उन से तन्हाई में बात होती रही, पढ़ें अनवर शऊर की रोमांटिक शायरी

अनवर शऊर की शायरी (प्रतीकात्मक)

अनवर शऊर की शायरी (Anwar Shaoor Shayari): ज़हर की चुटकी ही मिल जाए बराए दर्द-ए-दिल, कुछ न कुछ तो चाहिए बाबा दवा-ए-दर्द-ए-दिल...

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    अनवर शऊर की शायरी (Anwar Shaoor Shayari): अनवर शऊर उर्दू के मशहूर शायर हैं. अनवर शऊर ने कई ग़ज़लें, हास्य, शेर और चंद किताबें भी लिखी हैं. अनवर शऊर की गिनती पाकिस्तान के नामचीन शायरों में होती है. अनवर शऊर इसके अलावा अख़बार में रोज़ाना सामयिक विषयों पर 'क़िता' का भी लेखन करते हैं. अनवर शऊर ने खुशकिस्मती और दुनिया में इंसान अपना वजूद कैसे बनाता है इसपर बेहद खूबसूरत शायरी लिखी है- 'इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह, ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह'. आज हम आपके लिए कविताकोश के साभार से अनवर शऊर की शायरी लेकर आए हैं...

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    1. हो गए दिन जिन्हें भुलाए हुए
      आज कल हैं वो याद आए हुए


    मैं ने रातें बहुत गुज़ारी हैं
    सिर्फ़ दिल का दिया जलाए हुए

    एक उसी शख़्स का नहीं मज़कूर
    हम ज़माने के हैं सताए हुए

    सोने आते हैं लोग बस्ती में
    सारे दिन के थके थकाए हुए

    मुस्कुराए बग़ैर भी वो होंट
    नज़र आते हैं मुस्कुराए हुए

    गो फ़लक पे नहीं पलक पे सही
    दो सितारे हैं जगमगाए हुए

    ऐ 'शुऊर' और कोई बात करो
    हैं ये क़िस्से सुने सुनाए हुए.

    2. ज़हर की चुटकी ही मिल जाए बराए दर्द-ए-दिल
    कुछ न कुछ तो चाहिए बाबा दवा-ए-दर्द-ए-दिल

    रात को आराम से हूँ मैं न दिन को चैन से
    हाए है वहशत-ए-दिल हाए हाए दर्द-ए-दिल

    दर्द-ए-दिल ने तो हमें बे-हाल कर के रख दिया
    काश कोई और ग़म होता बजाए दर्द-ए-दिल

    उस ने हम से ख़ैरियत पूछी तो हम चुप हो गए
    कोई लफ़्ज़ों में भला कैसे बताए दर्द-ए-दिल

    दो बालाएँ आज कल अपनी शरीक-ए-हाल हैं
    इक बलाए दर्द-ए-दुनिया इक बलाए दर्द-ए-दिल

    ज़िंदगी में हर तरह के लोग मिलते हैं 'शुऊर'
    आश्ना-ए-दर्द-ए-दिल ना-आश्ना-ए-दर्द-ए-दिल.



    3. उन से तन्हाई में बात होती रही

    ग़ाएबाना मुलाक़ात होती रही

    हम बुलाते वो तशरीफ़ लाते रहे

    ख़्वाब में ये करामात होती रही

    कासा-ए-चश्म लबरेज़ होती रही

    उस दरीचे से ख़ैरात होती रही

    दिल भी ज़ोर-आज़माई से हारा नहीं

    गरचे हर मर्तबा मात होती रही

    सर बचाए रहा सब्र का साएबाँ

    आसमाँ से तो बरसात होती रही

    गो मोहब्बत से हम जी चुराते रहे

    ज़िंदगी भर ये बद-ज़ात होती रही

    शहर भर में फिराया गया क़ैस को

    कूचे कूचे मुदारात होती रही

    जागते और सोते रहे हम 'शुऊर'

    दिन निकलता रहा रात होती रही .

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