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Shayari: 'मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई', शायरों का अंदाज़े-बयां और बात फूलों की...

शायरी: 'फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूं...' Image/shutterstock

शायरी: 'फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूं...' Image/shutterstock

Shayari: शायरों ने अपने कलाम में जहां इश्‍क़ की बात की है, वहीं इसमें फूलों का जिक्र भी मिलता है. इनके ज़रिये शायरों ने अपने जज्‍़बात (Emotion) को बेहद दिलकश अल्‍फ़ाज़ में पिरोया है...

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    Shayari: शायरी दिल की आवाज़ है या महबूब से हुई मुहब्‍बत भरी गुफ़्तगू. इसमें इश्‍क़ की मिठास है और दर्द की लज्‍़ज़त भी. शेरो-सुख़न (Shayari) की इस दुनिया में जहां इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) से लबरेज़ जज्‍़बात (Emotion) मि‍लते हैं, वहीं मौसमों का जिक्र भी इसमें बेहद दिलकश अंदाज़ में किया गया है. वहीं इसमें कांटों का जिक्र है, तो फूलों की बात भी है. यही वजह है कि शायरों ने कहीं दिलों की कैफियत से जोड़ते हुए फूलों की बात की है, तो कहीं फूलों के ज़रिये इश्‍क़ का पैग़ाम भेजा है. आज शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर पेश हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात फूलों की हो और दिल की कैफियत का जिक्र हो. आप भी इन बेशक़ीमती अशआर का लुत्‍़फ़ उठाइए…

    वो तो ख़ुश्‍बू है हवाओं में बिखर जाएगा
    मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
    परवीन शाकिर

    फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
    पर हमें उनमें तुम्हीं भाए बहुत
    मीर तक़ी मीर

    ये भी पढ़ें – Shayari: ‘उसने बारिश में भी खिड़की खोल के देखा नहीं’

    मैं चाहता था कि उस को गुलाब पेश करूं
    वो ख़ुद गुलाब था उस को गुलाब क्या देता
    अफ़ज़ल इलाहाबादी

    हम ने कांटों को भी नरमी से छुआ है अक्सर
    लोग बेदर्द हैं फूलों को मसल देते हैं
    बिस्मिल सईदी

    कांटों से गुज़र जाता हूं दामन को बचा कर
    फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूं
    शकील बदायूंनी

    कांटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें
    फूलों का क्या जो सांस की गर्मी न सह सकें
    अख़्तर शीरानी

    मैं फूल चुनती रही और मुझे ख़बर न हुई
    वो शख़्स आ के मेरे शहर से चला भी गया
    परवीन शाकिर

    आज भी शायद कोई फूलों का तोहफ़ा भेज दे
    तितलियां मंडला रही हैं कांच के गुल-दान पर
    शकेब जलाली

    ये भी पढ़ें – ‘उस वक़्त का हिसाब क्या दूं’, शायरों के कलाम के कुछ रंग और…

    ख़ुदा के वास्ते गुल को न मेरे हाथ से लो
    मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी
    नज़ीर अकबराबादी

    इतना नाराज़ हो क्यूं उस ने जो पत्थर फेंका
    उस के हाथों से कभी फूल भी आया होगा
    साग़र आज़मी

    (साभार/रेख्‍़ता)

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