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एलोरा की शिक्षिकाओं ने पढ़ाया अनुशासन का पाठ

News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 8:36 PM IST
एलोरा की शिक्षिकाओं ने पढ़ाया अनुशासन का पाठ
यहां 261 बच्चों में 70 मुस्लिम परिवार से हैं.

यह स्कूल बच्चों की आपसी मित्रता, उनके बीच परस्पर सहयोग और सक्रिय भागीदारिता के कारण चर्चा में है, जबकि दो साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी.

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  • Last Updated: December 3, 2019, 8:36 PM IST
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(शिरीष खरे)

महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले से करीब 30 किलोमीटर दूर कन्नड तहसील में हैं यूनेस्को की विश्व प्रसिद्ध धरोहर एलोरा (वेरुल) की गुफाएं. यहां से चंद कदमों की दूरी पर स्थित सरकारी स्कूल की शिक्षिकाएं बच्चों को अनुशासन के पाठ पढ़ाने के लिए विशेष तरीके अपना रही हैं. यह स्कूल बच्चों की आपसी मित्रता, उनके बीच परस्पर सहयोग और सक्रिय भागीदारिता के कारण चर्चा में है, जबकि दो साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी. यहां की शिक्षिकाएं बताती हैं कि ज्यादातर बच्चों में आ रहे बदलाव के पीछे उनके द्वारा आयोजित अनुशासन की गतिविधियों ने अहम भूमिका निभाई है.

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स्कूल में प्रधानाध्यापक सहित 9 शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं

यहां 261 बच्चों में 70 मुस्लिम परिवार से हैं. वर्ष 1949 में स्थापित और करीब डेढ़ एकड़ के विशाल परिसर में फैले इस स्कूल में प्रधानाध्यापक सहित 9 शिक्षक-शिक्षिकाएं हैं. लगभग दस हजार की आबादी के इस गांव में ज्यादातर परिवार मुस्लिम, बौद्ध और अन्य पिछड़े वर्ग से हैं. इनमें से कई परिवार पर्यटन व्यवसाय के अलावा खेती और मजदूरी से जुड़े हैं. इस स्कूल में जनवरी 2017 से मूल्यवर्धन लागू है. यहां की प्रधानाध्यापिका संगीता पांडे स्कूल के ज्यादातर बच्चों के व्यवहार में आ रहे इस परिवर्तन से उत्साहित नजर आती हैं.

पहले ज्यादातर बच्चों में अनुशासन नहीं था
वह हाथ से कक्षा के बाहर और दरवाजे के बाजू की उस उस जगह की ओर इशारा करती हैं, जहां बच्चों ने एक पंक्ति में अपने जूते-चप्पल व्यवस्थित तरीके से रखे हैं. वह बताती हैं कि इस तरह का शिष्टाचार हर स्कूल में दिखता है, इसलिए पहली नजर में किसी को इसमें कुछ परिवर्तन समझ में नहीं आता है पर, दो साल पहले यहां के ज्यादातर बच्चों में ऐसा अनुशासन नहीं था. तब न वह समय पर स्कूल आते थे, बहुत कम बच्चे ही आपस में एक-दूसरे की मदद करते थे और अक्सर वे अपनी चीजों को एक-दूसरे के साथ साझा नहीं करते थे.
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बच्चों पर पड़ा सकारात्मक प्रभाव
फिर, धीरे-धीरे मूल्यवर्धन के सत्रों में आयोजित नियमित गतिविधियों के कारण ज्यादातर बच्चों ने कई मूल्य आत्मसात किए. उदाहरण के तौर पर चौथी की बुशरा शेख बताती हैं कि अनुशासन से जुड़ी एक गतिविधि में उसने अपनी समय-सारणी बनाई और अब वह उसका अच्छी तरह से पालन कर रही है. इससे उसे पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है. इसी कक्षा के अजिंक्य कांबले की मानें तो पहले वह अपनी कोई चीज किसी को नहीं देता था, इसलिए दूसरे भी उसे अपनी चीजे नहीं देते थे. पर अब बहुत सारे बच्चे एक-दूसरे को अपनी-अपनी चीजें देने लगे हैं.

