'आज तुम याद बे-हिसाब आए', पढ़ें 'फै़ज़' का मदहोश कर देने वाला कलाम

'फै़ज़' को शायर मुहब्बत के जज़्बे ने बनाया...

'फै़ज़' को शायर मुहब्बत के जज़्बे ने बनाया...

बचपन से ही 'फै़ज़' (Faiz Ahmad Faiz) का रुझान ग़ज़ल (Ghazal) की तरफ़ हुआ और जल्दी ही वह नज़्म (Nazm) के साथ ग़ज़ल भी कहने लगे...

  • Share this:
फ़ैज अहमद 'फै़ज़' (Faiz Ahmad Faiz) 13 फरवरी, 1911 को अविभाजित हिंदुस्तान (India) के शहर सियालकोट में पैदा हुए थे. बचपन से ही उनका रुझान ग़ज़ल (Ghazal) की तरफ़ हुआ और जल्दी ही वह नज़्म (Nazm) के साथ ग़ज़ल भी कहने लगे. 1941 में उनकी शायरी (Shayari) की जो पहली किताब प्रकाशित हुई वह नक़्शे-फ़रियादी है. इसकी शोहरत इतनी हुई कि फै़ज़ सारी दुनिया में मशहूर हो गए. नक़्शे-फ़रियादी में उनकी तालीम के ज़माने से लेकर 1941 तक का कलाम मौजूद है. फै़ज़ को शायर मुहब्बत (Love) के जज़्बे ने ही बनाया. उनके शुरुआती कलाम से यह बात ज़ाहिर भी होती है. इस बारे में एक बार फै़ज़ ने बड़ी बेबाकी से कहा था, 'शायर बनाने में कोई एक ही गुनाह शामिल नहीं. इसमें हालात का असर और दिल की लगी दोनों शामिल है.' आज हम 'रेख्‍़ता' के साभार से हाजि़र हुए हैं फ़ैज अहमद 'फै़ज़' का इश्‍क़ से लबरेज़ कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...

 

आए जो अज़ाब आए...
आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के बाद आए जो अज़ाब आए



बाम-ए-मीना से माहताब उतरे

दस्त-ए-साक़ी में आफ़्ताब आए

हर रग-ए-ख़ूं में फिर चराग़ां हो

सामने फिर वो बे-नक़ाब आए

उम्र के हर वरक़ पे दिल की नज़र

तेरी मेहर-ओ-वफ़ा के बाब आए

कर रहा था ग़म-ए-जहां का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

न गई तेरे ग़म की सरदारी

दिल में यूं रोज़ इंक़लाब आए

जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम

जब भी हम ख़ानुमां-ख़राब आए

इस तरह अपनी ख़ामुशी गूंजी

गोया हर सम्त से जवाब आए

'फ़ैज़' थी राह सर-ब-सर मंज़िल

हम जहां पहुंचे कामयाब आए

 

सुनाती रही रात भर...
आप की याद आती रही रात भर

चांदनी दिल दुखाती रही रात भर

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई

शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन

कोई तस्वीर गाती रही रात भर

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले

कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर

हर सदा पर बुलाती रही रात भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा

इक तमन्ना सताती रही रात भर

ये भी पढ़ें - 'कोई हमदम न रहा कोई सहारा न रहा', पढ़ें 'मजरूह' सुल्‍तानपुरी का इश्‍क़ से सराबोर कलाम

बार बार गुज़री है...
तुम आए हो न शब-ए-इंतज़ार गुज़री है

तलाश में है सहर बार बार गुज़री है

जुनूं में जितनी भी गुज़री ब-कार गुज़री है

अगरचे दिल पे ख़राबी हज़ार गुज़री है

हुई है हज़रत-ए-नासेह से गुफ़्तुगू जिस शब

वो शब ज़रूर सर-ए-कू-ए-यार गुज़री है

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था

वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है

अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

चमन पे ग़ारत-ए-गुल-चीं से जाने क्या गुज़री

क़फ़स से आज सबा बे-क़रार गुज़री है

 

गेसू संवरने लगते हैं...
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

हदीस-ए-यार के उनवां निखरने लगते हैं

तो हर हरीम में गेसू संवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है

जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन

तो चश्म-ए-सुब्ह में आंसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी

फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं

दर-ए-क़फ़स पे अंधेरे की मोहर लगती है

तो 'फ़ैज़' दिल में सितारे उतरने लगते हैं
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज