर्दों के बीच यह नजरिया क्यों पनपा? समानता की बात कहने वाले मर्द आखिर अपनी सामंती विचारधारा को क्यों नहीं मार पाए? दरअसल, यह हमारी शुरुआती शिक्षा का नतीजा है. कहते हैं कि घर-परिवार ही किसी बच्चे का प्रारंभिक विद्यालय होता है. यहीं उसकी परवरिश होती है. अपने सोचने-समझने और धारणाओं की बुनियाद उसे अपने परिवार और समाज से मिलती है.
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जब बच्चा पैदा होता है तो वह शरीर से स्त्री या पुरुष तो होता है पर उस वक्त वह मन से वह न स्त्री होता है न पुरुष. बल्कि कहना चाहिए कि उसके भीतर स्त्री-पुरुष दोनों तत्व भरपूर होते हैं. कोई पुरुष शरीर वाला बच्चा खुद को पुरुष बनाने के लिए बचपन में ही अपने भीतर की स्त्री को मारना शुरू करता है और तब वह पुरुष के रूप में अपनी पहचान बनाता है.

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ठीक इसी तर्ज पर कोई स्त्री शरीर वाली बच्ची अपने भीतर के पुरुष को मारकर ही खुद को स्त्री बनाती है. जीवन में आपने ढेर सारे ऐसे पुरुषों को देखा होगा जिनकी बात और जिनका व्यवहार स्त्रियों जैसा रहा है. दरअसल, इन पुरुषों के भीतर पुरुषतत्व के मुकाबले स्त्रीतत्व ज्यादा बचा रह जाता है. ठीक ऐसे ही कई महिलाएं दिख जाएंगी जिनकी क्रूरता और कठोरता आपको उनके भीतर बसे मर्द की याद दिलाएंगी. ऐसी महिलाओं के भीतर पुरुषतत्व ज्यादा बचे रह जाते हैं.
आखिर कोई स्त्री या कोई पुरुष कैसे अपने भीतर बसे पुरुषतत्व या स्त्रीतत्व की हत्या करती या करता है? इस सवाल का एक जवाब तो यह भी है कि यह हत्या सहज नहीं होती, परंपराओं के नाम पर सहज रूप से होती है, गलत नीतियों से होती है, हमारी नासमझी और नादानी से होती है.

स्त्री-पुरुष का भेद हमें बचपन से घुट्टी की तरह पिलाया जाता है. जब हम मात्राएं जोड़कर शब्द बनाना सीख रहे होते हैं, जब हम शब्द जोड़कर वाक्य बनाने का अभ्यास कर रहे होते हैं... उसी समय हमें बिन पढ़ाए ही स्त्री-पुरुष में अंतर करना सिखाया जाता है. याद करें अपने छुटपन के दिनों को जब आप मात्राएं और शब्द जोड़कर वाक्य बनाना और पढ़ना सीख रहे थे... हम अपनी किताबों में छपे वाक्यों को जोर-जोर से बोलकर पढ़ा करते थे... सी..ता र..सो..ई में जा. रा..म गें..द खे..ल.

आज भी इसी तरह के वाक्य बच्चे पढ़ रहे हैं. यानी हमारे अवचेतन में यह बात घुट्टी की तरह पिलाई गई कि सीता का काम रसोई में जाना है और राम का काम गेंद से खेलना. हमने अब तक कोई ऐसी किताब नहीं देखी जिसमें सिखाया जा रहा हो कि राम भी रसोई में जाता है या उसे जाना चाहिए. सीता का काम केवल रसोई में जाना नहीं, उसे मैदान में खेलने का भी हक है.

बाद के दिनों में लड़कियां जब थोड़ी बड़ी हुईं तो उन्हें नसीहत मिलने लगी कि अब तू बड़ी हो चुकी है, जोर से मत हंसना... उछल-कूद करना बंद कर... बहस न लड़ा. इस तरह लड़कियों के भीतर एक बाउंड्री घर करती गई. उन्हें चेताया और दिखाया गया कि उनका दायरा क्या है. उस घेरे से बाहर कदम निकलने का मतलब बदचलनी है.

अफसोस है कि जवान होती पीढ़ी इसे अनजाने ही स्वीकारती गई और हमारी मनोदशा पुरुष और स्त्री के बीच बंटती गई. हमने न स्त्री को समझने की कोशिश की, न स्त्रियों ने पुरुषों को. इस तरह खाई इतनी बढ़ी कि इस मर्दवादी समाज ने स्त्री को महज उपभोग की वस्तु के रूप में देखना शुरू कर दिया. आज भी ये हिंदुस्तानी मर्द स्त्रियों के प्रति चाहे जितना उदार दिखने की कोशिश कर लें, उनकी मानसिकता वही पारंपरिक भारतीय मर्द वाली होती है.

क्या अच्छा होता कि पैदा होने के बाद हम अपने भीतर की स्त्री को बचाए रखते, उनकी कोमलताओं के साथ बड़ा होते और आज स्त्री-पुरुष के बीच किसी तरह का कोई फर्क न महसूस करते.

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First published: October 22, 2019, 1:22 PM IST
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