हर कक्षा के बच्चों ने अपने नियम बनाए हैं
शिक्षिका आर. के. मगर बताती हैं कि उन्होंने ईमानदारी से जुड़ी कई गतिविधियां कराईं. इसका बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. यही वजह है कि स्कूल परिसर में यदि किसी बच्चे को पैसे या कोई वस्तु मिलती है तो वह उसे प्रधानाध्यापिका को देते हैं. इसके अलावा, हर कक्षा के बच्चों ने अपने नियम बनाए हैं, जिसका वह अच्छी तरह से पालन करना सीख रहे हैं. शिक्षिका अंजली वामनसा के मुताबिक अब बच्चे अपनी कक्षा में आने वाले मेहमान का खड़े होकर स्वागत करते हैं और कई बार वह किसी विशेष मेहमान का साक्षात्कार भी लेते हैं.

नहीं पड़ी रणनीति बनाने की जरूरत
संगीता के अनुसार उन्हें बच्चों के व्यवहार में बदलाव लाने के लिए कोई विशेष रणनीति बनाने की जरूरत नहीं पड़ी. वह कहती हैं कि हमने अपने स्कूल में अनुशासन से जुड़ी एक योजना बनाई और उसे विभिन्न गतिविधियों में बांट दिया. फिर इन गतिविधियों को कक्षा में नियमित, व्यवस्थित और क्रमबद्ध तरीके से सिखाया. इससे बच्चों को अनुशासन के मूल्य आत्मसात करने में कोई खास बाधा नहीं आई. फिर कविता, कहानी और सहयोगी खेलों से जुड़े कई अध्यायों की अवधारणा सकारात्मक और सामाजिक धारा के अनुकूल रखी गई. इसलिए, हमें लगता है कि इस तरह की गतिविधियों से बच्चे बहुत जल्दी सीख रहे हैं.

अच्छे विचार और काम पर प्रशंसा
चर्चा में शिक्षिकाएं बताती हैं कि वह सप्ताह में दो बार अनुशासन से जुड़े सत्र आयोजित करते हैं. इसमें बच्चों के अच्छे विचार और काम पर उनकी प्रशंसा की जाती है. इस तरह, उनकी बुरी आदतों को हतोत्साहित और अच्छी आदतों को प्रोत्साहित किया जाता है. इसके अलावा, सहयोगी खेलों से बच्चों में एकता की भावना विकसित हो रही है. अनुशासन की कई गतिविधियां आपसी लड़ाइयों को सुलझाने पर जोर देती हैं. इसलिए, उनके बीच झगड़ों की घटनाओं में भी कमी देखी जा रही है.

विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया
दरअसल, अनुशासन से जुड़ी गतिविधियों को कराने के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया गया है. इसमें शामिल सामग्री के कारण यहां की शिक्षिकाओं को विभिन्न विषयों पर नई पद्धति से बच्चों को सिखाने की दिशा मिली है. आर. के. मगर बताती हैं कि हमारा स्कूल मुख्य सड़क के किनारे स्थित है और सड़क पर भारी यातायात के कारण कई बच्चों को स्कूल आने-जाने में परेशानी होती है.

नियम सिखाए जाते हैं
ऐसे में अनुशासन से जुड़ी कुछ गतिविधियों में बच्चों को व्यवहारिक तौर पर यातायात के नियम सिखाए जाते हैं. इसी तरह, अनुशासन के सत्र लागू होने के बाद हम शिक्षिकाएं भी अपनी कुछ आदतों को लेकर पहले से ज्यादा सजग हुई हैं. उदाहरण के लिए, यदि हम खाने से पहले हाथ धोते हैं तो कई बच्चे हमें देखकर इस तरह की अच्छी आदतों का पालन करते हैं.

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आगे की योजना
संगीता अनुशासन के माध्यम से अपनी अगली योजना के बारे में बताती हुई कहती हैं कि हमारे क्षेत्र में पानी की कमी है, इसलिए अब हमारा जोर बच्चों को पानी की बचत और इसका अच्छी तरह से पालन कराने पर रहेगा. वह कहती हैं कि पिछले साल 2018 में 15 जून से हमने वृक्षारोपण अभियान चलाया था. इसमें बड़ी कक्षाओं के 50 से ज्यादा बच्चों ने गांव में नीम, इमली, आम, बरगद और पीपल के पेड़ लगाए थे.

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First published: December 3, 2019, 8:36 PM IST
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