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23 बरस की अदिति को डाउन सिंड्रोम है और वे मुंबई में एक रेस्तरां चलाती हैं

23 बरस की अदिति को डाउन सिंड्रोम है और वे मुंबई में एक रेस्तरां चलाती हैं

अदिति वर्मा को डाउन सिंड्रोम है

अदिति वर्मा को डाउन सिंड्रोम है

जिस उम्र में बच्चे दौड़ने-बतियाने लगते, अदिति ने तुतलाना भी शुरू नहीं किया था. ढाई साल की उम्र में ओपन हार्ट सर्जरी हुई. स्कूल जाना शुरू किया तो बच्चे मजाक बनता. डाउन सिंड्रोम के मरीज को इससे अलग तरीके से ट्रीट करना कम ही लोग जानते हैं. अदिति अब 23 बरस की हैं और मुंबई में एक रेस्तरां चलाती हैं.

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    शुरुआत पापा के दफ्तर में चाय बनाने से हुई. मैं दफ्तर के सारे लोगों को दोपहर में चाय बनाकर पिलाती. कोई-कोई कहता कि मेरी चाय के लिए ही वे काम पर आते हैं. बात हंसी में कही जाती लेकिन वक्त के साथ मेरा किचन से नाता गहराता गया.

    लोगों से ठीक से बात नहीं कर पाती थी, लेकिन रसोई के मसाले मुझसे बतियाने लगे. 2016 में मुंबई में एक रेस्तरां खुला जिसके मालिक को डाउन सिंड्रोम था. वो रेस्तरां मालिक मैं हूं.

    मुंबई की अदिति वर्मा डाउन सिंड्रोम से ग्रसित हैं यानी वो आनुवंशिक बीमारी जिसमें बच्चे की शारीरिक और मानसिक बढ़त पर असर होता है. जिस उम्र में सारे बच्चे चलते-बोलते, उसमें अदिति बस टुकुर-टुकुर देखा करतीं. जिस बीमारी के कारण बच्चे घर के एक कमरे तक सीमित हो जाते हैं, उसमें वे मुंबई में एक रेस्तरां चला रही हैं. मिलिए, अदिति से.

    बचपन की जो धुंधली-ताजी यादें हैं, उनमें लोगों की सहानुभूति याद आती है या फिर मजाक उड़ाना. मुझे दूसरे बच्चों से अलग माना जाता. पेरेंट्स के साथ जयपुर से पुणे और फिर मुंबई आई. यहीं स्कूल गई. मां-पापा दोनों वर्किंग थे. मैं लौटती तो घर पर ताला होता. खुद ही घर खोलती और खुद ही खाना गर्म करके खाती.

    पेरेंट्स ने हमेशा मुझसे नॉर्मल बच्चों की तरह ही व्यवहार किया.

    मुझे अब भी याद है, जब मैं पहली बार दूध और अंडे लेने अकेली बाजार गई थी. मैं ठीक से बोल नहीं पाती हूं. जो लोग रोज सुनते हैं, वे आसानी से समझ पाते हैं लेकिने पहली बार सुनने वाले को मुश्किल से बात समझानी होती है. मैंने धीरे-धीरे कई बार समझाकर सौदा लिया. आसपास सारे लोग मुझे अलग तरह से देख रहे थे. कोई अपनी किसी तकलीफ की वजह से उतना नहीं मरता, जितना लोगों की नजरों की वजह से. मैं घर लौटकर देर तक उदास रही लेकिन फिर बार-बार जाने लगी ताकि अपने डर और शर्म से बाहर आ सकूं.

    बहुत बाद में जाना कि मेरे पीछे हमेशा घर का कोई सदस्य रहता था.

    स्कूल पूरा होने के बाद मैं पापा के दफ्तर जाने लगी. वहां डाटा एंट्री का काम करती लेकिन जल्द ही ऊबने लगी. काम करते हुए देखती थी कि वहां आसपास के दफ्तरों में चाय देने के लिए एक चायवाला आता. सब उसकी चाय की खूब तारीफ करते. मैं भी कोई ऐसा ही काम करना चाहती थी. मैंने पापा से इजाजत ली और दफ्तर के किचन में सबके लिए चाय बनाने लगी. सर्व करने का काम भी खुद ही करती. धीरे-धीरे मुझे किचन में मजा आने लगा. मैं घंटों यू-ट्यूब पर रेसिपी के वीडियो देखती, फिर घर में बनाने की कोशिश करती.

    रसोई के मसाले बाहरी दुनिया से ज्यादा मेरे दोस्त साबित होने लगे. मेरे पकाया खाना, किसी नॉर्मल इंसान के पकाए खाने जितना ही, बल्कि कई बार ज्यादा मजेदार होता. काफी वक्त के बाद मैंने जाना कि मुझे यही करना है.

    2016 में घरवालों की मदद से मैंने मुंबई में एक रेस्तरां खोला. शुरुआत में पकाना, ऑर्डर लेना, सर्व करना जैसे सारे काम खुद करती. पहले लोग सिर्फ ये देखने आते कि डाउन सिंड्रोम का मरीज भी कैसे रेस्तरां चला सकता है! धीरे-धीरे उनकी हैरानी की जगह मेरे पकाए खाने ने ले ली. अब मेरे रेस्तरां में दो और लोग काम कर रहे हैं. सपने की ओर बढ़ने की शुरुआत घरवालों की मदद से की लेकिन चाहती हूं कि खुद के बूते एक फाइव-स्टार होटल खोल सकूं.

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    Tags: Mumbai

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