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Famous Ghazals: क्लासिक ग़ज़लें जिन्हें मशहूर गायकों ने दी अपनी आवाज़, यहां पढ़ें

Famous Ghazals: क्लासिक ग़ज़लें जिन्हें मशहूर गायकों ने दी अपनी आवाज़, यहां पढ़ें

क्लासिक ग़ज़लें (Classic Ghazals)

क्लासिक ग़ज़लें (Classic Ghazals)

मशहूर ग़ज़लें (Famous Ghazals): मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) समेत कई जाने-माने शायरों की ग़ज़लों को मशहूर गायकों (Famous Singers) ने अपनी आवाज़ दी है. जिन्हें लोगों ने बहुत पसंद भी किया. इन रचनाओं में जिंदगी के कई पहलुओं को दर्शाया गया है. यहां पढ़ें 3 चुनिंदा ग़ज़लें.

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Famous Ghazals: बहुत सारे लोगों को शेर-ओ-शायरी और ग़ज़लें पढ़ना बहुत पसंद होता है. कई लोग ग़ज़लों (Ghazals) याद करने की कोशिश करते हैं तो कई लोगों को गीतों के जरिए ये याद रह जाती हैं. आपको बता दें कि कई सारे मशहूर शायरों की बेहतरीन ग़ज़लों को मशहूर गायकों (Famous singers) ने अपनी आवाज़ दी है. जिसके बाद वो लोगों के दिलों में घर कर गईं.

पढ़िए, शकील बदायुनी (Shakeel Badayuni), मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) और निदा फ़ाज़ली (Nida Fazli) की ग़ज़ल

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़दीर का मातम कभी दुनिया का गिला
मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

मुझ पे ही ख़त्म हुआ सिलसिला-ए-नौहागरी
इस क़दर गर्दिश-ए-अय्याम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का ‘शकील’
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
शकील बदायुनी

यह भी पढ़ें- Kaifi Azmi Shayari: ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो…’ पढ़ें मशहूर गीतकार कैफ़ी आज़मी के क्लासिक शेर

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीअत इधर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती

दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ऐ चारागर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती
मिर्ज़ा ग़ालिब

यह भी पढ़ें- Filmy Shayari: ‘और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा…’ पढ़ें, फ़िल्मी शेर

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता
निदा फ़ाज़ली (साभार-रेख़्ता)

Tags: Famous gazal, Lifestyle, Literature

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