Shayari: 'दरमियां के फ़ासले का तय सफ़र कैसे करें', मुहब्‍बत से लबरेज़ शायरी

Shayari: 'दूरियों में भी दिलकशी है अभी...' Image-Credit-Pixabay

Shayari: 'दूरियों में भी दिलकशी है अभी...' Image-Credit-Pixabay

शेरो-सुख़न की दुनिया में ज़िंदगी के सभी रंग मौजूद हैं. फिर चाहें वह मुहब्‍बत का रंग हो या किसी और जज्‍़बात पर क़लम उठाई गई हो, शायरों ने इसे बेहद ख़ूसूरती के साथ पेश किया है...

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 9, 2021, 3:45 PM IST
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Shayari: उर्दू शायरी जज्‍़बातों की दुनिया है. इसमें हर जज्‍़बात को क़लमबंद किया गया है. शायरी में जहां मुहब्‍बत, दर्द से लबरेज़ जज्‍़बातों को जगह मिली है, वहीं इसमें इंसानी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं को भी ख़ूबसूरती के साथ जगह दी गई है. इसमें अगर दोस्‍ती का जिक्र है, तो दुश्मनी के जज़्बे को भी अलग ही अंदाज़ में पेश किया गया है. एक तरह से कहें तो शायरी दिल से निकली आह है, चाह है और सदा है, जिसे हर शायर ने अपने जुदा अंदाज़ में पेश किया है. आज हम शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए लेकर हाजिर हुए हैं. आज की इस कड़ी में पेश हैं 'फ़ासला' पर शायरों का नज़रिया और उनके कलाम के चंद रंग. आप भी इसका लुत्‍फ़ उठाइए.

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना

जहां दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता

बशीर बद्र
फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था

सामने बैठा था मेरे और वो मेरा न था

अदीम हाशमी



कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

बशीर बद्र

क़ुर्बतें लाख ख़ूबसूरत हों

दूरियों में भी दिलकशी है अभी

अहमद फ़राज़

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भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फ़ासले

न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई

बशीर बद्र

फ़ासला नज़रों का धोका भी तो हो सकता है

वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

निदा फ़ाज़ली

दुनिया तो चाहती है यूं ही फ़ासले रहें

दुनिया के मश्वरों पे न जा उस गली में चल

हबीब जालिब

मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें

दरमियां के फ़ासले का तय सफ़र कैसे करें

फ़र्रुख़ जाफ़री

उसे ख़बर है कि अंजाम-ए-वस्ल क्या होगा

वो क़ुर्बतों की तपिश फ़ासले में रखती है

ख़ालिद यूसुफ़

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कितने शिकवे गिले हैं पहले ही

राह में फ़ासले हैं पहले ही

फ़ारिग़ बुख़ारी (साभार/रेख्‍़ता)
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