देश की पहली महिला ट्रैवलर, जिसने ठान लिया तो यात्रा का रिकॉर्ड बना दिया: पढ़ें पूरा इंटरव्यू

देश की पहली महिला ट्रैवलर, जिसने ठान लिया तो यात्रा का रिकॉर्ड बना दिया: पढ़ें पूरा इंटरव्यू
अपनी एक यात्रा के दौरान फोटो क्लिक करतीं डॉ. कायनात काज़ी.

"एक बार लद्दाख़ में हाई एल्टिट्यूड सिकनेस हुई और ऑक्सीजन लगी, दो दिन आर्मी अस्पताल में रही"

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ट्रैवल करना जितना दिलचस्प है, उतना कठिन भी. खासकर एक महिला जब ये ठान ले कि उसे ट्रैवलर बनना है. देर रात ट्रैवलिंग, अंजान भीड़ और राज्य दर राज्य भाषाई अंतर. लेकिन एक हैं देश की सोलो महिला ट्रैवलर डॉ. कायनात काज़ी, जिन्होंने ठान लिया तो यात्रा का रिकॉर्ड ही बना डाला. वह अब तक डेढ़ लाख किलोमीटर की यात्रा कर चुकी हैं. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर जब हम उन महिलाओं की बात करते हैं, जिन्होंने लीक से हटकर जीवन में कुछ चुना है तो इसमें डॉ. काज़ी का नाम भी  शुमार होता है. इस मौके पर पढ़ें उनका खास इंटरव्यू...

Q-1 आप देश की पहली महिला सोलो ट्रेवलर हैं. ये घूमने-फिरने का शौक आपको कैसे लगा और देश की इतनी यात्रा करने के बाद आप क्या पाती हैं?

मैं बचपन से ही ट्रैवलर बनना चाहती थी. अपनी किताबों में जब फाह्यान और ह्वेनसांग की तस्वीरें देखती थी तो आश्चर्य से भर जाती थी. ये दूर देश से आने वाले यात्री कितने अनोखे होते होंगे. कितने साहसी होते होंगे जो अनजानी जगहों की यात्रा पर निकाल पड़ते थे. इन यायावरों द्वारा लिखी जानकारियों के आधार पर ही दुनिया के लोग एक दूसरे को जान पाए. उनकी कहानियां मुझे बहुत आकर्षित करती थीं लेकिन साथ ही एक सवाल भी मन में उठता था. इतिहास में जितने भी यायावर हुए हैं, जैसे फाह्यान, ह्वेनसांग, इब्ने बतूता, मार्कोपोलो, वास्कोडिगामा आदि वह सभी पुरुष हुए हैं. इन में से कोई भी महिला नहीं थी. जबकि एक महिला यायावर के नज़रिए से दुनिया कुछ अलग ही दिखाई देगी. उसका नजरिया बहुत गहराई वाला होगा. उसका नजरिया ज्यादा संवेदनशील होगा. तभी यह बात मन में घर कर गई थी कि मुझे यायावर बनना है.



आज मैं देश और दुनियां में लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर की यात्रा कर चुकी हूं. देश में 20 राज्य देख चुकी हूं. आज कह सकती हूं कि अपने देश को थोड़ा थोड़ा समझने लगी हूं. उसकी आत्मा से जुड़ने लगी हूं. गाँव देहात, दूर दराज़ के दुर्गम स्थानों पर रहने वाले लोगों की समस्याएँ और उनके जीवन की कठिनाइयों को नज़दीक से देखने के कारण ज्यादा संवेदनशील हुई हूं. यात्राओं ने मुझे प्रक्रति से जोड़ा है. मेरे अन्दर की सारी नकारात्मकता को हर लिया है. प्रकृति और मानवता के प्रति ज़्यादा कृतज्ञता महसूस करती हूं. ख़ुश रहती हूं. देश की विविधता पर मोहित हूं.



Q-2 एक ट्रैवलर के तौर पर यात्रा करना और यूं ही किसी जगह घूमने जाना, क्या इन दोनों में फर्क है?

