• Home
  • »
  • News
  • »
  • lifestyle
  • »
  • FAMOUS GHAR PARIVAR MAKAN SHAYARI JAN NISAR AKHTAR SHAYARI URDU GHAZAL ASRAR UL HAQUE MAJAAZ MIRZA GHALIB DLNK

Shayari: 'शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो', अपनेपन से महकते दिलकश कलाम...

'घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना...' Image/shutterstock

Shayari: उर्दू शायरी (Urdu Shayari) में हर जज्‍़बात (Emotion) को दिलकश अल्‍फ़ाज़ में पिरोया गया है. बात जब घर की हो तो भी शायरों के यहां बेहद दिलकश कलाम मिलते हैं...

  • Share this:
    Shayari: उर्दू शायरी में हर मज़मून पर क़लम उठाई गई है. इसी में से एक परिवार भी है. जिंदगी में घर-परिवार की अहमियत कम नहीं है. ये घर ही हैं जहां हम अपने ख्‍वाबों को पूरा करने के मंसूबे बनाते हैं और जहां अपनों का साथ पाकर बाग-बाग हो उठते हैं. ऐसे में शायरी में भी इस अहम विषय को पूरी तवज्‍जो दी गई है और यही वजह है कि ज्‍यादातर शायरों के यहां घर को अहमियत देते अशआर मिल जाएंगे. जिस तरह शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. इसी तरह घर की बात भी बेहद कीमती अल्‍फ़ाज़ में की गई है और शायरी में भी इससे मुंसलिक जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ तवज्‍जो मिली है. ऐसे में शायरों के कलाम की कशिश दिलों को अपनी ओर खींचती रही है. आज हम शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए लाए हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'घर' की हो और अपनों का जिक्र हो. आप भी इन बेशक़ीमती अशआर का लुत्‍़फ़ उठाइए...

    मेरे ख़ुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे
    मैं जिस मकान में रहता हूं उस को घर कर दे
    इफ़्तिख़ार आरिफ़

    ये दश्त वो है जहां रास्ता नहीं मिलता
    अभी से लौट चलो घर अभी उजाला है
    अख़्तर सईद ख़ान

    गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएं
    चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएं
    जमाल ओवैसी

    ये भी पढ़ें - Shayari: 'उस वक़्त का हिसाब क्या दूं', शायरों के कलाम के कुछ रंग और

    सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें
    क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूं नहीं जाता
    निदा फ़ाज़ली

    तुम परिंदों से ज़ियादा तो नहीं हो आज़ाद
    शाम होने को है अब घर की तरफ़ लौट चलो
    इरफ़ान सिद्दीक़ी

    अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहां
    शाम आ गई है लौट के घर जाएं हम तो क्या
    मुनीर नियाज़ी

    कोई वीरानी सी वीरानी है
    दश्त को देख के घर याद आया
    मिर्ज़ा ग़ालिब

    अपना घर आने से पहले
    इतनी गलियां क्यूं आती हैं
    मोहम्मद अल्वी

    ये भी पढ़ें - Shayari: 'इक मुहब्बत के लिए एक जवानी कम है', मुहब्‍बत से लबरेज़ कलाम

    दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ
    घर किसे कहते हैं क्या चीज़ है बे-घर होना
    सलीम अहमद

    दोस्तों से मुलाक़ात की शाम है
    ये सज़ा काट कर अपने घर जाऊंगा
    मज़हर इमाम  (साभार/रेख्‍़ता)
    Published by:Naaz Khan
    First published: