उसकी शादी के वक्त मेरी पीठ सीधी, बाल काले थे! बच्चे के इंतज़ार में शरीर झुर्रियों से भर गया

जिंदगी के 80 पड़ाव पार कर चुकी ज़ोहरा बेग़म के लिए इस वक्त औलाद की औलाद से बढ़कर कुछ नहीं. पांच बार गर्भपात के बाद उनकी बेटी को हाल ही में पहली औलाद हुई. इतनी उम्र में, जहां किलोमीटरों का फासला भी थकान से भर देता है, जोहरा की आंखों की पुलक किसी की भी थकान उतार सकती हैं. पढ़ें, ज़ोहरा की कहानी.

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Updated: January 14, 2018, 9:38 AM IST
उसकी शादी के वक्त मेरी पीठ सीधी, बाल काले थे! बच्चे के इंतज़ार में शरीर झुर्रियों से भर गया
बेटी की औलाद के इंतजार में शरीर झुर्रियों से भर गया (image: GMB Akash)
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Updated: January 14, 2018, 9:38 AM IST
वो जब इस दुनिया में आया नहीं था, तब से ही उसकी नन्ही, टिमटिमाती आंखें ख्वाबों में आया करतीं. सोचती कि कैसा होगा वो वक्त, जब मैं उसे अपने हाथों में थामूंगी. जब उसकी गदबदी उंगलियां मुझे छुएंगी. जब वो नींद में कुनमुनाते हुए मुस्कुराएगा. अब मैं उसे...अपने नाती को देखने जा रही हूं. मुझे घबराहट हो रही है कि कहीं मेरी ट्रेन न छूट जाए.

जिंदगी के 80 पड़ाव पार कर चुकी ज़ोहरा बेग़म के लिए इस वक्त औलाद की औलाद से बढ़कर कुछ नहीं. पांच बार गर्भपात के बाद 45 साल की उम्र में उनकी बेटी ने पहले बच्चे को जन्म दिया.

इतनी उम्र में, जहां किलोमीटरों का फासला भी थकान से भर देता है, जोहरा की आंखों की पुलक किसी की भी थकान उतार सकती हैं. पढ़ें, ज़ोहरा की कहानी.



एक मां के लिए उसकी औलाद से बढ़कर कुछ नहीं होता. पहले मैं भी यही मानती थी. वक्त ने मेरी सोच को सिर-से-पैर तक बदलकर रख दिया. मेरी बेटी हुई तो उसकी कंघी-चोटी करते हुए, उसे खिलाते-पिलाते याद रहता कि बड़ी होने पर ये मुझे छोड़कर चली जाएगी. उससे बेटों से ज्यादा लाड़ जताती. उसकी शादी के बाद घर एकदम सूना हो गया. मां के लिए उसकी बेटी से ज्यादा पक्की सहेली कोई नहीं. अपने अकेलेपन के बावजूद इसकी तसल्ली थी कि वो अपने पति के साथ खुश है.

बेटी का एक दिन फोन आया. वो सुबक रही थी. बहुत देर बाद उसने बताया कि वो पेट से थी. मैंने उसे तसल्ली दी और कहा कि अल्ला मियां जल्दी सब ठीक करेंगे. लेकिन नहीं. ऐसा फिर हुआ.

मांएं अपने नाती-नवासी के आने की आहट पर खुश होती हैं, मैं डरी हुई रहती. बचपन में मेरे गांव में कोई मुसीबत आने पर जोर-जोर से कुछ बजाया जाता ताकि सबको खबर लग जाए. मेरे दिल में बचपन का वही गांव रहता, हर वक्त जैसे कुछ जोरों से बजते हुए मुझे चेतावनी देता. ऐसे एक-एक कर उसके पांच बच्चे गिर गए.



उसकी शादी की थी, तब मेरी पीठ सीधी और बाल काले हुआ करते थे, इंतजार में शरीर झुर्रियों से भर गया.

डॉक्टरों ने चेताया कि अब बच्चा लाने की कोशिश में जान भी जा सकती है. बेटी के पति ने भी उसे संभालने-समझाने की कोशिश की लेकिन उसपर जैसे धुन सवार थी. पेट में बच्चा आने पर इस बार उसने अड़ोस-पड़ोस को भनक नहीं पड़ने दी. मैं हर दिन दुआ पढ़ती. जाने कितने ही पीर-बाबाओं के चक्कर काटती रही कि नौ महीने ठीक से गुजरें. अल्ला मियां ने आखिरकार इस बूढ़ी की दुआएं कुबूल कर लीं.

मैं पहली बार अपने नाती को देखने जा रही हूं. रातभर मुझे नींद नहीं आई. छोटा बेटा साथ जा रहा है, उसे भी अपने साथ जगाती रही. अब भी न मुझे नींद आ रही है, न भूख लगती है. स्टेशन में इतनी भीड़ होती है. बेटे को इधर-उधर जाने नहीं दे रही कि कहीं उससे बिछुड़कर छूट न जाऊं.

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बूढ़ी हूं न, मेरा दिल भी मेरी उम्र जितना जिद्दी है. अब जब उस नन्ही सी जान और बेटी को अपनी बांहों में भरूंगी, तभी दिल को सुकून मिलेगा.

(ये कहानी hindi.news18.com ने फेसबुक पेज GMB Akash की इजाज़त से ली है.)
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Updated: June 16, 2018 09:57 AM ISTक्‍या आपको पता है माइग्रेन एक लाइफ-स्‍टाइल डिजीज है?
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