एक ट्रैवलर और टूरिस्ट में बहुत फ़र्क होता है. एक ट्रैवलर हमेशा एक परपज़ (उद्देश्य ) के लिए यात्रा करता है जबकि एक टूरिस्ट आनंद विनोद और जीवन की एकरसता को तोड़ने के लिए यात्रा करता है. जैसे मैं यात्रा करती हूं. मेरी यात्रा का एक उद्देश्य है. मैं अपनी यात्राओं द्वारा ये साबित करना चाहती हूं कि भारत महिलाओं के लिए उतना ही सुरक्षित है जितना कि कोई और देश. यहाँ से लोग भाषा, वर्ण, धर्म और जाति से ऊपर उठ कर खुले दिल से सब का स्वागत करते हैं. अतिथि देवो भवः की भावना भारत के लोगों में कूट कूट कर भरी है.

एक ट्रैवलर जब यात्रा पर निकलता है तो बंधनों के बिना यात्रा करता है. अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकाल यात्रा करता है और कुछ भी अप्रत्याशित होने के लिए तयार रहता है. जबकि एक टूरिस्ट अपने रेसेर्वेशंस(बंधनों) के साथ यात्रा करता है. उसका कोई निश्चित उद्देश्य नहीं होता. वो ज़रूरी नहीं कि केरल जाए तो वहां का खाना भी ट्राई करे वह केरल में भी आलू का परांठा खाना चाहेगा. जबकि एक ट्रैवलर कहीं भी कुछ भी खा सकता है. एक ट्रैवलर के लिए मंजिल से ज़्यादा रास्ते महत्व रखते हैं. उसके लिए मंजिल के आकर्षण के बजाए यात्रा का आकर्षण होता है.

अपनी यात्राओं के जरिए लोगों को देश की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू करने वाली डॉ. कायनात को कई सम्मान मिल चुके हैं.


Q-3 डिजिटल के दौर में गूगल पर लोगों को किसी भी जगह के बारे में हर जानकारी मिल जाती है. इसके अलावा देश की प्रसिद्ध जगहों के बारे में कई सालों से लिखा जा रहा है. ऐसे में आप किस तरह अपनी जानकारी में नयापन दे पाती हैं?

मेरी कोशिश होती है कि मैं अपने पाठकों को वह जानकारी उपलब्ध करवा सकूँ जो गूगल नहीं करवाता. आज भी हमारे देश में ऐसे हजारों अनछुए डेस्टिनेशन हैं जिनके बारे में लोगों को कुछ खास जानकारी नहीं है. मैं ऐसे ही छुपे हुए हीरों की तलाश कर अपने पाठकों तक पहुंचाती हूं. मैं रूटीन टूरिस्ट डेस्टिनेशन के बारे में नहीं लिखती, और कभी लिखती भी हूं तो उस जगह के आसपास के कुछ और आकर्षणों की चर्चा करती हूं जिसे लोग नहीं जानते. आज गूगल पर भले ही जानकारियों का समंदर फैला हुआ है लेकिन हिंदी में प्रमाणिक जानकारियां अभी भी बहुत कम हैं. जबकि लोग अपनी मात्रभाषा में पढ़ना अधिक पसंद करते हैं. आप गूगल पर हिंदी में जो जानकारी एक वेबसाइट पर देखेंगे वही अगली दस वेबसाइट पर पाएँगे. मौलिक लेखन बहुत कम है. सब कॉपी पेस्ट कर रहे हैं. ऐसे में मेरा ब्लॉग हिंदी का पहला ट्रेवल फोटोग्राफी ब्लॉग है जहाँ भारत के पर्यटन से जुड़ी प्रमाणिक जानकारी अच्छी तस्वीरों के साथ उपलब्ध है.

Q-4 एक महिला के तौर पर सोलो ट्रेवलर होना कितना चुनौती पूर्ण है. ये जबकि तब शायद आप लेट नाइट ट्रैवल करती हों, जगह-जगह रुकती हों. भाषाई बदलाव या फिर कई बार ऐसे लोगों के बीच में रुकना या जाना जिन्हें आप जानती तक नहीं?

