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Shayari: 'काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के', शायरों के दिल की बात कुछ इस तरह...

Shayari: 'काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के', शायरों के दिल की बात कुछ इस तरह...

शायरी: 'किताबों ने क्या दिया मुझको...Image/shutterstock

शायरी: 'किताबों ने क्या दिया मुझको...Image/shutterstock

Shayari: शेरो-सुख़न (Shayari) की इस दुनिया में जज्‍़बातों (Emotions) को बेहद ख़ूबसूरती के साथ अल्‍फ़ाज़ में पिरोया गया है. इसमें कहीं दर्द का जिक्र है, तो कहीं शब्‍दों से जज्‍़बात (Emotion) तराशे गए हैं...

    Shayari: शायरी दिल की आवाज़ है या महबूब की ज़ुल्‍फ़ों का पेंचोख़म. जो भी है इनके ज़रिये दिल की बात लबों तक आती है. या कहें कि शायरी हाले-दिल बयां करने का एक खूबसूरत ज़रिया है. शेरो-सुख़न (Shayari) की इस दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ अल्‍फ़ाज़ में पिरोया गया है. बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या इंसानी जिंदगी से जुड़े किसी और मसले पर क़लम उठाई गई हो. शायरी में शब्‍दों से जज्‍़बात (Emotion) तराशे गए हैं.

    फिर बात अगर किताबों की हो तो, यह भी जिंदगी से जुदा कब हैं. कभी इनमें दिल के जज्‍़बात बिखरे मिलते हैं, तो कभी आंसुओं की बारिश किताबों के पन्‍नों पर गिर कर शब्‍द बन जाया करती है. यही वजह है कि किताबों के वर्कों में कहीं दर्द दिलकश अल्‍फ़ाज़ में पिरोया मिलता है, तो कहीं जुदाई के लम्‍हात को भी पूरी तवज्‍जो दी गई है. आज शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए पेश हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'किताब' की हो और दिल की बेकरारी का जिक्र हो. आप भी इन बेशक़ीमती अशआर का लुत्‍़फ़ उठाइए...

    काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
    दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
    बशीर बद्र

    किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
    काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
    आदिल मंसूरी

    क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
    हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरें हैं
    एजाज तवक्कल

    ये भी पढ़ें - 'उस वक़्त का हिसाब क्या दूं', शायरों के कलाम के कुछ रंग और...

    एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा
    उस के बाद तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है
    इफ़्तिख़ार आरिफ़

    किधर से बर्क़ चमकती है देखें ऐ वाइज़
    मैं अपना जाम उठाता हूं तू किताब उठा
    जिगर मुरादाबादी

    खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए
    सवाल ये है किताबों ने क्या दिया मुझको
    नज़ीर बाक़री

    जो पढ़ा है उसे जीना ही नहीं है मुमकिन
    ज़िंदगी को मैं किताबों से अलग रखता हूं
    ज़फ़र सहबाई

    धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
    ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
    निदा फ़ाज़ली

    ये भी पढ़ें - 'इक मुहब्बत के लिए एक जवानी कम है', मुहब्‍बत से लबरेज़ कलाम

    ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
    इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
    जां निसार अख़्तर

    वही फ़िराक़ की बातें वही हिकायत-ए-वस्ल
    नई किताब का एक इक वरक़ पुराना था
    इफ़्तिख़ार आरिफ़ (साभार/रेख्‍़ता)undefined

    Tags: Famous gazal, Lifestyle

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