सोलो ट्रेवल बोरन्विल चोकलेट जैसा होता है. “यू हैब टू अर्न इट” यानि आप पहले दिन ही सोलो ट्रैवल नहीं कर सकते. आपको इसके लिए ख़ुद को तैयार करना होगा. अकेले यात्रा करना जहाँ आपको ढ़ेर सारी आज़ादी देता है वहीं बहुत सारी ज़िम्मेदारी भी आपकी ही होती है. जिसमे आपकी सुरक्षा सर्वोपरि है. मैं बहुत बार लेट नाइट ट्रैवल करती हूं लेकिन उसमे मैं हमेशा अपने परिवार के साथ टच में रहती हूं. अपनी लोकेशन साझा करती हूं. किसी अनजान जगह पर पता पूछने के लिए लोकल शॉप कीपर या पुलिस ऑफिसर का सहारा लेती हूं. अनजाने लोगों के बीच रुकने का सवाल है तो इसमें केवल एक चीज़ काम करती है और वह है आपकी बेसिक इंस्टिंक्ट. आपको लगता है कि सब ठीक है तो ठीक है, लेकिन  अगर आपको एक बार भी खटका होता है तो आप अपने अन्दर की आवाज़ सुनें और वह स्थान तुरंत छोड़ दें. अनजाने लोगों के साथ पार्टी न करें. टाइम का ध्यान रखें.

डॉ. कायनात काज़ी.


Q-5 एक लाख किलोमीटर की यात्रा के दौरान वो कौन से दो कठिन पल हैं, जब आपको कभी डर लगा हो.

सच कहूं तो ऐसा कभी नहीं हुआ कि मुझे कभी डर लगा हो. हम साक्षर हैं, वेल कनेक्टेड हैं फिर डर किस बात का. मेरे पति ने मेरी यात्राओं के शुरुवाती दौर में एक सीख दी थी जोकि आज भी मेरे बहुत काम आती है. “यात्रा में अगर ये दो चीजें आपके पास हैं तो आप किसी भी विषम परिस्थिति से निपट सकते हैं. एक- जेब में पैसे हों, दूसरा होश ठिकाने हों. अगर ये दोनों चीजें आपके पास हैं तो आप हर मैदान फ़तेह कर सकते हैं. मैं आज भी इस बात को नियम से फॉलो करती हूं.

ऐसा नहीं है कि कभी कोई विषम परिस्थिति नहीं आई, एक बार लद्दाख़ में हाई एल्टिट्यूड सिकनेस हुई और ऑक्सीजन लगी, दो दिन आर्मी अस्पताल में रही, एक बार पांच माह प्रेगनेंट थी और कश्मीर के गुलमर्ग में बर्फ के तूफान में फंसी, लोकल लोगों ने बाहर निकाला.

लेकिन मैं इन अनुभवों को बुरा अनुभव नहीं मानती, मैं इन्हें यात्राओं में मिलने वाले सर्टिफिकेशन के लेवल मानती हूं. आप जब भी किसी विषम परिस्थिति में होंगे आप तभी अपनी शक्ति और योग्यता का इस्तेमाल करेंगे. और जब आप उस से बाहर निकाल आएंगे तो आपका आत्मविश्वास एक अलग लेवल पर पहुँच जाएगा.यात्राएं आपको साहसी बनाती हैं.

Q-6 अगर किसी को ट्रैवलिंग में करियर बनाना है तो उसे क्या करना चाहिए?

मैं बहुत स्पष्ट कहना चाहूंगी. अगर आपको लगता है कि बहुत पैसे कमा कर आप आनंद का अनुभव करेंगे तो यह करियर ऑप्शन आपके लिए नहीं है. इसमें बहुत पैसे नहीं हैं लेकिन आनंद बहुत है. अगर आप मस्त मौला फक्कड़ किस्म के जीव हैं तो आपको ट्रैवलर बनना चाहिए. अगर आपको पैसे कमाने हैं तो बिज़नेस  कीजिये. यात्राएं आपको एक अलग क़िस्म का धनवान बनाती हैं.
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